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असुर
01-Jan-2019 01:46 PM 2374     

देवता और असुर एक-दूसरे के जानी दुश्मन रहे होंगे। ऐसा मुझे कब से लगने लगा था, यकीन के साथ कह नहीं सकता। देवता और असुर की कथाओं में देवता अक्सर अपनी नैतिकता, सद्चरित्र और शौर्य के कारण विजयी के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे। दूसरी ओर उतने ही शक्तिशाली होते हुए भी अपनी माया, छल और अधर्म के जरिए क्षणिक जीत के बावजूद असुरों को आखिर में मुँह की खानी पड़ती थी। उम्र के साथ मुझमें समझने और ग्रहण करने की क्षमता में हुए परिवर्तन होने लगे जिससे ऐसी कहानियों से सम्प्रेषित सन्देशों में भी कुछ बदलाव आने लगे। धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा कि देवता सिर्फ अच्छे ही नहीं बल्कि अच्छाई के प्रतीक भी हैं और असुर सिर्फ बुरे ही नहीं बल्कि बुराई के प्रतीक भी हैं। देवता और असुरों की जंग से भी ज्यादा अब ऐसी कहानियों के इर्द-गिर्द सत्य की जीत और असत्य की हार जैसे सन्देश होते थे। लेकिन कभी-कभी उन्हीं सत्यवादी देवताओं के भी छल-कपट और अनैतिक कारनामों की कहानियों भी मिलती हैं।
किसी भी स्कूल और कॉलेज में धर्म, संस्कृति और परंपराओं के बारे में औपचारिक तौर पर इन बातों के बारे में पढ़ने और जानने का अवसर न मिलने के बावजूद इन सब बातों में दिलचस्पी बनी रही और ये सब जेहन में अटकी रही।
बहुत समय बाद एक बार कहीं पढ़ा कि असुरों की भी गिनती देवताओं में होती थी। यह पढ़कर मैं हैरान और आश्चर्यचकित रह गया था। यह भी सुनने में आया कि वेदों में कई जगह पर इन्द्र को भी असुर कहा गया है और शुक्राचार्य देवता और असुर दोनों के गुरु थे। इसी तरह मित्र और वरुण जैसे वैदिक देवता को भी असुर का दर्जा दिया गया है।
जब मैं सुर और असुर शब्दों का मतलब ढूंढने लगा तो ऐसा लगा कि मैं जैसा सोचने का आदी हुआ था शायद वैसा नहीं है। मैं सोचता था "सुर" का मतलव देवता या अच्छा है और सुर के आगे "अ" लगाने से मतलब उलट जाता है। जैसे सम्भव के आगे "अ" लगाने से असम्भव हो जाता है। लेकिन यहां पर मुझे लगा कि शब्दों को उल्टा करने वाला "अ" को सुर (देवता) के आगे रखकर असुर नहीं बना है। कहीं यह तो नहीं कि किसी खास वजह से असुर शब्द से "अ" हटाकर सुर शब्द को अपनाया गया हो? मुझे इसका सन्देह तब हुआ जब यह पाया कि संस्कृत में सुर का एक अर्थ "सूर्य" होता है और साथ ही असुर का एक अर्थ भी सूर्य होता है। अगर यह मान लिया जाय कि भाषा के लम्बे समय के विकास के दौरान उच्चारण और हिज्जे कुछ बदलाब आ सकते हैं तो, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि "असुर", "सुर" और "सूर्य" तीनों शब्दों में "सुर" पाया जाता है। इस तरह सुर (देवता) और असुर एक जैसे लगते हुए भी कैसे देवता के अच्छे होने का और असुर के बुरे होने की प्रथा निकल आयी होगी, सोचने लगा।
वैदिक देवता, दक्षिण एशिया और अन्य कई के जगहों की सभ्यताओं के घरों में पूजाओं में, संस्कृतियों में, परंपराओं में, किंवदंतियों में, दन्तकथाओं में अभी भी जीवित हैं, जी रहे हैं। लेकिन असुरों को भी वैसा ही सौभाग्य मिलता हुआ नजर नहीं आया है। देवता (सुर) के समान सम्मान के बजाय असुर को याद दिलाने वाला नकारात्मक शब्द "आसुरी" प्रचलन में आ गया। जिस तरह उस वक्त के देवता को अभी भी मान सम्मान मिल रहा है और उनको पूजने वाले लोग हैं, क्या उसी तरह असुरों को भी कहीं सम्मान मिल रहा है? उनको पूजने वाले भी कहीं हैं? असुरों की कहानियों और मिथकों के साथ क्या हुआ? कौन थे वेद के वे असुर? क्या वे सब पूरे के पूरे काल्पनिक और दन्तकथा के पात्र थे?
