ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अकबर प्रयाग से बड़ा नहीं हो सकता
01-Nov-2018 10:19 AM 1687     

प्रयाग का मूल शब्द है याग जो यज् अ घञ् के योग से बना है। यागः का अर्थ होता है उपहार, यज्ञ, वह अनुष्ठान जिसमें आहुति दी जाती है। याग से पहले प्र उपसर्ग लगा देने से प्रयाग बना है। प्रयाग अर्थात एक विशिष्ट प्रकार का यज्ञ।
उत्तराखंड को देव भूमि कहा गया है। वहाँ पाँच प्रयाग है- पंच प्रयाग। धौली गंगा तथा अलकनंदा के संगम पर विष्णु प्रयाग, नंदाकिनी तथा अलकनंदा के संगम पर नंदप्रयाग, अलकनंदा और पिंडर के संगम पर कर्णप्रयाग, अलकनंदा और मन्दाकिनी के संगम पर रुद्र प्रयाग और भागीरथी और अलकनंदा के संगम पर देवप्रयाग। यहाँ तक गंगा नाम कहीं नहीं है। इससे आगे ही गंगा गंगा कहलाती है। इसके बाद जब यमुना गंगा में मिलती है वहाँ भी प्रयाग बनता है। यह सबसे बड़ा "प्रयाग" है। असली प्रयाग। मूल प्रयाग। बिना किसी विशेषण वाला प्रयाग।
"प्रयाग" ही सबसे बड़ा प्रयाग है। यही मुख्य प्रयाग है। यही सबसे बड़ा संगम है। और प्रयाग छोटे हैं क्योंकि उन्हें अपनी पहचान के लिए अन्य संज्ञाओं या विशेषणों का सहारा लेना पड़ता है यथा- कर्ण, रुद्र, देव, नन्द आदि। प्रयाग अपने में पूर्ण है उसे कोई विशेषण नहीं चाहिए। वह अंतिम यज्ञ है, वह पूर्णाहुति है, वह परम उपहार है।
अभी एक बहुत बड़ी तथाकथित उपलब्धि हासिल की गई है- इलाहाबाद का नाम "तीर्थराज प्रयाग" कर दिया गया है।
इलाहाबाद का नाम बदलने पर कहा गया कि यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है इसलिए इसे "प्रयागराज" नाम दिया गया था। आलोचना करने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा गया है कि मुगल-काल में इस जगह का नाम इलाहाबाद किया गया था। जो इस मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें भारत के इतिहास की बिल्कुल भी जानकारी नहीं है। इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किए जाने की माँग लंबे अर्से से संत-महात्मा करते आ रहे हैं। माँग करने वालों का तर्क है कि पहले भी इलाहाबाद का नाम प्रयाग ही था जिसे मुगल बादशाह अकबर ने बदलकर "अल्लाहाबाद" रख दिया था। कालांतर में इसे इलाहाबाद कहा जाने लगा।
इस सन्दर्भ में सामने आए बिन्दुओं पर विचार करें तो उक्त पञ्च प्रयागों के अतिरिक्त यह मुख्य प्रयाग भी देश की दो विशिष्ट नदियों के संगम पर है इसीलिए प्रयाग संगम के नाम से जाना जाता है। अकबर ने प्रयाग का नाम नहीं बदला, उसे कोई क्षति नहीं पहुंचाई। आज भी प्रयाग नाम का रेलवे जंक्शन है, पोस्टऑफिस है जिसका पिनकोड है 211-002। आज भी प्रयाग कहने से कोई इलाहाबाद नहीं समझता। संगम ही समझते हैं। त्रिवेणी ही ध्यान में आता है। इलाहाबाद का प्रयाग से कोई संबंध नहीं है। इलाहबाद से प्रयाग को कोई खतरा नहीं है। इलाहाबाद प्रयाग से बड़ा नहीं है। इलाहाबाद प्रयाग का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
