ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-16 राक्षस और उनका कुल अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
01-May-2017 08:23 PM 2482     

वाल्मीकि एक "ऐन्द्रजालिक" जगत में रहते थे। उनके समय में आकाश से आकाशवाणी होती थी, वायु दौड़ती थी और जल गाना गाता था। समुद्र, पर्वत, वन और वृक्ष संवेदना दिखलाते थे। जीव-जंतु, पक्षी और जंगली जानवर मनुष्य के मित्र होते थे। वह आज के समय के परियों की कहानी जैसा प्रतीत होता था, पर वाल्मीकि के लिये वह सब वास्तविक था। उनका काव्य, दृश्य का जैसे सदृश्य वर्णन करता हो। वह कहानी के पात्रों की मनोदशा का भलीभाँति अवलोकन करते थे। जंगल में व्याकुल अवस्था में भटकते राम का पेड़, पौधे और लता-पताओं से सीता के बारे  में पूछना वास्तविक-सा लगता है।
भारत के आदिकाल में शायद सजीवता वृहद सोच का हिस्सा था। यदि सभी वस्तुओं का स्रोत एक ही हो तो उन सभी वस्तुओं में मूल वास्तु की ही सृजनात्मक शक्ति होती है। सृजनात्मक शक्ति ही जीवन है और वही व्यवस्था है। यह मनुष्य को ज्ञात नहीं है कि जीवन अपने आप को व्यवस्थित करने के लिए बड़ी संख्या में दिखने वाली वस्तुओं का सृजन कैसे करता है, पर कैसे माना जा सकता है कि सभी वस्तुयें एक ही तरह से वजूद में है। "श्वाँस" लेने का मतलब नासिका से वायु लेना-छोड़ना नहीं है, बल्कि यह तो बस अस्तित्व का संकेत है। यदि कोई वस्तु श्वाँस लेती है तो उसमें अभिव्यक्ति होती है, भले ही हम उसे सुन न पायें।
जीवन की निरंतरता के पुराने विश्वास के सिद्धांत के अनुसार, मनुष्य जीवन कई तरह से अस्तित्व में था। कई प्रारूपों में तो दिखने वाली शारीरिक संरचना नहीं होती है, पर वह अपना कार्य करते हैं, अपनी उपस्थिति का अहसास कराते हैं और मानव की रूप में पुनर्जन्म लेते है। ये प्रारूप गुणों के अलग-अलग अनुक्रम का मानचित्र बनाते हैं और ऐसे भाव जो पृथ्वी पर मानव के रहने के लिए आवश्यक है। कुछ काल्पनिक अदृश्य वस्तुयें, किये गये सद्कर्मों के आधार पर जो जीवनोपरांत पुनर्जन्म लेकर नये रूप में अवतरित होती हैं। वेदों के अनुसार मनुष्य, जन्म और पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
इस सिद्धांत के अनुसार, मनुष्य के कुकर्म संसार में अन्धकार और विनाश से जुड़े हुये हैं और भूत और पिशाच के रूप में अँधेरे में कार्य करते हैं। दूसरों को डराना तो मानो इनकी मनोवृत्ति हो। पुराने विश्वास के अनुसार, रात्रि दिन का विनाश है और सूर्यग्रहण में यह समझा जाता है कि सूर्य को "दैत्य" खा लेते हैं। इस तर्क के अनुसार बीमारियाँ दैत्यों के कारण होती हैं और मृत्यु बड़े शक्तिशाली दैत्य के कारण होती है। जीवन में सुख और शांति बनाये रखने के लिए दैत्यों को दूर रखना चाहिये। पश्चिमी सिद्धांतों में ये कई तर्क एक साथ मिलाकर "दुष्टात्मा" के रूप में जाने जाते हैं।
पारंपरिक भारतीय विचारधारा के अनुसार "अच्छाई" और "बुराई" भाई-भाई माने जाते हैं, जो एक ही पिता और दो अलग-अलग माताओं से पैदा हुये हैं। "बुराई" के वंशज भी "अच्छाई" की तरह ही चतुर होते हैं पर उनका व्यवहार "अच्छाई" के हिसाब से विवेक रहित लगता है। वह भौतिकतावादी होते हैं और नम्रता से नफरत करते हैं। वह क्रोधी और आतुर प्रवृत्ति के होते हैं। "अच्छाई" की नज़र से उनको "असभ्य" समझा जाता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि "असभ्य" शब्द नैतिकता के अपने-अपने पैमानों के हिसाब से प्रयोग किया जाता है।
