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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
जन्म : 7 मार्च 1911, कुशीनगर - निधन : 4 अप्रैल 1987। मुख्य कृतियाँ - कविता : भग्नदूत, चिंता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्रधनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करुणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, पूर्वा, सुनहले शैवाल, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर-मुद्रा, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, महावृक्ष के नीचे, नदी की बाँक पर छाया, ऐसा कोई घर आपने देखा है (हिंदी) प्रिज़न डेज़ एंड अदर पोयम्स। उपन्यास : शेखर : एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी, बीनू भगत। कहानी संग्रह : विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप। यात्रा वृत्तांत : अरे यायावर रहेगा याद, एक बूँद सहसा उछली। निबंध : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मपरक, आधुनिक साहित्य : एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल, संवत्सर। संस्मरण : स्मृति लेखा। डायरी : भवंती, अंतरा, शाश्वती। नाटक : उत्तरप्रियदर्शी। अनुवाद : गोरा। संपादन : तार सप्तक, पुष्करिणी, रूपांबरा, सैनिक, विशाल भारत, प्रतीक, दिनमान, नवभारत टाइम्स, वाक्, एवरीमैंस (अंग्रेजी)। सम्मान : साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ।

भारतीयता
भारत की आत्मा सनातन है, भारतीयता केवल एक भौगोलिक परिवृत्ति की छाप नहीं, एक विशिष्ट आध्यात्मिक गुण है, जो भारतीय को सारे संसार से पृथक करता है। भारतीयता मानवीयता का निचोड़ है, उस की हृदय मणि है, उस का शिर सावतंस है, उस के नाक का बेसर है..आप कह
नदी के द्वीप
हम नदी के द्वीप हैं।हम नहीं कहते कि हमको छोड़ कर स्रोतस्विन बह जाय।वह हमें आकार देती है।हमारे कोण, गलियां, अन्तरीप, उभार, सैकत-कूल,सब गोलाइयां उसकी गढ़ी हैं। मां है वह। है, इसी से हम बने हैं।किन्त
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