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पालिम्यू जंगल और अमर इंडियन
01-Feb-2017 12:05 AM 5329     

तारीखों के इतिहास में बंद पड़ा है अतीत के एक सौ चालीस वर्षों का दर्दनाक इतिहास। अहर्निश होने वाली वर्षा ने धोया है, बहाया है दु:ख-दर्द का इतिहास। लेकिन पानी के धोने और बहाने से नहीं खतम होता है-ऐतिहासिक दर्द। जिसे पीढ़ियां जीती हैं, भोगती हैं।
सूरीनाम की मोहिनी वसुधा पर वनदेवी की महती कृपा है। धरती का श्रृंगार वनदेवी करती है। सूर्य देवता के तेजताप से दग्ध घने जंगलों में पर्त-दर-पर्त इकट्ठा रहता है-पतझर। सघन जंगल। वृक्षों ने अपने तनों और शाखाओं में बनाई हैं-जंगलों के भीतर वानस्पतिक गुफाएं कि अज्ञेय की असाध्यवीणा कविता की केश कंबली और गुफागेह याद आ जाती हैं। सूरीनाम के भूगर्भ के गोदाम में बॉक्साइट और स्वर्ण की खदानें हैं। इसलिए यहां की माटी का रंग गेरुआ है। यहां की प्रकृति का चरित्र गेरुई है। लेकिन यहां की मानवीय संस्कृति का चरित्र भोगवादी है। नीग्रो, बुश नीग्रो, रेड इंडियन, अमर इंडियन, चीनी, इंडोनेशियन, यूरोपीय, अमेरिकी और भारतवंशी जन यहां के नागरिक हैं जो हर दृष्टि से पूरी तरह से जीवन को भोग लेना चाहते हैं।
सूरीनामी की नागरिक सभ्यता जीने-जानने के बाद यहां के जंगलों की प्रकृति के अंतरंग को और उसके वनवासी अमर इंडियन को देखने-समझने के लिये पालिम्यू जाने का निर्णय लिया। कि मैं भी त्रिलोचन जी की तरह कह सकूं - जंगल में जिन्हें बसना पड़ा है / देखा है मैंने उन्हें उनके किये-धरे का लाभ तो / दिक्कू ही उठाते हैं / आज भी ये मकान और दुकान की / पहेलियां समझ नहीं पाते हैं। / लुटेरे इन्हें लूटते हैं / नेता भी बातों से इनको बहलाते हैं। / यही लोकतंत्र है।
पालिम्यू की उड़ान के लिये टैक्सी से स्थानीय हवाई अड्डे पहुंचे। बीस लोगों को ढोने वाला हवाई यान अभी नहीं पहुंचा था। अपने-अपने छह किलो के सामान सहित हम स्वागत कक्ष में दाखिल हुए कि काले चमकते चेहरे की उजली मुस्कराहट ने हाथ बढ़ाया और कहा- आई एम सेन्सी-योर गाइड फॉर पालिम्यू।
बाद में पता चला पच्चीस वर्षीय सेन्सी विश्वविद्यालय के छात्र हैं और अविवाहित हैं। ओसाया शांति उनकी गर्लफ्रैंड है। आवारादम के एक गांव से हैं। तथा कथित हवाई अड्डे पर सामान के वजन के साथ हर व्यक्ति का वजन लिया गया। निश्चित वजन से ज्यादा हवाई जहाज में वजन का होना वर्जित था।
हवाई जहाज धरती पर दौड़ते हुए आया। जहाज से ही लटकी हुई छह सीढ़ियां निकलीं जैसे बच्चों के चढ़ने के लिये बनी हों। लोग उतरे। सामान उतारा गया। यान में टायलेट नहीं था। यह बात सेन्सी गाइड ने एअरपोर्ट के रिसेप्शन में ही इस चुटकुले के साथ कह सुनाई थी कि यदि किसी को जरूरत पड़ी तो उड़ते हुए जहाज से रस्सी के सहारे जंगल में उतरना पड़ेगा।
