ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अमेरिका में रहकर भारत की ललक
01-Feb-2017 12:09 AM 5438     

भारतवंशी रहें कहीं भी दूर या पास, हृदय में बंशी भारत की ही बजती है। कितने भी सुख साधन उपलब्ध हों, दिल की हर धड़कन में नाम भारत का ही धड़कता है। दूर, सुदूर रहकर जब कोई अपना भारतवंशी मिलता है तो लगता है जैसे कोई आत्मीय मिल गया हो। बंशी की मधुर तान सहसा कानों में लगती है अमृत घोलने।
आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व मैं भारत से अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रान्त में स्थायी रूप से आकर बस गयी। भारत से विदा लेते हुए अपनी मातृभूमि छोड़ने का दुःख भी था और प्रसन्नता भी थी। क्योंकि हमारे बेटे उच्च शिक्षा प्राप्त कर यहीं स्थायी रूप से रहने लगे थे और उनके आग्रह करने पर और विशेषकर यह सोचकर की परिवार में एकसाथ रहने से सुख-दुःख में एक-दूसरे का साथ बना रहता है, हम दोनों पति-पत्नी ने स्थायी रूप से अमेरिका में रहने का निश्चय कर लिया।
नया देश नया भेष, यहाँ सभी कुछ नया था और रह-रहकर अपने देश की याद भी आती थी, परन्तु सोचा जब रहना ही है तो मन लगाना ही पड़ेगा। ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डर। परन्तु न यहाँ ओखली थी न मूसल थे, केवल थीं बड़ी-बड़ी शानदार चमचमाती गाड़ियां, बड़े-बड़े ऊँचे आलीशान मकान, वातानुकूलित - न सर्दी में सर्दी लगे ना गर्मी में गर्मी लगे। आनन्द ही आनन्द, एक से एक बड़े मॉल और उन मॉल में घूमते हुए हमउम्र अपने भारतीय भी मिल जाते तो और  भी अच्छा लगता। हालाँकि खरीदारी तो कुछ अधिक नहीं होती थी लेकिन हाँ विंडो शॉपिंग का आनंद सभी भारतीय खूब लूटते थे और एक-दूसरे की आँख बचा सस्ती-सी खरीदारी भी कर लेते थे। एक मित्र जो पड़ोस में ही रहती थीं बताया कि यहाँ रविवार के दिन "गैराज सेल" लगती है जहाँ लोग अपने घर का फालतू सामान बहुत ही सस्ते दाम में निकाल देते हैं। अगले रविवार को वे मुझे अपने साथ "गैराज सेल" में ले गयीं, जो एक नया अनुभव था। सामान तो कौड़ियों के दाम मिल रहा था और उन्होंने कुछ ख़रीदा भी लेकिन जब मैंने घर आकर बताया तो हमारे बच्चों ने कहा कि ऐसा फालतू सामान मत खरीदना। यहाँ घर में अधिकतर आवश्यकता का ही सामान रखा जाता है। यहाँ तक कि घर का फ़ालतू सामान निकालकर लोग घर के बाहर भी रख देते हैं और उसे कोई भी जरूरतमन्द ले जा सकता है। वास्तव में अमेरिका में सेकेंड हैंड यानि इस्तेमाल की ही हुई वस्तु की कोई खास कीमत नहीं होती चाहे कितनी भी अच्छी हालत में क्यों न हो। सबेरे जब सैर के लिए जाते तो अक्सर सड़क किनारे कभी सोफा, कभी कुर्सी, कभी टेलीविजन इत्यादि रखा दिखाई दे जाता था और जब तक सैर कर लौटते तो नदारद भी हो जाता था। कोई न कोई जरूरतमन्द ले जाता था। क्योंकि यहाँ रहने वालों में सभी किस्म के लोग हैं, जो लोग मैक्सिको इत्यादि से आकर बस गए हैं और अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं, नौकरियाँ मामूली हैं, उनके लिए यह अच्छा था।
सफाई का यहाँ सब लोग बहुत ध्यान रखते हैं, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जैसी सफाई हमारे भारत में लोग दिवाली पर करते हैं इस भावना से की घर साफ़ होगा तो लक्ष्मी जी आएँगी। ऐसी सफाई तो यहाँ लोग हर सप्ताह करते हैं, सम्भवतः इसीलिए लक्ष्मी जी यहाँ सदा निवास करती हैं। घर के आगे, दुकान के आगे या सड़क पर भी कूड़े करकट का नामों निशान नहीं। सप्ताह में एक बार कूड़ा इकट्ठा  करने वाली गाड़ी आती है सब अपने घर के आगे कूड़ेदान रख देते हैं और बड़े-बड़े कूड़ेदानों में से कूड़ा लेकर गाड़ी चली जाती हैं। इसका एकबार प्रारम्भ में ही नमूना देखने को मिला। बात तो बहुत ही छोटी सी है पर उस बात ने मुझको बहुत प्रभावित किया। हुआ यूँ कि जब हम अमेरिका आये आये थे, तो एक बार परिवार के साथ घर से दूर पिकनिक मनाने गए। रास्ता लम्बा था। सोचा कि कुछ फल इत्यादि खाये जाएँ - बस लगे हम संतरा केला वगैरह छीलकर खाने। हमारी बहू ने झट से एक प्लास्टिक बैग खाली करके कार की सीट के पीछे टेप से लगा दिया और कहा कि यह हमारा कूड़ेदान है, सब छीलकर छिलके वगैरह इसमें ही डालना। जब गाड़ी से उतरे तो पिकनिक स्थल पर कूड़ेदान रखे थे उसमें अपना कूड़े का बैग डाल दिया। मुझे याद आयीं बॉम्बे, कोलकता की लोकल ट्रेन जिनमें मूंगफली के छिलकों की भरमार रहती है और आने-जाने वाले यात्रियों को कितनी असुविधा होती है। काश हम भी भारत में ऐसा कर पाते। भारत में अब स्वच्छता अभियान प्रारम्भ हुआ है शायद कुछ काया पलट हो जाए।