इलाहाबाद शब्द को ALLAHABAD लिखने में अंग्रेजों और रोमन लिपि की कमी है जो हमने कानपुर की स्पेलिंग ((COWNPORE)) में देखी जा सकती है। मेरठ की स्पेलिंग ((MEERUT)) में तो आज भी देख ही रहे हैं। कोई भी "अल्लाहाबाद" नहीं बोलता। यह अल्लाह की बजाय "इलाही" (ईश्वर) के अधिक निकट है। इसी तर्ज़ पर अकबर ने "दीन-ए-इलाही" (ईश्वर का धर्म) की परिकल्पना की थी। वह धर्म जिसमें सभी धर्मों का समाहार हो सकता है। जिमि सरिता सागर महँँ जाई या सर्व धर्मान परित्यज्य....। यदि शब्दों के पीछे ही चलें तो इडा/इला का अर्थ गाय, एक देवी, मनु की पुत्री, पृथ्वी भी होते हैं।
अकबर का अर्थ होता है- बड़ा, महान, श्रेष्ठ। लेकिन कोई अकबर प्रयाग से बड़ा, महान और श्रेष्ठ नहीं हो सकता। कहीं हम मुसलमानी कुंठा के चलते अकबर को प्रयाग के तुल्य तो नहीं बना रहे। प्रयाग- एक विशिष्ट प्रकार का यज्ञ, संगम पर होने वाला यज्ञ। संगम बनता ही तब है जब कोई एक अपने आप को, अपने नाम और अस्तित्व को पूर्णरूपेण विसर्जित कर देता है और दूसरा उसे सर्वात्म भाव से स्वीकार करता है। दोनों एक हो जाते हैं। जो इस प्रकार एकता का एक विराट और पूर्ण बिम्ब रचते हैं वे सबसे बड़े होते हैं। प्रयाग हो जाते हैं। प्रयाग से बड़ा कोई नहीं। प्रयाग संत होते हैं। वे चन्दन और पानी की तरह मिलते हैं। वे महंतों की तरह घोड़े-हाथी, अस्त्र-शस्त्र लेकर नहीं चलते। वे मठ नहीं चलाते, संग्रह नहीं करते। वे गंगा के किनारे अखाड़े लेकर नहीं आते, स्नान करने के लिए किसी कुंठा और दुराग्रह के तहत लड़ते नहीं। उनके चंगे मन की कठौती में तो त्रिवेणी खुद आ जाती है, प्रयाग हाज़िर हो जाता है। यज्ञ का अर्थ है देना, अपने भौतिक वैभव ही नहीं बल्कि अहम् की आहुति देना।
रही बात प्रयाग के साथ "राज" विशेषण जोड़ने की तो यह व्याकरण की दृष्टि से भी गलत है। प्रयाग व्यक्तिवाचक संज्ञा है। उसके साथ कुछ नहीं लगेगा। प्रयाग सबसे बड़ा है। प्रयाग को किसी विशेषण की ज़रूरत नहीं है। हाँ, उसे "तीर्थराज" कहा जा सकता है। जैसे "हिमालयराज" नहीं होगा; मृगराज, वानरराज की तरह "पर्वतराज", "नगाधिराज" हो सकता है। राम, कृष्ण, भीष्म, विष्णु, शिव क्या अपने नाम के आगे-पीछे कोई श्री, चन्द्र, सिंह आदि लगाते हैं? यह "श्रीराम" भी भक्तों का आविष्कार है। कुछ अधिक कुंठित लोग तो एक "श्री" से भी संतुष्ट नहीं होते। पहले से ही है उसे किसी विशेषण की ज़रूरत नहीं होती। छोटा व्यक्ति ही अपने नाम के आगे-पीछे डिग्री और पद लगाता है। शेर अपने पराक्रम से शेर है अपने विशेषणों से नहीं।
इसी सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि कुछ लोगों द्वारा समस्त ज्ञान, संस्कृति का ठेका लेना भी अनुचित है। कुछ तो लोक के लिए भी छोड़िये। आपने लाख "वाराणसी" थोप दिया, लेकिन लोग अब भी बनारस और काशी ही कहते हैं। अब भी "काशी-करवत" ही है। "बनारसी लंगड़ा" की जगह "वाराणसेय लंगड़ा" नहीं हो सकेगा। कभी "वाराणसेय साड़ी" शब्द की विचित्रता का भी आनंद ले सकते हैं।
वैसे तो संगम प्रयाग में ही होता है फिर भी यदि ईश्वर और अल्ला का संगम इलाहाबाद में हो जाता है तो क्या बुरा है? जीवन भी तो नदी-नाव संजोग है। इस जीवन रूपी संजोग या संगम को सुखद बनाने की सोचें।

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