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तेरे मेरे गाँव
02-Jun-2017 01:36 AM 2436     

गाँव से रिश्ता सबका ही है फिर चाहे वह प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष। गाँव, खेत, खलिहान के बिना किसी भी देश की कल्पना असंभव है, लेकिन फिर भी गाँव से कोई शहर अपने रिश्तेदार के घर आ जाए तो सभी को एक बेचैनी हो जाती है कि कहीं कोई यह ना देख ले कि इनके रिश्तेदार गाँववाले हैं। जैसा रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेख "लोभ और प्रीति" में लिखा है, "मेरे मुँह से निकला-महुओं की कैसी मीठी महक आ रही है। इस पर लखनवी महाशय ने मुझे रोककर कहा- यहाँ महुए-सहुए का नाम न लीजिए, लोग देहाती समझेंगे। मैं चुप हो गया, समझ गया कि महुए का नाम जानने से बाबूपन में बड़ा भारी बट्टा लगता है।"
इस तरह गाँववालों से रिश्ता रखना और उन्हें घर में रखना ज़्यादातर शहरी लोगों के सामाजिक स्टेटस में पैबंद समरूप है। बचपन में गर्मी की छुट्टियों की एक स्मृति अभी तक मेरे मन में है, मैं अपने गाँव गई, वहाँ दो महीने आम, गन्ने और गुड़ का भरपूर आनंद लिया, पम्प पर जाकर रेतीले पानी में नहायी और तो और वहाँ की गँवारू ज़बान मुँह पर चढ़ा लाई। जब वापस आई तो पड़ोस के बच्चों को खेलता देख मैंने कहा, "हमहूँ खेलब" तो बच्चों ने मेरा वह मज़ाक उड़ाया कि मैं अपनी भाषा को लेकर ख़ासी सजग हो गई। बालपन में ही मालूम हो गया कि अगर गाँववाली भाषा बोली तो हैसियत कम हो जायेगी और कोई भी गंवार के साथ नहीं खेलेगा।
गाँव में घूमना और कुछ दिन वहाँ बिताना किसे नहीं भाता। भाई-चारा, रिश्तेदारी जिस तरह से गाँव में निभाई जाती है उस तरह से कहीं नहीं। अभी हाल ही में एक शादी के सिलसिले में गाँव जाने का मौक़ा मिला तो लगा, यह गाँव नहीं एक विस्तृत परिवार ही है सभी को सभी की ख़बर। कौन आया कौन गया सबकी जानकारी रखी जाती है। शादी में बाहर से रसोइए बुलाने की कोई ज़रूरत नहीं, बस सब औरतें मिलजुल कर सभी मेहमानों का नाश्ता-पानी संभाल लेती हैं और इन्हीं मेल-मिलापों में औरतें बड़ी दूरदर्शिता दिखाते हुए अपने बच्चों की शादी-ब्याह की बात भी चला देती हैं। मैंने ऐसा ख़ुद देखा जब मेरी बड़ी चाची ने वहाँ किसी मेहमान आंटी से उनके बेटे के बारे में पूछा और तुरंत अपनी बेटी की बात चला दी, बात बन गई, अब उन दोनों की शादी होने वाली है। गाँव में वैसे भी ऑनलाइन और बिचौलिए की ज़रूरत शादी के लिए नहीं पड़ती। वाक्चतुर महिलायें यह मोर्चा भी बखूबी संभाल लेती हैं। इतना सब होने के बाबजूद जो एक बार शहर चला जाता है वापस गाँव का रुख नहीं करता।
मैंने इसके बारे में बहुत सोचा और यही समझा कि ग़रीबी ही इसका एकमात्र कारण है। निर्धन को कोई नहीं पूछता चाहे वह कोई भी क्यों न हो। कोई ख़ुशी से किसान बनना नहीं चाहता जैसे डॉक्टर अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता है वैसे किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता। सुविधारहित इस जीवन के संघर्ष बहुत ही कठिन हैं। पैरों में फटी बिवाईयों में कोलतार भरकर सर्दी-गर्मी, बारिश से बेखबर, हाथों में फावड़े-कुदालें लिए सुबह से शाम खेतों में काम करना आसान नहीं है। इतनी मेहनत के बाद भी दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती।
वैसे ऐसा नहीं है कि कोई अपने गाँव नहीं लौटना चाहता। कम से कम बातों से तो यही लगता है जब केदारनाथ सिंह "एक छोटा-सा अनुरोध" कविता में बिचौलियों से बचकर सीधे गाँव के खेत से मिल आने का अनुरोध करते हैं।
यह रक्त के लिए अच्छा है
अच्छा है भूख के लिए
नींद के लिए
कैसा रहे
बाज़ार ना आए बीच में
और हम एक बार
चुपके से मिल आएँ चावल से
मिल आएँ नमक से
पुदीने से
कैसा रहे
एक बार...
सिर्फ़ एक बार....