परंपरा औ संस्कृति परिभाषित करती है कि समाज किसे "मानव" मूल्यों के रूप में स्वीकार करता है। जो मूल्य इसके विरोध में होते हैं उसे "अमानवीय" समझा जाता है। हालाँकि यह शब्द स्थानीय तौर पर परिभाषित किये जाते हैं, पर कुछ नैतिक मूल्य जैसे "सत्य" और "अहिंसा" सार्वभौमिक रूप से "नेक" माने जाते हैं, क्योंकि दूसरों के साथ हिंसा करना और उन्हें कष्ट पहुँचाना अंत में स्वयं विनाश की ओर ले जाता है। वह व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह जो अपने स्वार्थसिद्धि या प्रभाव दिखाने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं, वह अक्सर यह भूल जाते हैं कि यही हिंसा एक दिन उनके अंत का कारण भी बनेगी। अल्पावधि के लिये हिंसा जीतती हुई नजर आती है और इसलिए शायद समग्र रूप में नीति वाक्य भ्रान्तिमय और मिथ्यापूर्ण प्रतीत होता है।
वाल्मीकि अपनी इच्छा के अनुसार समाज का प्रतिपादन करते हैं, जिसमें वह राम को सद्गुणों के आधार पर एक आदर्श पुरुष प्रस्तुत कर सके। ईमानदारी, सत्यता, धैर्य, करुणा और सहनशीलता इन सद्गुणों में शामिल है। इन गुणों के उलट, छल-कपटता, आतुरता, दुष्टता और जिद्दीपन, दुर्गुण होते हैं। वाल्मीकि की शब्दावली के अनुसार जो लोग इन दुर्गुणों को अपने व्यवहार में दर्शाते हैं वह "राक्षस" कहलाते हैं। वह मानव रक्तपान करते हैं और उनमें से कुछ नरभक्षी भी होते हैं। वह उग्र दिखने वाले होते हैं और उनका घृणित व्यक्तित्व क्रोध और अहंकार से पूर्ण होता है। वह दूसरों को परेशान कर उन पर ताकत और खून-खराबे के बल पर राज्य करते हैं। वह अपने दुर्गुणों के बल पर दौलतमंद, व्यवसायी और शक्तिशाली हो सकते हैं।
एक वंश वृत्तांत की कहानी में, वाल्मीकि ने राक्षसों को समुद्र के दूर फैले हुये भाग की निगरानी करने वाला मनुष्यों का समूह बतलाया है। ऐसा संभव है कि जुड़वाँ प्रजातियाँ बनाई हों, जिनमें से एक "यक्ष" जिनका मुख्य कार्य जंगल और पृथ्वी पर खाद्यान्न की रक्षा करेंगे, और दूसरे "रक्ष" जो समुद्री द्वीप समूहों पर रहेंगे और वहाँ के संसाधनों पर उनका एकाधिकार होगा। हो सकता है कि द्वीपों पर रहने का कारण कठिन परिस्थितियों से सुरक्षा के लिए उनकी ऐसी जीवन शैली बन गयी हो? उनका मुख्य भोजन माँसाहारी होगा और हो सकता है कि उसके कारण ही उनका ऐसा स्वभाव बना गया हो? एक कहावत यह भी है कि इन दोनों प्रजातियों ने प्राकृतिक भूसंपदा का संग्रह कर साधन संपन्न जीवन शैली बनाई थी। भारतीय मान्यताओं के अनुसार ये दोनों समूह चचेरे भाई हैं। "रक्ष" समूह "राक्षस" कुल के पूर्वज माने जाते हैं।
राक्षसों का समूह खोज और उद्यम के विषय में सीखने के कार्य में सक्रिय था। उनको प्राकृतिक जटिलताओं की जानकारी थी और आपदाओं से निपटना आता था। उन्होंने शारीरिक रूपांतरण की कला की भी खोज कर ली थी और अपने आप को सुरक्षित और आक्रमण करने के लिए कई रूपों में बदल लेते थे। हो सकता है कि कठिन परिस्तिथियों में अपने आप को जीवित रखने के लिए ये कलायें मददगार हों, पर वह इन कलाओं का उपयोग भू एवं संपदा को अर्जित करने के लिए भी करते थे। राक्षसों का राजा "रावण" युद्ध और छल के द्वारा कहीं से भी सुन्दर वस्तुयें एकत्रित करने के लिए जाना जाता था।  उस समय, कुछ राक्षस महिलायें रूपवान और होशियार बच्चे पैदा करने के लिये पृथ्वी की दूसरी प्रजाति के पुरुषों से सम्बन्ध बनाने की कोशिश करती थीं। रावण उसी प्रकार का एक अंश था, उसकी माँ राक्षस कुल से थी पर पिता एक ऋषि। इसी कारण रावण के दिमाग की तीव्रता, ऋषि जैसी और अहंकार एवं दुष्टता राक्षसों जैसी। उसका एक छोटा भाई "विभीषण" था, जिसमें राक्षसों जैसे दुर्गुण विकसित नहीं हो पाए थे। वह शाँत और संयमित था। वह अंत में, राम के साथ युद्ध में रावण की पराजय का अहम् कारण बना।