कभी-कभी किसी एक मुल्क और उसकी संस्कृति का इतिहास, उसके पड़ौसी मुल्कों के इतिहास और संस्कृति में भी इधर-उधर बिखरे पड़े हो सकते हैं। उन छुटपुट बिखरे हुए दानों को बीनना पड़ता है। इस परंपरा के तहत असुरों की तलाश में प्राचीन ईरान (पारस) की ओर झांकना असामान्य बात नहीं है।
सन् 600 आसपास अरबों के आक्रमण से इस्लाम धर्म आने से पहले ईरान में जरथुस्त्र नामक धर्म प्रवर्तक द्वारा चलाया गया एक अलग ही धर्म था। उस जरथुस्त्रीय धर्म में "अहुरमज्द" को परमेश्वर माना जाता है। कहीं यह "अहुर" शब्द का "असुर" शब्द से संबंध तो नहीं?
असुर और अहुर शब्दों के संबंध के बारे में संदेह का कारण यह है कि संस्कृत के कई शब्दों मे निहित "स" प्राचीन ईरानी शब्दों में "ह" हो जाते हैं। और तो और सिंधु नदी को ईरानियों द्वारा "हिंदू" कहने के कारण "हिंदू" शब्द प्रचलन में आया। इसी तरह सप्ताह (सात दिन) हफ्ता या हफ्ते होने में भी ईरान की भाषा की देन है। वेदों में सोम को बार बार उल्लेख किया गया है तो जरथुस्त्रीय धर्म के धर्मग्रन्थ "अवेस्ता" में "ओम" का। अभी भी नेपाल के कर्णली क्षेत्र के लोगों को "स" को "ह" जैसा कहते हुए सुना जा सकते हैं।
सिर्फ संस्कृत के "स" और प्राचीन ईरानी के "ह" ही नहीं, लोग कहते हैं कि संस्कृत भाषा स्वयं प्राचीन ईरानी (पारसी) भाषा एक-दूसरे के बहुत नजदीक दिखाई देती है। प्राचीन भारत में वेद जैसा स्थान है, वैसा ही अवेस्ता का स्थान जरथुस्त्रीय धर्म में था। भाषा विज्ञान के लोगों को वेदों और अवेस्ता की भाषा की निकटता बारे में कोई सन्देह नहीं है। वेदों में "यज्ञ" शब्द है और अवेस्ता में "यश्न"। यह माना जाता है कि इसी से आज कल का हिन्दी/उर्दू शब्द "जस्न/जसन्" (उत्सब, त्यौहार) आया है।
और कई विद्वानों का कहना है कि "अहुर" का मतलब प्रकाश होता है। संस्कृत में असुर मतलब "सूर्य" भी होने का जिक्र ऊपर हो चुका है।
जिस तरह वेद में असुरों को शुरू में देवता जैसा ही सम्मान दिया गया है और समय के साथ-साथ बदलाव आए और उनके प्रति नकारात्मक भाव विकसित किए गये हैं, उसी तरह जरथुस्त्रीय धर्म में भी शुरू-शुरू में "दैव", "दाएव", "दैउअ" आदि को देवता लेकिन गलत या झूठे देवता, त्यागने लायक देवता कहते-कहते धीरे-धीरे उनके प्रति विल्कुल नकारात्मक भाव क बिकास किया गया है। स्मरणीय है कि यद्यपि जरथुस्त्रीय धर्मग्रंथों में वेदों में जैसा "देव" शब्द नहीं है, फिर भी क्या यह सम्भव नहीं है कि "दैव", "दाएव" आदि शब्द देव शब्द से जुड़े हों?
