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हस्तक्षेप का कवि विनोद कुमार शुक्ल
01-Aug-2017 11:21 PM 4089     

विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवि हैं। अपनी कविता में उन्होंने तमाम ऐसे विषयों को जगह दी है, जिसकी जरूरत आज समाज में सबसे ज्यादा है। तेजी से भागती दुनिया में पीछे छूटे हुए लोग, रौंदी गई, लुटी गई चीजें, सताई गई जातियां, संरक्षण के नाम पर नेस्तनाबूद की गई संस्कृतियां तथा सहमे, निरीह लोगों का हूजूम उनकी कविताओं का खास हिस्सा है। इनकी कविता दखल की कविता है। तथाकथित सभ्य समाज को आईना दिखाती हुई, सभ्यता की आड़ में पनपते हैवानियत का पर्दाफाश करती हैं ये कविताएं। विकास के पैमानों ने बसी-बसाई दुनिया उजाड़ने का भी काम किया है। एक ओर शहर बने जिसकी कीमत हमारी जमीन, पेड़-पौधे और उन पेड़ों पर बसेरा ली हुई चिड़ियों ने चुकाई। जीता-जागता हिस्सा शहर की भेंट चढ़ गया। शहर इतनी तेजी से फैला कि कवि अब शहर से सोचता है। "शहर से सोचना" सब कुछ बदल जाने की ओर संकेत करता है। बदले हालातों में उजड़े लोगों के सपने किस तरह टूटते-बिखरते चले जाते हैं कि इसे सँभालने, सहेजने शहर नहीं आता। वह तो सोच पर भी काबिज हो जाता है। "शहर से सोचता हूँ" कविता में विनोद कुमार शुक्ल दिखाते हैं कि उजड़े परिवार के सपने कैसे कुचल दिए जाते हैं। उजड़ा आदिवासी परिवार अपने खोए पेड़ देखता है-
शहर से सोचता हूँ/कि जंगल क्या मेरी सोच से भी कट रहा है/जंगल में जंगल नहीं होंगे/तो कहाँ होंगे?/शहर की सड़कों के किनारे के पेड़ों में होंगे
कवि विकास के नाम पर उजाड़े जा रहे आदिवासियों के पक्ष में खड़े हैं। वन संरक्षण के नाम पर जिन आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, उसे वे भली-भाँति समझते हैं। जंगल आदिवासियों का घर है और अपने इस घर की सुरक्षा वे पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। उन्हीं जातियों को वहाँ से सरकारी संस्थाएं अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए जबरन खदेड़ रही हैं। आदिवासी प्रकृति के सबसे नजदीक है। जल, जंगल, जमीन उनके अंग की तरह है। उन्हें वहाँ से बेदखल करना उनके अंग को काटने जैसा है।
जो प्रकृति के सबसे निकट हैं/जंगल उनका है/आदिवासी जंगल के सबसे निकट हैं/इसलिए जंगल उनका है
आकाश जितना तारे का और पेड़ जितना पक्षी का अपना है, उसी तरह जंगल भी आदिवासियों का सगा है। उन्होंने हजारों साल उसे पशु-पक्षियों समेत बचा कर रखा है। वे जंगल के करीब हैं, उनका बेदखल होना खतरे की घंटी है। आदिवासियों से अधिक जंगल के लिए और समूची दुनिया के लिए। जहां जंगल से आदिवासी बेदखल हुए, वो नष्ट होता गया। पृथ्वी पर मनुष्य के हित में अब पर्यावरण विमर्श चल रहा है, विनोद कुमार शुक्ल आदिवासियों की बेदखली के साथ आकाश से तारे व चांदनी और पेड़ से पक्षी के बेदखल के दृश्य प्रस्तुत करते है। पेड़ों के अँधेरे में दुबककर आदिवासियों का विलाप करना दिल दहला देता है। ये कविताएं शहरी सभ्यता को बेनकाब करती हैं। कवि कविता को माध्यम बनाकर हस्तक्षेप करते हैं। बेघर, बेबस आदिवासी समुदाय को कविताओं में लाना शहरी सभ्यता के झूठे आवरण को तार-तार करना है।
भविष्य के गर्भ में उल्टा पड़ा हुआ है/बहुत गरीब बच्चा/ वर्तमान में पैदा हुआ
