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नवाचारों की राह पर हिंदी
आज प्रसार माध्यमों का महासंगम मोबाइल और इंटरनेट के जरिए हो रहा है। पत्रकारिता, साहित्य, कविता, ज्ञान-विज्ञान, शोध, दर्शन के क्षेत्रों में पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें पिं्रट और डिजिटल रूप में साथ-साथ बढ़ रही हैं। टेलीविज़न, फिल्म और संगीत ...
नौ दशक का सुरीला सफर
आज से 92 साल पहले भारत में मुंबई से रेडियो प्रसारण की पहली स्वर लहरी गूंजी थी। प्रसारण की इस मोहक और ऐतिहासिक यात्र में रेडियो ने सफलता के कई आयाम तय किए हैं। भारत में रेडियो प्रसारण का नाम "आकाशवाणी" विश्व भर में विशिष्ट है। इसकी "परिचय धुन" भी अ...
रेडियो की कहानी
रेडियो की आवाज़ और हवाओं में तैरती उद्घोषक और उद्घोषिकाओं की आवाज़, आवाज़ें अब भी हैं लेकिन शालीनता सौम्यता और मधुरता खो गयी है, रेडियो का कोना पहले टेलिविज़न ने हथिया लिया फिर टेलिविज़न कोने से दीवार पर जा लगा, कोना अब भी है लेकिन खाली, क्या रेड...
राजभाषा का मुखौटा कब तक?
भारतीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया में 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिन्दी को संघ (केंद्र सरकार) की राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया। संविधान लागू होते ही हिन्दी को राजभाषा का दर्जा अवश्य मिला, किंतु अंग्रेजी की अनिवार्यत...
भारत की राज भाषा का संदर्भ
स्वतंत्रता के बाद प्रश्न उठा कि हमारे देश की एक राजभाषा क्या हो? स्वाभाविक है कि बहुभाषी देश के लिये किसी एक ऐसी भाषा का चयन करना था जो सर्वसम्मति से स्वीकार हो, ग्राह्य हो और राजकाज करना संभव हो। गहन विचार-विमर्श के पश्चात हिन्दी को चुना गया, क्य...
बोलचाल बनाम कार्यालयीन हिंदी
भाषा और मनुष्य का आपसी संबंध कुछ इस प्रकार है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है। भाषा ही हमारे चिंतन, भाव-बोध, संप्रेषण संवाद का महत्वपूर्ण साधन है। हम न केवल भाषा के सहारे सोचते हैं किंतु समझते और समझाते भी हैं। भाषा के जिस रूप का ...
राजभाषा की असली तस्वीर
राजभाषा की असली तस्वीर राष्ट्रभाषा के भ्रम में छिपी है। जाहिर है यहाँ भारत में राजभाषा हिंदी की बात हो रही है जहां राष्ट्रभाषा अपने परंपरागत रूप में हिंदी के स्वरूप में सदियों से विद्यमान है। राष्ट्रभाषा देश की सामाजिक व सांस्कृतिक वाणी है तो राजभ...
हिंदी राग : अलगाव का या एकात्मता का?
इस देवभूमि भारत की करीब 50 भाषाएँ हैं, जिनकी प्रत्येक की बोलने वालों की लोकसंख्या 10 लाख से कहीं अधिक है और करीब 7000 बोली भाषाएँ, जिनमें से प्रत्येक को बोलनेवाले कम से कम पाँच सौ लोग हैं, ये सारी भाषाएँ मिलकर हमारी अनेकता में एकता का अनूठा और अद्...
हिंदीप्रेमी क्या करे?
हिंदी की देश में राजभाषा या राष्ट्रभाषा के रूप में जो भी स्थिति है, उसके लिए भले ही राजनीति जिम्मेदार हो, पर मातृभाषा के रूप में हिंदी प्रदेशों में उसकी जैसी स्थिति है, उसके लिए हमें अपनी सांस्कृतिक दुर्बलताओं पर ध्यान देना होगा। हिंदी प्रदेशों की...
भारत के छोटे-बड़े राजदूत विदेशी हिंदी छात्र और राजभाषा हिंदी
विदेश में हिंदी की स्थिति कैसी है? और इधर उत्तरी यूरोप की हिंदी के हाल को देखकर कौन-सी खासियतें हैं? विदेश में हिंदी के मामले में वार्ताओं की कोई कमी नहीं है। मेरे अंदर में आवाज़ें एक जैसी नहीं, अलग-अलग किस्म की आवाज़ें गूँज रही हैं।एक तो यह ह...
पत्रकारिता में इतिहास बोध और राजेन्द्र माथुर
अतीत की बुनियाद पर हमेशा भविष्य की इमारत खड़ी होती है। जब तक इतिहास की ईंटें मज़बूत रहती हैं, हर सभ्यता फलती-फूलती और जवान होती है। लेकिन जैसे ही ईंटें खिसकने लगतीं हैं, इमारत कमज़ोर होती जाती है। शिल्पियों ने अगर सही ईंट का चुनाव न किया तो घुन लगता ...
हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक संकट
पत्रकार शिरोमणि बाबूराव विष्णु पराड़कर ने लगभग एक शताब्दी साल पहले हिंदी संपादक सम्मेलन में कहा था, "पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनिकों तथा सुसंगठित कंपनियों के लिए संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे, आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मन...
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