पायलट आया। दरवाजा खुला था। यान के भीतर बैठे यात्री अपने चालक को देख सकते थे कि वह कैसे उड़ाता है यह खिलौना जहाज? बचपन से फूंक मारकर कागज का जहाज उड़ाने की जगह कितना कठिन है वास्तविक हवाई यान उड़ाना। दो पायलट आए। एक जितना प्रौढ़ था दूसरा उतना ही युवा और खिच्चा था। दोनों ने अपने कान में एयरफोन लगाया। चार्ज किया। क्राफ्ट का ए.सी. चलाया। स्वागत किया। बाईं ओर पायलट ने यान की छत पर लटके हुए हत्थे को मुट्ठी में बांधकर एक तरफ खींचा। जहाज ने एक मोड़ लिया। हवाई पट्टी के सामने आया और दौड़ लिया। लाल, हरी, नीली, टीन की छतों वाली इमारतों पर मंडराते हुये ऊपर हुआ। चर्च, मंदिर, पार्लियामेंट, घर-मकान, सुपर मार्केट और जल-जहाजों से ऊपर होता हुआ और ऊपर उड़ा। सूरीनाम नदी के पुल के ऊपर से उड़ते हुए पारामारिबो पार कर लिया। हवाई यान ने अभी अपनी मध्यम ऊंचाई ही पकड़ी थी। फिर भी वह बादलों के स्तर के बराबर कुलांचे भर रहा था। बादल पारामारिबो की ओर पहुंच रहे थे। और हम लोग अमर इंडियन के गांव की ओर। दोनों आकाशमार्ग के यात्री थे। मेघ तपते हुए पारामारिबो को नहलाने जा रहे थे और हम पालिम्यू के अमर इंडियन के सरल जीवन से भीगने जा रहे थे।
उड़ते हुए घने जंगलों के बीच मानवीय बस्तियों के घर-गांव दिख जाते। पंद्रह-बीस घरों की टीन की छतें सूरज की रोशनी में चांदी-सी चमक उठती थीं। यान के ऊपर से सिर्फ घरों की छतें दिखती थीं जो धरती से चिपकी हुई लगती थी।
समुद्र छूटता जा रहा था। सूरीनामी नदियों का जाल बढ़ता जा रहा था। नदियों के जाल में फंसे वे जंगल और हर जंगल द्वीप की तरह लगता था। जंगलों के बीच-बीच में बॉक्साइट की खदानें दिखती थीं और टीन के छतों वाली बस्तियां। लाल रेखाओं के बीच में ऊंची टंकी हुई थी धरती।
बादलें के फाहों के भीतर से होते हुए जहाज ने एक मोड़ लिया। नीचे उतरने के लिये हिचकोले भरते हुये जहाज धरती के निकट होने लगा था। जंगल के शिखरों पर सूर्य की स्वर्णिम चमक का वैभव-विलास आंखों को मोहने लगा था। तीन नदियों के बिलकुल ऊपर से होते हुए हवाई यान घसियारे मैदान के सामने छाती खोलकर उड़ते हुए ही उसने अपने पांव पसार दिए थे और घास के मैदान में कुलांचें भरने लगा था। हवाई जहाजी साथी पालिम्यू-पालिम्यू पुकारते हुये तालियां और सीटियां बजाने लगे थे।
पारामारिबो से दक्षिणी हिस्से में ब्राजील से एक सौ पचास किलोमीटर पहले बसे पालिम्यू गांव में 1858 में कोयाली जाति के पहले अमर इंडियन परिवार आए जबकि इनके पूर्व की पीढ़ियां इसके भी भीतरी हिस्से में रहती थीं। सूरीनाम एअरवेज की स्थानीय उड़ानों के तहत सवा घंटे की उड़ान तय कर पालिम्यू पहुंचे थे। सूरीनाम के दस प्रतिशत क्षेत्र में आबादी का वास है। शेष नब्बे प्रतिशत क्षेत्र में जंगल है। जंगल के मंगल को जानने के लिये हवाई जहाज या मोटरबोट के द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। सूरीनाम को जानने के लिये देश के जंगल की ओर जाना पड़ेगा। हरियाली को छूना पड़ेगा। वनीली धरती और जंगली नदियों का स्पर्श करना होगा। वहां की वन देवी की आराधना और उपासना में लगी हुई अमर इंडियन की पीढ़ियों दर पीढ़ियों के जीवन में उतरना होगा जिनसे मिलने के लिये यूरोपीय अमेरिकी और अन्यान्य देशों के सुविधाभोगी यायावर आते हैं। लेकिन इनसे संतों की तरह मिलना पड़ता है।