सैर के लिए जाना भी यहाँ बहुत ही सुविधाजनक है। पार्क में तो ट्रेल बनी ही हैं घरों के आगे भी घूमने के लिए पगडंडियां बनी हैं पक्की। जो आपका सड़क पर चलते वाहनों से बचाव करती हैं। कहीं भी आप शॉपिंग माल इत्यादि में चले जाएँ, पार्किंग की पूरी सुविधा होती है। कोई आपको हॉर्न बजाता हुआ दिखाई नहीं देगा। कायदे कानून के अंदर सब वाहन चलते हैं, स्टॉप चिह्न जगह-जगह पर बने होते हैं जिन पर वाहन एक दो मिंट को रुकते हैं। यातायात के नियम देखते ही बनते हैं और स्वतः उनका पालन करना, अपने में बहुत बड़ी बात है। क्यू यानि कतार में स्वतः ही खड़े रहते हैं, कतार तोड़ना तो दूर की बात शायद सोचते भी नहीं है, यहाँ अनुशासनप्रियता देखते ही बनती है।
विभिन्न देशों से जनसमूह यहाँ आया हुआ है सबको अपना अपना धर्म, रीति-रिवाज़ और सभ्यता, संस्कृति के अनुसार आचरण करने का पूरा अधिकार है। सब एक-दूसरे की सभ्यता-संस्कृति  का आदर और प्रशंसा करते हैं और उत्सुकता भी दिखाते हैं। जैसे अक्सर हमारी बिंदी और हाथों में रची मेंहदी के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं। आप अपनी-अपनी भाषा का प्रचार प्रसार कर सकते हैं। चाहें तो अपनी सन्तान को अपनी सभ्यता संस्कृति से रूबरू करा सकते हैं, चाईनीज, जैपनीज़, कोरियन, रशियन, इटैलियन सब अपने बच्चों को अपनी-अपनी भाषा सिखाते हैं, अपने त्यौहार मनाते हैं। हमारे भारतीय भी यहाँ अपने होली दीवाली इत्यादि बड़े धूमधाम से मनाते हैं साथ क्रिसमस इत्यादि त्यौहार भी खूब धूमधाम से मनाते हैं। हमारे बच्चे और आगे उनके बच्चे यहाँ के वातावरण में पूर्णतया घुलमिल गए हैं, फिर भी अभिभावक चाहते हैं कि  उनके बच्चे अपने भारतीय संस्कारों का सम्मान करें इसीलिए जगह जगह पर नृत्यशालाएं, संगीतशालाएं तथा हिंदी की पाठशालाएं चलाई जाती हैं।
जीवनगाड़ी यहाँ सुचारू रूप से चलती है फिर भी मन में ललक अपने भारत की ही रहती है। मन लगाने के लिए बुजुर्ग कवि गोष्ठियों तथा अन्त्याक्षरी इत्यादि का भी आयोजन समय-समय पर करते रहते हैं। मेरा एक ऐसा ही अनुभव जिसने मेरे हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ी उसका वर्णन करना चाहूंगी।
भारत से आकर कुछ खोया-खोया सा लगता था "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" रह रहकर अपनी मातृभूमि की याद आती थी। तभी मेरी बचपन की सहेली सरला जो किस्मत की कुंजी की तरह अचानक मिल गयी थी। उसने बताया की वह भी अपने बच्चों के साथ यहाँ रहती है। हाँ तो उसने बताया की यहाँ पर "छज्जू का चौबारा" नाम से सांता क्लारा शहर में एक कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ है। सप्ताह में एक बार हर बुधवार को होता है। उसमें तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगी। मैं बहुत खुश थी और मुश्किल से रात काटी। दूसरे दिन ठीक 11 बजे वहां कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। पचास से अधिक बुजुर्ग हमारी भांति ही भारत से आये थे। अलग-अलग प्रकार के गाने, भजन, कहानी और संस्मरण लिखकर लाये थे। सबने एक से एक रोचक प्रस्तुति दी, हम उसमें इतने लीन हो गए कि सब कुछ भूल गए। बस अब तो हम रम गए थे और हर बुधवार को जाने लगे, विभिन्न विधाओं में लिखकर ले जाने लगे । मन लगने लगा, आत्मीयता इतनी बढ़ गयी की किसी बुधवार को ना जाने पर फ़ोन करके एक-दूसरे का हाल पूछते थे। वहां के स्नेह, प्यार और अपनेपन के शिकंजे में हम जकड़ गये थे। प्रायः हम कहते "वो सुख न बल्ख न बुखारे, जो छज्जू के चौबारे"।
अंत में यही कहूँगी सुख भी देखे दुःख भी देखे रहकर अमेरिका में पर हर भारतीय के हृदय में भारत धड़कता देखा। भारतवंशी के मन में भारत की बाँसुरी बजती देखी।

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