वर्तमान समाज पर बहुत बड़ा व्यंग्य है यह। विकास के सारे दावे खोखले हैं। वर्तमान युग में भविष्य का पता नहीं। ऊँची दीवारों के घरों में रहने वाले लोगों को झोपड़ियों की अंजर-पंजर हालत नहीं दिखती। ऐसी झोपड़ियों में विनोद जी की कविताएं जाती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने "कविता की आवश्यकता" पर बल दिया था। सवाल जब ऐसे बेघर, मज़लूम लोगों का हो तो कविता की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। वे व्यंग्य करते हैं-
फ़िलहाल सूखा है/इसलिए वसूली स्थगित/पिटते हुए आदमी के बेहोश होने पर/जैसे पीटना स्थगित
फिलहाल वसूली स्थगित होने पर कवि व्यंग्य करते हैं जैसे पिटते आदमी के बेहोश हो जाने पर पिटाई स्थगित हो जाती है, कुछ वैसी ही वसूली स्थगित हुई है। इनके व्यंग्य तीक्ष्ण हैं। "कला, साहित्य और संस्कृति" में माओ-त्से-तुंग कहते हैं, "व्यंग्य का प्रयोग शोषक वर्ग का पर्दाफाश करने के लिए होना चाहिए।" विनोद कुमार शुक्ल के व्यंग्य भी कदम-कदम पर शोषक वर्ग का पर्दाफाश करते हैं। भयंकर वातावरण को शब्दों का रूप देना इनके बस का है। "रायपुर-बिलासपुर संभाग" की हर पंक्ति एक नया सवाल छोड़ती है। उसका हर प्रश्न चोटिल करने वाला है। कवि की दृष्टि सभी प्रदेशों को एक साबुत बैल के रूप में देखती है। उनका बिखरना बैल यानी आर्थिक पक्ष के बिखरने जैसा है -
मर गया प्रदेश/मर गई उसी जगह पड़ी हुई जगह/उत्तरप्रदेश, राजस्थान/बिहार, कर्नाटक, आंध्र/बिखर गई बैलों की अस्थिपंजर-सी सब जमीन उत्तर से दक्षिण
कवि की कुशलता इस बात में है कि राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक सभी पहलू एक साथ उनकी कविता में आते हैं। यह शब्द साधने की कला से संभव नहीं, वरन् उनके भीतर का गहरा दुख है, जो शब्दों में ढलकर, पिघल कर बहता है। खेतिहर आदमी को जमीन से बेदखल करने पर केवल वही नहीं मरता, जमीन भी मर जाती है। बच जाता है तो सिर्फ निशान, जिसे हम नक्शे में देखते हैं। इसी बेबसी का चित्र कवि की कविताओं में है। भूखे, विस्थापित बच्चों में जमीन पर गिरी रोटियों की छीना-झपटी का दृश्य रूआँसा कर देने वाला है।
अचानक तब इकट्ठे भूखे-नंगे लड़कों में/होने लगी उसी की छीना-झपटी/मेरी छाती में धक् धक्
क्यों नहीं विस्थापन रोकने लाल झंडा आता? कवि का प्रश्न उन लोगों से है जो सर्वहारा के उत्थान और उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने की बात करते हैं। समूची धरती उजड़ी जा रही है तब क्यों नहीं रोकते वे उसे। "अचानक मार" कविता में "अचानक मार" जंगल की छोटी मगर मर्मस्पर्शी गाथा है, जो शहर के अचानक मार से सिकुड़ कर रह गया है। वहां के जंगल छुही मिट्टी की भीत पर उग आए हैं-
जंगल में आदिवासी बैगा की एक झोपड़ी दिखी/झोपड़ी की मिट्टी की दीवाल पर/छुही मिट्टी और गेरूए से पेड़ बने हैं
विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में जीवन जीते रहने की आदत है। यहाँ हताशा नहीं, संघर्ष है। वे अपना हिस्सा छीनकर लेने की बात करते हैं। कविता में कहीं वे अदने आदमी हैं, लेकिन ऊँचे पहाड़ों के लिए चिन्तित हैं, तो कहीं बदलती दुनिया में जब सब कुछ पीछे छूटा जा रहा है, तब उन्हें अपने पूर्वज याद आते हैं। नई पीढ़ी जब अपने पूर्वजों का बहिष्कार कर रही है ऐसे में उसे कविता और जीवन में महसूस करना उनकी खासियत है। पूर्वजों के रूप में अनुभव के संसार को बचाए रखने की ज़िद है। "कुछ होना बचा रहेगा" संग्रह की कविता में उन्हें अपने पूर्वज बड़ी शिद्दत से याद आते हैं। कविता में विभिन्न ध्वनियाँ हैं। सबमें कुछ नया घटित होता है। जो खो गया है उसकी अनवरत तलाश कविताओं में है। यह सहज नहीं, यह जानते हुए भी कवि उसे वापस लाना चाहते हैं "मानुष मैं ही हूँ" कविता एक ओर बाजार की बोतलबंद सामानों के चलन के खिलाफ है, तो दूसरी ओर विभिन्न भाषाओं में बँटे लोगों के भीतर मनुष्य की तलाश है-