भले ही आधुनिक ईरान और आसपास के क्षेत्र में इस्लाम धर्म है, वहां अब भी प्राचीन जराथस्त्र धर्म के समय की किम्बदंतियां सुनने को मिलती हैं। अज़रबैजान में सन् 2010 के एक डाक टिकट में, एक "दिव" (भूत) दिखाया गया है, जिसके दो सींग, लम्बे दांत, डरावना राक्षस का सा जिस्म आदि दिखाया गया है। लोगों का मानना था कि उस प्रकार के दिव् या भूत-प्रेत से मानसिक या शारीरिक बीमारियां होती हैं। ईरान की भाषा में अभी भी मानसिक बीमारियों को "दिवानगी" कहते हैं। लोग मानते थे कि "दिव" जादू, माया और तिलस्मी कला में माहिर होते हैं और इसी वजह से शक्तिशाली होते हैं। किम्बदंतियों के अनुसार वीरों ने कई दिवों को युद्ध में मार डाला, कुछ दिव ने जीवनदान के बदले में दासत्व स्वीकार कर लिया।
फिरदौसी (जन्म सन् 950 आसपास) के प्रसिद्ध काव्य शाहनामे का हवाला देते हुए लोगों ने दिवों के बारे में कई अनुमान परोसे हैं। उन अनुमानों से ऐसा लगता है शायद अहुरमज्द को मानने वाले लोग दूसरे लोगों को दिव कहते थे। शाहनामे के अनुसार मजन्दारन दिवों की भूमि थी। यह मजन्दारन कहाँ रहा होगा, इसके भी कई अनुमान लगाए गए हैं और उनमें से एक भारत का एक क्षेत्र भी है।
लेकिन वेदों के असुर शब्द और प्राचीन ईरान के अहुर शब्द के बीच वास्तविक संबंध क्या है? इसी प्रकार, प्राचीन ईरानी (या अवेस्ता), के दैव, दाएव आदि और आज के "दिव" शब्दों का वेदों के शब्द "देव" से संबंध है? अगर है तो कोई ठोस प्रमाण है? हो सकता है लोग यह सब बातें समय के साथ् भूल गए, ऐसी बातें स्वयं धूल हो गईं। यह भी हो सकता है कि प्राचीन ईरान की बहुत सारी चीजें पहले युनानी (ग्रीक) और बाद में मुस्लिम हमलों से ऐस नष्ट होकर राख हो गई हों।
इस बात का भी कोई ठोस सबूत नहीं है कि दोनों में कोई संबंध नहीं है। जो भी हो अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जरथुस्त्रीय धर्म के अधिकांश लोग ने दूसरा धर्म अपनाया है। अपने धर्म की रक्षा के लिए उनमें से कुछ भारत की उन्हीं देवों कि भूमि की ओर आ गए थे, जिनकी सन्तति को भारत में पारसी के नाम से जाना जाता है।
कभी-कभी एक ही सामाजिक प्रणाली से संबद्ध दो समुदाय पहले कुछ विशेष कारणों से थोड़ा अलग हो सकते हैं और बाद में अपनी दूरी बढ़ा सकते हैं। प्राचीन काल में गांव-गांव में छोटे-मोटे राजा का होना और उनके बीच लड़ाई झगड़ा होते रहना कोई अचम्भे वाली बात नहीं। दुनिया के इतिहास में एक समुदाय किसी एक छोटी-सी बात को लेकर दो समुदायों बँट जाने और समय के साथ उनके बीच की खाई बढ़ते जाने की कई मिशाल मिलेंगी। कहीं असुर और देव के बीच ऐसा ही कुछ तो नहीं हुआ था?