वाल्मीकि रामायण उस काल खंड में लिखी गई है, जब अधिकाँश आधुनिक निवास स्थान भारत के उत्तरी भाग में थे और दक्षिणी भाग की धीरे-धीरे खोज हो रही थी। सबसे पहिले "अगस्त्य" ऋषि ने ही उत्तर से जाकर दक्षिण के समुद्री क्षेत्र में आश्रम स्थापित किया। उन्होंने समुद्री पथ, जल प्रवाह और भौगोलिक स्थितियों का अध्ययन किया। आज के समय में इंडोनेशिया के लोग ऋषि अगस्त्य को सबसे पहिले उस द्वीप की खोज करने का श्रेय देते हैं। रामायण की कहानी में अगस्त्य ऋषि राम को रावण से युद्ध में जीतने के लिए कई सुझाव देते हैं। वह बतलाते हैं कि रावण से जीतने के लिए सूर्य से ताकत लेना बहुत ही आवश्यक है। उन्हें सभी प्रकार की बाधायें दूर करने का अनुभव था।
भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार मूल रूप से "नकारात्मक" गुणों वाले चचेरे भाई "दानव" कहलाते हैं और वह "दनु" के वंशज है, जबकि "सकारात्मक" गुणों वाले भाई "देव" कहलाते हैं। दोनों ही शब्दों की शुरुआत का अक्षर "द" है, जिसका मतलब होता है, दया या दमा (अहंकार)। इस कहानी में खास बात यह है कि दोनों ही गुण जुड़वाँ पैदा हुये थे और हम सभी लोगों में ये दोनों गुण अलग-अलग अनुपात में होते हैं और वह अनुपात हमारे वंश, परवरिश पर निर्भर करता है। पौराणिक कहानियों के अनुसार देवों और दानवों में समुद्र में छुपे "अमृत" के लिये संग्राम हुआ। दानव, देवों पर भारी पड़े पर अपनी बुद्धिमत्ता से देवों ने जीत हासिल कर अमृत प्राप्त कर लिया। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि सच्चाई पर चलने वाले व्यक्ति को अपने जीवनयापन के लिये अपनी बुद्धिमत्ता पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है। दानवीय शक्तियाँ हमेशा से ही शक्तिशाली रही हैं।
वेदों में "असुरों" के बारे में जिक्र है, वह भी इसी प्रकार का "नकारात्मक" समूह है। भाषायी विश्लेषण के आधार पर शब्द "असुर" वह होता है जो "इन्द्रिय सुख" का आदी हो। यह जीवित व्यक्तियों का एक और वर्गीकरण है जिसके हिसाब से पहला समूह "सुर" कहलाते हैं, जो विचारशील और श्रेष्ठ जन होते हैं और दूसरा समूह "असुर" कहलाता है जो अदूरदर्शी और सीमित सोच वाले होते हैं। "असुर" स्वयं ही मनुष्य में विनाशकारी और राक्षसी गुणों की उत्पत्ति करता है।
"मायावी" रूप, स्वभाव में छल-कपटता और लड़ाई में ताकतवर होने के कारण, "राक्षस" सिद्धांत व्याख्याताओं द्वारा "काल्पनिक" माना जाता है। जैसे ही हम उन्हें शरीर के अन्दर ही विभिन्न ताकतों द्वारा संघर्ष के रूप में स्वीकार करते हैं, तो तर्क यथार्थ लगने लगता है। जब हम यह कहते हैं कि रामायण "अच्छाई" की "बुराई" पर जीत की कहानी है, तो उस समय हम भौतिक वस्तुओं की बात नहीं करते, अपितु हम स्वयं अपने जीवन का अवलोकन करते हैं और मानवतावादी मूल्यों  "अच्छाई" और अपनी सुविधानुसार स्वार्थी स्वभाव "बुराई" की तुलना करते हैं।

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