मानुष मैं ही हूँ/इस एकांत घाटी में यहाँ मैं मनुष्य की/आदिम अनुभूति में/साँस लेता हूँ
बीमार आदमी जो गरीब भी है। वे उसकी झोपड़ी में सबसे विशेषज्ञ डॉक्टर आने की उम्मीद रखते हैं। डॉक्टर आ कर बीमार की देखभाल उस तरह से करे जैसे घर के लोग करते हैं। "सबसे गरीब आदमी की" कविता सरकारी अस्पताल की दुर्दशा को बेनकाब करती है साथ ही गरीब व्यक्तियों की खस्ता हालत किसी से छुपी नहीं है-
बीमार को सरकारी अस्पताल/जाने की सलाह न दे/सबसे सस्ता डॉक्टर भी/बहुत मँहगा है
जिस देश की तरक्की के गुण गाए जाते हैं, उसकी असल स्थिति यह है। लोग मर रहे हैं, धरती मर रही है। दोहन इतना अधिक है कि कुछ भी छूटा नहीं। ऐसे समय में विनोद कुमार शुक्ल पहाड़ों को अपना घर बनाना चाहते हैं। आज जबकि मुनाफे के लिए पहाड़ों की तोड़-फोड़ जारी है तब। उनका पहाड़ों की ओर लौटना उस आदिम संस्कृति की ओर लौटना है, जो पर्वतों, पहाड़ों और गुुफाओं का संरक्षण करना जानती थी-
पहाड़ पर एक घर बनाऊँगा/रहने के लिए एक गुुफा ढूँढूगा/या पितामह के आशीर्वाद की तरह
समय तेजी से आगे बढ़ रहा है। घर टूट रहे हैं। रिश्ते-नाते भी छूटे जा रहे हैं। ऐसे में कवि जैसे समय को थाम लेते हैं। उन्हें ईश्वर नहीं चाहिए, जो किसी का भला नहीं करता, उसके बदले उन्हें एक पड़ोसी की तलाश है। वे पड़ोसी के लिए प्रार्थना करते है। विकास के तमाम दावों के बीच लोगों का बँटवारा तेजी से हुआ है। यहाँ तक कि बोली-भाषा को लेकर भी झगड़े होने लगे हैं। ये झगड़े हिंसात्मक स्तर तक आ गये हैं। बिहारी बोलने वाले व्यक्तियों के साथ मराठी प्रदेश में होने वाली हिंसा किसी से छुपी नहीं है। इस संदर्भ में वे भाषाई कट्टरता के दहशत, झगड़े पर कड़ा व्यंग्य है यह। बोली-भाषा के झगड़े की वर्चस्ववादी नीति खून-खराबे तक पहुँच गई है-
बोली-भाषा के झगड़े में/एक गूंगे का मरना निश्चित है
राजनीति का चेहरा कुरूप और अत्यंत वीभत्स है। जैसे हैवानियत इसके मूल में हो। वह जनता का खून पीने की आदी बन चुकी है। जहां खूबसूरती थी उसे राजनीति ने उजाड़ डाला। प्रजा के हिस्से में गरीबी है। यह पहले भी था, स्थिति अब भी वही है। चुनावी दिनों के वादे चुनाव के बाद उड़ जाते हैं, इस झूठी राजनीति को बेनकाब करती विनोद कुमार शुक्ल की ये पंक्तियां बाबा नागार्जुन की याद दिलाती हैं-
छत्तीसगढ़ी में वह झूठ बोल रहा है/कि अब अच्छे दिन आएँगे/सुन कर सभी भूखे-प्यासे/औरतें छोटे-छोटे बच्चे बूढे लोग/बहुत बुरे दिनों को लादे/लौट जाते हैं
विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं पर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होता है कि कविता में इन्होंने महत्वपूर्ण विषयों को उठाया है। विषय जो पीछे छूट गये हैं, जिन्हें मिटाने की पुरजोर कोशिश हो रही है, कवि बार-बार उन्हें कविता में लाते हैं। उनकी सपाटबयानी गजब प्रभाव उत्पन्न करती है। यह प्रभाव हस्तक्षेप करता है, इस समय-समाज में।

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