सोच और बहस के पैर लग ही गये हैं तो क्यों प्राचीन ईरान में सिकुड़कर रहे? प्राचीन इतिहास में कभी एक देश या साम्राज्य दूर-दूर तक फैलता था तो कभी किसका। इसी डोर को पकड़कर असुरों की तलाश में ईरान से भी दूर इराक और सीरिया के बीते हुए दिनों में भटकना शायद बेतुका सफर नहीं होगा।
मैंने पहली बार जब यह सुना कि सीरिया को प्राचीनकाल में अस्सिरिया और वहां की सभ्यता को अस्सिरियन कहते हैं तो अचानक मन में एक सवाल उभरा और सोचने लगा कि कहीं इन शब्दों का संबन्ध वेदों के असुर शब्द से तो नहीं? लेकिन इस सोच को पकड़कर आगे जाने के लिए उस समय एक तिनका भी नहीं मिला, उस सम्भावना के पीछे हाथ धोकर पड़ने की कोई आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। बहुत समय के वाद जब यह सुना कि वर्तमान ईराक में "अशुर" (या अस्सुर) नामक प्राचीन शहर का खण्डहर है तो सालों से सोया और दबा हुआ वह सवाल फिर से जाग उठा।
उस खण्डहर के आसपास से ईसा पूर्व करीब 2500 से चौदहवीं शताब्दी तक मानव आबादी के प्रमाण मिले हैं। सुना है उस शहर के संरक्षक देवता का नाम भी अशुर था। उसी एक छोटे शहर से बाद में विशाल अस्सिरिया (या सीरिया) साम्राज्य फैल गया। अस्सिरिया साम्राज्य के तहत कभी वर्तमान के इराक, सीरिया, तुर्की, इज़राइल, ईरान के भूभाग और अन्य क्षेत्र शामिल भी थे।
ईसा पूर्व 2000 के आसपास में, पुजुर अशुर-प्रथम नाम के राजा ने वहां पर शासन किया था। उस वक्त शायद हर एक शहर के अपने-अपने देवता होते होंगे। लेकिन धीरे-धीरे अशुर न सिर्फ सीरिया के बल्कि समूचे मध्यपूर्व के संरक्षक देवता हो गए। उस क्षेत्र में कई राज्य थे। कभी-कभी एक ही वक्त में 2-3 बड़े राज्य भी होते थे। राज्यों के बीच लड़ाई, राज्यों का टूटना, फिर संघ बनना आदि होते रहते थे।
पिछले समय के कुछ अशुर राजाओं में, अशुरनसिरपल प्रथम (करीब ई.पू. 1000) अशुरनसिरपल द्वितीय (करीब ई.पू. 870 ईसा), अशुरबानिपल (640 ईस्वी) और कुछ अन्य राजा उल्लेखनीय हैं। बाद के दो राजाओं में पहला राजा बहुत क्रूर था। राजा अशुरबनिपल की कहानी अलग है। उन्होंने एक विशाल पुस्तकालय बनाया। उस वक्त लिखने लिखाने के लिए कागज नहीं थे। अशुरबनिपल के पुस्तकालय में मिट्टी में लिखकर सूरज के धूप में सुखाई गई कई पुस्तकें, कागजात, संधि, दस्तावेजों को संकलित किया गया था। उत्खनन में पाई गई कुछ सामग्रियों को अच्छी स्थिति में पाया गया था। मध्यपूर्व के कुछ प्राचीन इतिहास इन्हीं दस्तावेजों के जरिये संकलित किये गये हैं। यह क्षेत्र अपने जमाने में तकनीकि, गणित, कृषि आदि में भी विकसित था। पश्चिम के लोग इस क्षेत्र को सभ्यता का उद्गम स्थल (क्द्धठ्ठड्डथ्ड्ढ दृढ क्त्ध्त्थ्त्न्न्ठ्ठद्यत्दृद) भी कहते हैं।
अब बार-बार इतना बड़े क्षेत्र को अपने अधीन में रखने वाले, सीरियाई साम्राज्य (या अशुर सभ्यता) का प्रभाव पड़ौस के ईरान नहीं पड़ा होगा? क्या इस प्राचीन सीरिया (या अस्सिरिया) का "अशुर" (या अस्सुर) शब्द ईरान में पहुंच कर "अहुर" बन गया होगा?