इस तरह की याचना करके कवि लोगों के हृदयों को द्रवित कर उन्हें उनकी मिट्टी से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। जो उसने इस शहरी दुनिया में खोया उसे ढूँढने का मार्ग दिखा रहा है जो कुछ पल के लिए शहरी भागदौड़ से थमकर तनिक मंथन करने का संकेत करता है लेकिन फिर सच्चाई तो यही है कि शहरी लोग गाँव जाने का सपना नहीं पालते। पुदीना, धनिया तो उन्हें शहर में भी मिल जाएगा लेकिन आधुनिक सुख-सुविधाएँ गाँव में नहीं।
मैंने भारत के गाँव देखने के साथ-साथ अमेरिका के गाँव भी देखे हैं। वैसे गाँव जैसी कोई जगह अमेरिका में होती ही नहीं। भारत में गाँव की कल्पना करते ही एक ऐसी जगह सामने आ जाती है जहाँ बहुत सारे लोग एक साथ रहते हैं, एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, उनके कच्चे-पक्के घर, मिट्टी के चूल्हे, खेत, गाय-भैंसें और उनकी अपनी एक विशेष क्षेत्रीय भाषा, सरपंच, मेला-ठेला। यह एक गाँव नहीं एक छोटा देश लगता है।
अमेरिका में ऐसा कुछ नहीं होता। यहाँ लोग शहर से थोड़ी दूर बहुत-सारी ज़मीन ख़रीद लेते हैं और वहाँ पर खेती करते हैं और कभी-कभी खेती के साथ-साथ अन्य व्यवसाय भी करते हैं। पूरा परिवार खेती-बाड़ी में जुटा रहता है लेकिन सभी शिक्षित होते हैं। अधिकतर लोग खेती करने के साथ-साथ कुत्ते, बिल्लियाँ और गाएँ भी पालते हैं। कहा जा सकता है कि भारत की तरह यहाँ कोई समुदाय नहीं होता, जहाँ बहुत से परिवार आसपास रहते हों, यहाँ बस उनका अपना परिवार होता है।
खेतों के पास ही या बीचोंबीच उनका घर भी होता है। यहाँ के किसान जिस तरह का जीवन जीते हैं उसे देखकर नहीं लगता कि उन्हें किसी चीज़ की कमी है। बड़े-बड़े खेतों में सिंचाई, कटाई और निराई का काम ये किसान स्वयं ही मशीनों और ट्रेक्टरों की मदद से कर लेते हैं। गायों का दूध भी मशीनों की मदद से निकाला जा सकता है। यहाँ के किसान काफ़ी आधुनिक होते हैं इसलिए ही हज़ारों एकड़ खेती एक परिवार अकेले ही संभाल सकता है। गाहे-बगाहे कुछ किसान मजदूरों की भी सहायता लेते हैं।
मैं अमेरिका के एक किसान मिस्टर एल्बर्ट से मिली जो मेरे पति के रिश्तेदार भी हैं। उनके पास चार सौ एकड़ का फार्म है जिस पर वे पेड़-पौधे लगाते हैं, मौसमी सब्ज़ियाँ और फल की खेती करते हैं। उनके घर के आस-पास कोई शोर-शराबा नहीं सुनाई देता। सुनसान वातावरण में सिर्फ़ पक्षियों और जानवरों की गुनगुनाहट रहती है। उनके घर के आसपास दूर-दूर तक कोई घर नहीं दिखाई देता। पूछने पर पता चला कि वे अपने दस लोगों के परिवार और कुत्ते सहित पिछले चालीस सालों से यहीं रहते आए हैं और कभी चोरी-चकारी का ख़तरा महसूस नहीं हुआ। मुझे आश्चर्य यह जानकर हुआ कि उनका मुख्य व्यवसाय किसानी नहीं बल्कि विश्वविद्यालय में पढ़ाना है। प्रोफेसर होने के साथ-साथ उन्हें खेती का भी शौक था सो उन्होंने शहर से थोड़ी दूर यह ज़मीन ख़रीदी। रोज़ पढ़ाने के लिए वह कार से जाते-आते हैं। उनके बच्चे भी उनका खेती-बाड़ी में साथ देते हैं। उन्होंने बताया कि यह जीवन बहुत दिलचस्प है। इसमें वे प्रकृति के तो क़रीब हैं ही, साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहे हैं।
सुबह-सुबह वे सभी लोग अपने खेतों में सैर के लिए जाते हैं और कुछ सब्ज़ियाँ भी तोड़ के लाते हैं उनके पास कुछ मुर्गियाँ भी हैं इसलिए अक्सर नाश्ते में वे लोग अंडे और सब्ज़ियाँ खाते हैं। इसके बाद सभी लोग अपने-अपने काम पर चले जाते हैं बच्चे स्कूल और पति-पत्नी पढ़ाने के लिए। दोपहर बाद जब वे लोग लौटते हैं तो खेतों में काम करते हैं। ये काम उन्हें बहुत सुकून-भरा और मज़ेदार लगता है। बच्चे भी खेतों में कुछ काम करते हैं। मिस्टर एल्बर्ट ने बताया जब उनका बेटा पैट्रिक बहुत छोटा था तो उसे मक्के के खेत बहुत पसंद थे, खेतों में खेलते-खेलते ही वह सो जाता था। उसी में एल्बर्ट के बच्चों ने लुका-छिपी, पकड़म-पकड़ाई और न जाने कौन-कौन से खेल खेले। इसमें उन सभी यादों को संजोये एल्बर्ट कहते हैं कि वे इन खेतों से कभी दूर नहीं हो सकते। यहाँ उनकी आत्मा बसती है। आज भी वे मक्का, टमाटर, शिमला-मिर्च, आलू, मिर्च, पुदीना और प्याज़ बोते हैं। फलों में वे लोग सेब, आडू, ब्लैकबेरी, रासबेरी, खरबूज, अंगूर मुख्य रूप से उगाते हैं। वे अंगूर से शराब भी बनाते हैं जो बहुत स्वादिष्ट होती है।
मैं उनके घर कुछ दिनों के लिए गई थी और उनके खेतों में घूमकर बहुत आनंद आया लेकिन एक दो दिन में ही मैं बोर हो गई और मैंने यही समझा कि भारतीय बिना पड़ोसी के नहीं जी सकते, कुछ दिन तो अच्छा लगता है लेकिन फिर यही शांति, अकेलापन काटने को दौड़ता है। यह अलगाव और कटाव बहुत चुभता है। और फिर समाज से कटके जीना भी क्या जीना है?
