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हिंदी के "नामवर" यानी हिंदी के प्रकाश स्तम्भ
यह हिंदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है। सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिंह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं वे हमेशा खाली ही रहेंगी। इनमें से कई लोग नब्बे वर्ष के परिप...
विष्णु खरे का जाना
विश्व साहित्य को हिन्दी में अनूदित करने वाली एक ख़ास शख्सियत के जाने से अनुवाद की दुनिया को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई में बहुत समय लगेगा। अगर सिर्फ जर्मन-भाषी साहित्य की बात करें तो उस प्रदेश के कुछ नामचीन साहित्यकारों से परिचित कराने या फिर उस प...
विष्णु खरे : हिंदी का खरा कवि
विष्णु खरे (9.2.1940-19.9.2018) आलोचक थे, लेख लिखते थे, अनुवादक थे, कवि थे, फिल्म समीक्षक थे, संपादक थे, लेक्चरर भी थे, बहुत कुछ थे, आलोचना में कट्टरपंथी थे, उदारवादी भी थे। मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ कि तसल्ली देने में सचमुच अच्छे थे। कई लोगो...
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी का "दिनेश" अस्त
ऑस्ट्रेलिया को प्रवासियों का देश कहा जाता है क्योंकि वहां की आबादी में प्रमुखता विश्व के तमाम देशों से आए प्रवासियों की ही है। इनमें सर्वाधिक संख्या यूरोपीय देशों से आए लोगों में ब्रिटेनवासियों की है, वहीं एशियाई देशों से आए लोगों में चीनी और भारत...
सिद्धांतों को जीने वाले राजकिशोरजी
राजकिशोर के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी बात यह थी कि जिन मूल्यों और आदर्शों को उन्होंने स्वीकारा था, उसे जीने की भरसक कोशिश करते। वे आजादी के बाद की उस पीढ़ी के व्यक्तित्व थे, जो अपने मूल्यों के लिए बहुत कुछ खोने को भी तैयार रहते थे। अवसरवाद ही मूल्य है...
याद रहेंगे प्राण शर्मा
प्राण शर्मा के कृतित्व को अगर समग्रता में देखें तो उसका मूल इंसानी रिश्तों की पड़ताल है। उनकी कृतियों से ज़ाहिर होता है कि इस पड़ताल की शुरूआत वह अपने आप से करते हैं।ख़ामोशियाँ भी चाहिए कुछ तो कभी कभी सीखा हूँ एक बात ये भी ज़िन्दगी से मैं ...
युवा पीढ़ी के मददगार
ब्रिटेन निवासी, वरिष्ठतम साहित्यकार, श्री प्राण शर्मा का विगत 24 अप्रैल को, कॉवेनट्री के अस्पताल में चेस्ट इंफेक्शन और पक्षाघात के कारण निधन हो गया। प्राण शर्मा जी का जाना ब्रिटेन के साहित्यिक समुदाय के लिए एक अपूरणीय क्षति है। ब्रिटेन में न जाने ...
प्राण जी, मैं अनल बोल रहा हूँ
विगत माह प्राण जी का निधन हो गया। उनका जाना एक बड़ी क्षति है। उनका ब्रिटेन के साहित्यिक परिदृश्य में क्या महत्व है मैंने वर्ष 2006 में लिखे एक लेख में विश्वेषण करने का प्रयास किया था। प्रस्तुत है प्रवासी टुडे के दिसंबर 2006 के अंक में प्रकाशित यह ल...
चले गए अनुपम भाई
उन दिनों कॉलेज में था। आपातकाल में सेंसरशिप का विरोध करते हुए पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी। शायद उन्नीस सौ पचहत्तर या छियत्तर के आसपास अनुपम भाई से मुलाक़ात हुई थी और तब से लेकर उनके आख़िरी सफ़र पर जाने तक एक बड़े भाई जैसा स्नेह उनसे मिलता रहा। गंभीर...
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