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बुजुर्गों से कुछ बातें
क्या विडम्बना है कि नितांत असहाय शिशु के रूप में जन्म लेने वाला मनुष्य पहले तो बढ़ते-बढ़ते, "वृद्धि" करते-करते उस स्थान तक पहुँच जाता है जहां केवल वह ही नहीं, उससे संबंधित लोग भी उसे शक्ति का पुंज समझने लगते हैं, पर बाद में इस "वृद्धि" की परिणति यह ...
उत्तर भारत की लोक कथाओं के संदर्भ
लोक कथाएं हमारी संस्कृति, परम्पराओं और नित्य की जीवन शैली में इस प्रकार रची बसी हैं कि उनसे अपनी धरती की सोंधी मिट्टी की सुगंध, मधुर बयार की ताजगी, कलकल करती नदियों की शीतलता और गुनगनी धूप की गर्माहट अनुभव की जा सकती है। लोेक कथाएं अनादिकाल से मौख...
पंजाब की लोककथाओं का संसार
लोक साहित्य जनमानस की सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यह प्राचीन समय से मौखिक रूप में प्रचलित है। परन्तु आज कुछ लोकसाहित्य को लिपिबद्ध किया गया है। लोक साहित्य सदैव भाव प्रधान रहा है, इसमें मानव हृदय की गूँज सुनाई देती है। यह लोकगीत, लोकशिल्प, लोक...
बुन्देली साहित्य में लोक कथाएं
प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नरः - महर्षि व्यास ने सत्य ही लिखा है कि लोक जीवन का प्रत्यक्ष ज्ञान ही जीवन को उसके मंगल कलश रूपी अन्तः वाह्य को जानने का एक आधार है। लोक जीवन मानव जीवन को सम्पूर्णता से समझने का माध्यम है। लोक जीवन भौतिक और ...
रस प्रधान भारत और चीनी स्वाद
पश्चिमी लोगों के ख्याल में स्वाद या रस का मतलब केवल शारीरिक जरूरत मिलने के लिए है, सौंदर्यबोध से संबंध नहीं रखा जाएगा। प्लेटो ने कहा था कि अगर हम कहते हैं कि स्वाद और सुगंध न केवल प्रसन्नता है बल्कि सुन्दर भी है, तो लोग हम पर हंसी उड़ाएंगे। इस बात ...
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