अच्छी बात यह है कि रोजर को सब्ज़ी और फल ख़रीदने के लिए ग्रोसरी स्टोर नहीं जाना पड़ता। काम-भर को खेत से ही मिल जाता है जो सब्ज़ियाँ और फल बच जाते हैं उनमें से कुछ वे फ्रीज़ कर देते हैं और कुछ फार्मर्स मार्किट में बेच देते हैं। वहाँ उन्हें नए लोगों, दोस्तों और आसपास के समुदाय से मिलने का मौक़ा भी मिलता है।
यहाँ के किसान अपना सामान दुकानों और यहाँ तक की फार्मर्स मार्किट में ख़ुद बेच सकते हैं। फार्मर्स मार्किट हर शहर में हफ़्ते में दो बार लगने वाला सब्जियों और खाने-पीने का मेला है। इसमें स्थानीय किसान और लोग हिस्सा लेते हैं। अभी हाल ही में मैंने देखा एक भारतीय महिला अचार और जैम बेच रही थी जो लोगों के लिए बहुत दिलचस्प था। कुछ लोग पेस्ट्री, कॉफ़ी और ब्रेड भी बेच रहे थे। दूसरी ओर किसान अपनी ताज़ी सब्ज़ियाँ, फूल और फल सीधे खेत से निकाल कर लाये थे। यह सब्ज़ियाँ बहुत स्वादिष्ट और ताज़ी होती हैं। मैंने फार्मर्स मार्किट में ही पहली बार अदरक और हल्दी को पत्तों सहित देखा था। कुछ समझ नहीं आया कि अगर मैं पत्तेदार हल्दी खरीदूं तो इसका क्या करुँगी, लेकिन कौतुकतावश मैंने ख़रीद लिया। हल्दी तो दूध और सब्ज़ी में खप गई लेकिन पत्तों के तो पकौड़े ही बनाने पड़े। खैर अब तो जब भी वहाँ जाने का मौक़ा मिलता है तो कुछ सब्ज़ियाँ ज़रूर ख़रीदती हूँ।
वैसे आमतौर पर यहाँ के किसान न तो ग़रीब ही होते हैं और न अमीर। इनके पास ज़रुरत की सभी चीज़ें होती हैं और अगर कहीं मौसम की मार इनके खेतों पर पड़े तो सरकार से भी इन्हें उचित अनुदान मिलता है। एक अच्छी बात यह है कि अमेरिकी किसानों को हीन दृष्टि से नहीं देखा जाता। आज ज़रुरत भी इसी की है किसान जो अनाज पैदा करता है, शहरी लोगों की भूख की तुष्टि करता है वही भूखा और ग़रीब हो कि उसे आत्महत्या जैसा क़दम उठाना पड़े। क्या होगा जब एक दिन किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाना चाहेगा। फिर कौन बोयेगा बीज और कौन करेगा खेती?
आज ज़रूरत है कि लोगों को ज़मीन से जोड़ा जाए। तकनीक और विज्ञान में तो भरपूर काम हो रहा है लेकिन किसानों के हालात बदलने के लिए भी कुछ काम किया जाए। लोगों की दिलचस्पी गाँव और खेतों में है लेकिन एक दर्शक और पर्यटक के तौर पर, शहरी लोग वहाँ जाकर कुछ दिन ज़रूर बिताना चाहते हैं, लेकिन वहाँ बसना नहीं चाहते, सुविधाओं से कटा-पिटा गाँव, बच्चों की शिक्षा के लिए भी बेहतरीन रास्ते खोलने में सक्षम नहीं है। यदि सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो वह दिन दूर नहीं जब गाँव में काम करने को कोई नहीं बचेगा।

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