पालिम्यू नदी तट पर बसा यह अमर इंडियन का गांव है। नदी के नाम पर ही तट पर बसी बस्ती का नामकरण पालिम्यू कर दिया गया है। सौ झुग्गियों में घर बसे हैं। पांच पीढ़ियों का परिवार फैलकर बस्ती का रूप ले चुका है। न मोबाइल, न टीवी, न बिजली के खंभे और न पानी की टंकी है। मिट्टी पर मटियाले रास्ते हैं। पगडंडियां ही पांव का रास्ता बनी हुई हैं। कोई शोर नहीं है। जंगल का अपना प्राकृतिक संगीत है। अमर इंडियन बच्चों की खिली मुस्कराहट करती है-स्वागत।
किकींपीसी नाम से पहचानी जाने वाली इनकी झोंपड़ियां तासी (लीव) पत्तियों से बनी होती हैं। जानवरों की तरह ही चार पांव की लकड़ियों पर इनके घर खड़े हैं। जिसमें बस लोकी, पीसी, वसरालोकिस पॉकोनी, बुगुबुगु, कन्कत्री और यकारांदा लकड़ियां होती हैं। सूरीनाम में छह सौ प्रकार की अमूल्य लकड़ियों की संपत्ति है। वर्ष भर वर्षा का जल पीने के बावजूद यह पत्थर और लोहे की तरह ठोसठस बनी रहती हैं। कभी-कभी लगता है यहां की लकड़ियां लोहे और पत्थर से अधिक मजबूत हैं क्योंकि न इनमें जंग लगती है और न पानी इन्हें तराशता है। दीमक और कीड़े-मकोड़े के खोखला करने पर ही कमजोर पड़ती हैं। नदियां ही यहां का रास्ता हैं जिस पर बसरालोकस् या बसलोकी, पीसी लकड़ी की नावें ही वाहन हैं। कैटफिश, पीरायासा, तुकुनारी, सोके, अयुमारा, कुमालू मछलियों को पकड़कर कसावा को पापड़ सी रोटी के साथ या चावल से आसानी से खाते हैं और कसावा को गारकर उसके रस से कसीरी शराब नशे की सीमा तक पीते हैं। मछली के अलावा शिकार मिल जाने पर सफेद सुअर, हिरण, आगुतीपाका, इगवाना, कैमन, कछुआ खाते हैं।
अपस्तपनाहोनी, तपनाहोनी और पलावा के संगम स्थल पर ही पालिम्यू बस्ती बसी हुई है। अंधेरा होते ही घरों में भारतीय गांवों की तरह लालटेन जलने लगती हैं जिसे यह अपनी भाषा में कोकोलाम्पू कहते हैं। काक आकदीराक, हासकाल्फ, कैपीच्यून, वुसीकाऊ, स्क्रीनिंग, पीहा, ऐलोरोम, कारीकस और टीनेजर, मरकास और पेरोट यहां के प्रमुख पक्षी हैं। पोटी हिल, टेबूटॉप, रोजकेल्टपिक, कासीकासिमा आदि यहां के प्रसिद्ध पहाड़ हैं। जो जंगलों के बीच सीना ताने दूर से ही खड़े दिखाई देते हैं। सौ की संख्या में रह रहे अमर इंडियन परिवारों में विवाह कार्य घर के बुजुर्गों के निर्णय से संपन्न होता है। तीर-धनुष और शॉट गन पुरानी पद्धति, यहां के शिकार और जीवन का प्रमुख हथियार है। यहां के अमर इंडियन का मोसोरानस और वाप्टीस्ट नाम की प्रमुख परंपराएं हैं।