सीरिया, इराक और तुर्की से तल्लुकात रखने वाले कुछ लोगों के नामों में अभी भी असुर को याद दिलाने नाम असुर, अशूर, अशुरिना (महिलाएं), अशो आदि मिल सकते हैं। यहां स्मरण कराना अप्रसांगिक नहीं होगा कि आधुनिक भारत में लोगों के नाम में "देव" वा "देवी" पाया जाना आम-सी बात है। आम बात शायद इसलिए है कि भारत प्राचीनकाल से अपने कुछ सांस्कृतिक आयाम में आज तक अभिछिन्न और अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। लेकिन अशुर क्षेत्र के लोग बारी-बारी करके यूनानी, ईसाई और इस्लाम के प्रभाव के अन्दर आ चुके थे और उस भूमि के कई सांस्कृतिक नक्से में एक से अधिक बार आधारभूत बदलाव आते रहे। इसका यह मतलब नहीं कि भारत इन सब प्रभावों से अछूता रह गया था। प्रभाव के इस सिलसिले में एक बात और। यूनानी राजा सिकन्दर अस्सिरियाई और ईरानी जमीन को रौंदते हुए भारत तक आए थे (ई.पू. 326 के आसपास)। यद्यपि उनका भारत अभियान बहुत छोटे समय के लिए था और वह अभियान उत्तरी भारत के छोर तक ही सीमित था, फिर भी उनका प्रभाव आज भी भारत में देखने को मिलते हैं। लोगों के नामों में (सिकन्दर), शहर के नामों में (सिकन्दराबाद), मुहावरे में (जो जीता वही सिकन्दर)।
तो क्या उतना शक्तिशाली और उन्नत, सीरियाई साम्राज्य (या अशुर सभ्यता) का प्रभाव पड़ौस के ईरान पर नहीं पड़ा होगा?
एक और अजीब-सी बात है। एक अशुर राजा की मूर्ति के पीछे बड़ी-सी चिड़िया के पर और एक गोलाकार या चक्र (शायद सूरज का प्रतीक) दिखता है। ये दोनों चीजें अहुरमज्द के मन्दिर या जारस्थुत्रीय धर्म को याद दिलाने का स्थान या चीजों में भी देखने को मिलता है। ऐसा लगता है कि चिड़िया का पंख और चक्र (गोलाकार रिंग) या तो प्राचीन ईरानी संस्कृति का प्रतीक था और इसका प्रभाव मध्यपूर्वी सभ्यता पर पड़ा था या यह मध्यपूर्वीय संस्कृति का प्रतीक था और इसका प्रभाव ईरान में पड़ा था। बेशक यह कहा जाता है कि सूरज के प्रतीक एक गोलाकार वस्तु और चिड़िया के जैसे पर प्राचीन मिस्र के मिथक में भी पाया जाता है (जैसे सच्चाई और न्याय की देवी माआत या मेआत)। कहीं पंख का और असुर का आपस में कुछ संबन्ध तो नहीं? जिस तरह ये निशान प्राचीन ईरान और मध्यपूर्व में मिलते हैं, उसी तरह भारत में दिखाई नहीं देते हैं। क्या देव और असुर संस्कृतियों की अलग पहचान इन चीजों से भी की जा सकती है? वैसे तो यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अति विशिष्ट वैदिक यज्ञ "अग्निशयन" में विभिन्न ज्यामितीय गणना के अनुसार बनाए गए ईंटों से एक पक्षी के दो पंख बनाया जाता है और उन दो पंखों के बीच में गोलाकार हवन का निर्माण किया जाता है। यह सब बातें किसी तरह जुड़ी हुई हैं अथवा मात्र केवल संयोग है?