पालिम्यू से 25 कि.मी. दूर एक घंटे की स्टीमर यात्रा से तापनाहानी नदी पर "माबूका" और "कोदेबाकू" नाम के प्रसिद्ध झरने हैं जिनका प्राकृतिक सौंदर्य विलक्षण हैं जल का स्वाद अद्भुत है और झरने को देखकर "अमरकंटक" की दुग्धधाराएं याद आ जाती हैं। यहां के जंगलों में जीवन बिताते हुये घाव होने पर मोकोमोको वनस्पति का जूस लेने पर घाव ठीक हो जाते हैं और मलेरिया के असर से बचने के लिये "बेरगीबीटा" का रस पीते हैं। "बासमाका मारिया" वनस्पति का फल नारियल की तरह ही होते हैं। इसके भीतर का पानी तेल की तरह होता है जिससे वह अपना भोजन पकाते हैं। भोजन पकाने के लिए और पूजा के लिये यह अयुन्तेते वृक्ष की लकड़ी जलाते हैं। अमर इंडियन की बोली-भाषा को "ट्रियो" या "बयाना" कहते हैं। सूर्य जल और जंगल के अतिरिक्त कन्कत्री वृक्ष इनके आराध्य हैं जिनकी यह पूजा करते हैं। "वाटवास" वनस्पति को यह इत्र-सुगंध के लिए इस्तेमाल करते हैं।
हिरण की हड्डी, बांस और कछुआ के खोल से यह अपने वाद्ययंत्र बनाते हैं। फलों और फूलों के बीजों और पक्षियों के पंखों से यह अपने आभूषण बनाते हैं जो इतने घने होते हैं कि वक्ष और नितंब पर आच्छादन के लिए यह इन्हें पुरक उत्सवी अवसरों पर आभूषण की तरह धारण करते हैं। लाल रंग इनका प्रिय रंग है। इसलिए इनके वस्त्र और घर की सजावट में इन्हीं रंगों की प्रधानता होती है। घरों में दरवाजे नहीं होते हैं और घर के भीतर पलंग या बिस्तर की जगह कपड़े या मोटे सूत के पालने होते हैं जिन्हें आधुनिक भाषा में हैंमक पुकारते हैं।
सूरीनाम धरती की देह-अस्थियां बॉक्साइट और स्वर्ण से बनी हैं। जंगल ही उनका घर है। यहां के अमर इंडियन को आधुनिक मानव जीवन की सभ्यता ने आज तक स्पर्श नहीं किया है। यायावर यूरोपीय उन्हें बहलाने-फुसलाने जाते हैं पर अपनी लोकवाणी के अतिरिक्त वह दूसरी भाषा सुनने को तैयार नहीं है। अमर इंडियन के जीवन में संस्कृति-संक्रमण नहीं हैं। इसलिए यहां के निवासियों पर सिर्फ नदी, जंगल, सूरज और बादल का प्रभाव है और आज भी वे इन्हें अपना ईश्वर मानते हैं। नदी के तट और जंगलों में रहने वाले यह दक्षिण अमेरिकी आदिवासी साधु-संत अमर इंडियन विश्व की तथाकथित विकसित सभ्यताओं और संस्कृति से कुछ याचना नहीं करते हैं। वे सिर्फ अपनी वनदेवी से प्रार्थना करते हैं। और प्रकृति ही अपने दोनों हाथ खोलकर उन्हें अपना सर्वस्व अर्पित करती है। नदी प्राय: दूध की तरह पिलाती है अपना सुधा-नीर। साथ में अपने हृदय से जायी मछलियों को भी अर्पित करती है- उनकी बुभुक्षा-तृप्ति के लिये।
जंगलों ने बांधे हैं- पेड़। माटी के भीतर पेड़ों की जड़ों ने अपनी विभिन्नता के बावजूद बांधा है- एक-दूसरे को आपस में। जड़ों ने बांधी है-माटी। माटी ने संभाली हैं-जड़ें। जड़ों ने सहेजे हैं-वृक्ष। आपस में एक-दूसरे को स्नेहालिंगन में लिए हुए एक ओर जी रहे हैं जंगल तो दूसरी ओर अमर इंडियन जातियां। हाथ से हाथ बांधे, छाती से छाती मिलाए और पीठ से पीठ सटाए हुए बैठे हैं अपने जंगल से। जिनके वक्ष में है एकता का संगीत और अपने अस्तित्व को बचाए रखने का संकल्प अटूट।
पालिम्यू और तापनाहोनी नदियां शिलाओं पर योगमुद्रा में उपासिका स्त्री की तरह करती हैं- सूर्य-अर्चना। दिवस चढ़ने के साथ नदियां अपनी देह खोल सेंकती हैं-सूर्यताप। नदियों की तपी देह को रह-रहकर नहलाते हैं-बादल। और फिर-फिर अपनी सूर्य-रश्मियों के ताने-बाने से बने स्वर्णिम वसन से पोंछ-सोखकर सूर्यदेव सुखाते हैं-नदी देह। जाते-जाते सूर्य स्वर्णाभूषणों से करता है-नदी और जंगल का श्रंृगार। नदी पुन: मौन होकर प्रतीक्षा करती है-चांद का, चांद के रुपहले रूप-सौंदर्य का। नदियां सुबह ही सुबह गुनगुनाती हैं-अपना राग। और पक्षी चहचहाते हैं- तीव्र वाद्य यंत्र की तरह। पक्षी दिन भर जंगलों में करते हैं लीला-विलास। नदियां सूर्य-रश्मियों की हथेली पकड़कर लहरों के साथ उमग-उमगकर करती हैं-नृत्य। सूर्य उनकी अंजुलि में रखता है-पिघले हुए तरल हीरे-मोती।
"गयाना" शब्द का एक अर्थ "पानी" है। इसलिए दक्षिण अमेरिका के नदी जीवी इन जल-देशों का नाम पड़ा था- ब्रिटिश गयाना, फ्रेंच गयाना और डच गयाना। सच पूछिये तो दक्षिण अमेरिकी और कैरेबियाई देशों के अमर इंडियन अब भी नगरों के नागरिक होने की जगह नदियों के तट के नागरिक हैं। नदियां उनकी मां हैं तो तट उनकी पितृभूमि हैं।
संघर्षगाथा की तीर्थस्थली के रूप में यह स्थान आज भी इन सबके दुर्धर्ष साहस के कारण जीवित और जीवंत है। सिर्फ इन जंगलों में जाने और ध्यान लगाने की आवश्यकता है।
अपनी यात्रा से लौटने के एक वर्ष बाद पता चला कि सूरीनाम सरकार की ओर से वहां दूरभाष का एंटीना सिस्टम लगवाने के लिये वहां की "श्यूर" टेलीफोन कंपनी के कुछ अधिकारियों को पालिम्यू के लिए भेजा गया है। वहां के बीहड़ जंगल में कोई टेलीफोन कनेक्शन काम नहीं करता था। अमर इंडियन को इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती है। लेकिन विदेशी पर्यटकों की सुरक्षा की दृष्टि से इस कनेक्शन की अनिवार्यता को अनुभव करते हुए सूरीनाम सरकार ने एक दल भेजने का निर्णय लिया जिसे बत्तीस वर्षीय महिला पायलट के द्वारा ले जाना था जिनके पिता, पति और भाई भी पायलट हैं और बारह-बारह घंटे की चार्टर प्लेन की लगातार उड़ाने भरते रहे हैं। वे कुशल चालक थी, बावजूद इसके दुर्घटना का शिकार हुई। भस्मीभूत-सा विमान ही पेटर की बेटी की देह भी था और श्मशान की चिता भी। बच्चों ने अपनी मां की दर्दनाक मृत्यु का दृश्य देखा और फिर वे देखने लायक न रहे। जानने के बाद मैं कई दिन स्तब्ध रही। मृत्यु का खौफ मंडराता रहा कि वह किसी को भी उठा ले जाती है। उसकी अपनी ही दक्षता को चुनौती देकर कि कोई सर्वज्ञ होकर भी नियति के समक्ष कुछ नहीं है।
इस दुर्घटना के बाद यदि अब मुझे पालिम्यू जाना पड़े तो मैं कई बार सोचूंगी...। पर, शायद दायित्व आ पड़े तो कुछ भी न सोचूं। उस समय न जाने कहां से साहस आ जाता है कि पुनर्विचार का प्रश्न ही नहीं कौंधता है। ऐसे ही जीवन चल रहा है।

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