किसी एक वक्त (ई.पू. चार-पांच शताब्दी) ईरान के राजा सारा अस्सिरियाई क्षेत्र को अपने अधीन करते हुए यूनान तक पहुंचे थे। यूनान में एक कमिथ्रर (मित्र?) नामक सम्प्रदाय की उत्पति शायद उसका प्रभाव था। स्मरण रहे कि मित्र प्राचीन ईरान के भी देवता रहे हैं। यहूदियों के धार्मिक ग्रन्थ में उस ईरानी राजा का आदर सहित नाम लिया गया है जो किसी विदेशी राजा को नसीब नही हुआ था।
बौद्ध धर्म अपने जन्म स्थल से दूर श्रीलंका, बर्मा, चीन, तिब्बत, थाईलैंड, कंबोडिया आदि देशों में बिना कोई लड़ाई के फैला था। अशुरों ने मेसोपोटामिया, बेबीलोन, अक्केड़िया आदि से विरासत में मिला तकनीक गणित को और विकास किया जिसे आज भी हम प्रयोग करते हैं।
अशुर सभ्यता का कुछ प्रभाव तो आज तक भारत में भी देखने को मिलता है। अशुर सभ्यता (तथा प्राचीन सीरियाई सभ्यता) की गणित 1 से 10 तक के गिनती पर नहीं, 1 से 60 तक गिनती पर आधारित था। शायद इसी के प्रभाव से आज भी हम लोग समय मापन में एक मिनट में 60 सेकेन्ड और 60 मिनट में एक घन्टा वाली प्रणाली अपनाते हैं। वृत्त मापन में भी यही प्रणाली अपनायी जाती है। आज के ईराक के आसपास एक क्षेत्र के लोग हाइरोग्राफिक लिपि (अक्केडियन लिपि) प्रयोग करते थे। ईरानियों ने भी एक लिपि का अविष्कार किया जो देखने में तो अक्केडियन लगता था, लेकिन वे आजकल की देवनागरी लिपि की तरह के ही अक्षर थे। यह सब इसलिए जिक्र किया जा रहा है कि विश्व इतिहास में एक संस्कृति या तकनीकि दूर-दूर के देश तक पहुंच सकते हैं और प्रभाव कर सकते हैं। कभी ईरान का कोई भी प्रभाव पूरे मध्यपूर्व (अशुर क्षेत्र) मिस्र, तुर्की, ग्रीस, उत्तरी भारत में फैल गया था। फिर कभी ग्रीस का प्रभाव अशुर क्षेत्र, ईरान से लेकर उत्तरी भारत तक था। भारत के सम्राट अशोक के समय में बुद्ध धर्म ईरान तक फैला हुआ था।
वेदों में पाया जाने वाला शब्द "असुर", प्राचीन ईरानी धर्म से जुड़ा हुआ शब्द "अहुर" और मध्यपूर्व का "अशुर" या "अस्सुर" आपस में सम्बन्धित हैं या नहीं? अगर है तो किस तरह से? इधर का प्रभाव उधर पड़ा या उधर का प्रभाव इधर पड़ा, कौन यकीन के साथ कह सकता है? लेकिन यह सोचना गलत होगा कि देश-देश के बीच मुठभेड नहीं हुआ होगा, सांस्कृतिक विनिमय नहीं हुआ होगा। पुराने जमाने में दो देशों के बीच जंग होते रहते थे, नरसंहार होते रहते थे। हारने वाले की संस्कृति, धार्मिक धरोहर को मिट्टी में मिलाया जाता था। शहरों को आग मे झोंक कर राख बना दिया जाता था और जिसकी जीत होती है वही इतिहास लिखते हैं। उसमें हारने वाले कहीं नहीं होते थे। अगर होते भी तो नकारात्मक रूप में, नीचा दिखा के।
ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के बावजूद अनेक चीजें जमीन के अन्दर से, पत्थरों से, गुफाओं से, कहानियों से, इतिहास से, खण्डहर से निकल आते हैं जो जिज्ञासा के बीज बो देते हैं। जैसे आधुनिक ईराक के एक क्षेत्र को कभी (सन् 200 के आसपास) असोरिस्तान (अशुर का स्थान) कहते थे। यहां पर अशुर (अस्सिरिया) क्षेत्र में ईरानी शब्द "स्तान" (संस्कृत "स्थान") का प्रयोग उल्लेखनीय है। यह नाम शायद जब सारा अस्सिरिया क्षेत्र विशाल ईरान साम्राज्य के अधीन था, तब उस क्षेत्र को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में दिया गया होगा। फिर बहुत पहले अशुर राजाओं ने वेदों के इन्द्र, मित्र आदि देवता मानने वाले पड़ौसी राज्य (ई.पू. 1500-1300) को धूल में मिला दिया था। उस जंग का वर्णन ऋग्वेद में वर्णित इन्द्र, वृत (एक असुर) त्वष्ट्री आदि की लड़ाई को याद दिला सकता है।
पौराणिक कहानी, मिथक और किंवदंती, अद्भुत हैं, तिलस्मी होते हैं, अविश्वसनीय होते हैं। उनमें जानवरों के सिर पर मनुष्यों का शर, मनुष्य के शरीर पर जानवर के शर वाली कहानियां होती हैं। ऐसी पौराणिक कहानियों को आधार बनाकर कैसे कहा जा सकता कि क्या हुआ होगा, क्या नहीं हुआ होगा?

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