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भारतीय सिनेमा के एक सौ चार वर्ष
01-May-2017 01:27 PM 3758     

भारतीय सिनेमा की बात की शुरूआत इस सूचना से करना चाहूंगा कि लंदन फिल्म संस्कृति के केंद्र, ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट (बीएफआई) सॉउथबैंक में, इस वर्ष भारत की हिंदी फिल्मों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। इस अवसर पर साउथ एशियन सिनेमा फ़ाउन्डेशन (एस.ऐ.सी.एफ.), फाल्के की मूक फ़िल्म राजा हरीशचन्द्र का, सजीव संगीत के साथ प्रदर्शन आयोजित कर रहा है।
भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के की इस फ़िल्म राजा हरिश्चन्द्र (1913) को अगर भारत की पहली कथा फ़िल्म मानें तो भारतीय सिनेमा अपने अस्तित्व के 104 साल पूरे कर चुका है। लोकप्रिय सिनेमा एक कला विधा के तौर पर कहाँ तक पहुँचा है यह कह पाना मुश्किल है पर पिछले कुछ वर्षों में गिनी-चुनी फ़िल्मों ने आशा जगाई है।
आमिर खान निर्मित, नितेश तिवारी की दंगल, वर्ष 2016 की ऐसी फ़िल्म है जो हर तबके के दर्शक को छूती है। इसमें हरियाणा की आंचलिकता और सामाजिक परिवेश है। फ़िल्म को आप आकर्षक संवाद, संगीत और अभिनय के खानों में विभक्त करके नहीं देखते। यह एक सम्पूर्ण फ़िल्म है। दंगल इस पूर्वाग्रह को तोड़ती है कि हिन्दी फ़िल्मों में भाषा और परिवेश गौण हैं। साथ ही यह लड़कियों और खेल के प्रति भारतीय समाज के नज़रिये का अक्स भी है। 2016 की ही एक और फ़िल्म है, राम माधवानी की नीरजा। इसे हिन्दी सिनेमा की एक परिपक्व कथा फिल्म कहा जा सकता है जिसमें एक सामान्य दब्बू किस्म की लड़की चुनौती आने पर असाधारण साहस का परिचय देती है।
पर 2016 और इस वर्ष भी कुछ ऐसी फिल्में आयीं हैं जो निराश करती हैं। ये वह फिल्में हैं जो कथित स्वतंत्र सिनेकारों ने बनायीं हैं। इसमें विशाल भारद्वाज की रंगून उनके कैरियर की सबसे फूहड़ फिल्म है जो दावा  करती है कि वो नेताजी सुभाष चंद्र बोस को समर्पित है। फिल्म मात्र एक चुस्त बम्बइया फिल्म कही जा सकती है जिसमें रोमांचक रसीले आइटम नंबर हैं। पर कहना होगा कि विशाल भारद्वाज की मक़बूल (2003) और ओमकारा (2006) पिछले दशक की दो महत्त्वपूर्ण फिल्में रही हैं, पर बाद की कमीनेे (2009) और 7 खून माफ़ (2011) निराशाजनक हैं।
इस वर्ष की एक और अपरिपक्व फ़िल्म श्रीजित मुख़र्जी की बेग़म जान है जिसके कमज़ोर निर्देशन ने विद्या बालन की भूमिका को अति नाटकीय बना दिया है।
कुछ वर्ष पूर्व रितेश बत्रा की लंच बॉक्स (2013) ने ख़ासी हलचल पैदा की थी। वरिष्ठ फ़िल्मकार बुद्धदेव   दासगुप्ता की अनवर का अजब किस्सा (2013) और स्वर्गीय रितुपर्णो घोष की जीवन स्मृति (2013) भी भारतीय सिनेमा की सार्थकता को स्थापित करती हैं। इन फिल्मों के कथानक घिसे-पिटे लीक पर चलने वाले नहीं हैं। सन्देश ये मिलता है कि स्वतंत्र सिनेकारों का सिनेमा शायद धीरे-धीरे एक लहर का रूप लेगा। अभी निश्चितता के साथ कुछ कहना भले बुद्धिमानी न हो, पर इतना तो हुआ है कि हिंदी सिनेमा में अनुराग कश्यप, सुजय घोष और दिवाकर बनर्जी जैसे सिनेकारों की एक नयी पीढ़ी प्रवेश कर चुकी है, जो करन जौहर और संजय लीला भंसाली सरीखे सिनेकारों के व्यावसायिक तड़क-भड़क वाले सिनेमा को बहुत समय तक बर्दाश्त नहीं करेगी।
रितेश बत्रा की लंच बॉक्स को अगर आप पटकथा के तौर पर पढ़ें, तो आप निराश होंगे। कथानक की दृष्टि से पूरी फ़िल्म में किसी दूसरे व्यक्ति का लंच बॉक्स, इरफ़ान खान के पास पहुँचते रहना, बचकाना और अविश्वसनीय लगेगा। पर, फ़िल्म पढ़ने का नहीं, देखने का माध्यम है। मुम्बई के डब्बेवालों की अफ़रा-तफ़री के साथ लोकल ट्रेनों के जीवंत माहौल को जिस तरह रितेश बत्रा परदे पर उतारते हैं, वह आपको एक नयी दुनिया में ले जाता है। फ़िल्म का तिलस्म आपकी तर्क़ क्षमता को बंधक बना लेता है। यही फ़िल्म की ताक़त है।
भारतीय सिनेमा का सफ़र उबड़-खाबड़ रहा है। ज़्यादातर, फिल्में हमेशा से फूहड़ रही हैं। इसकी वजह, सिनेमा के प्रति हमारी नीयत रही है। अधिकांश लोग, सिनेमा को व्यवसाय के रूप में देखते हैं और गिने-चुने कला विधा के तौर पर। यही टकराव इसके विकास और ह्रास के दो पहलू रहे हैं।
प्रारम्भ से ही सिनेमा के विकास के पीछे कुछ ऐसे प्रतिबद्ध लोग रहे जिन्होंने सिनेमा को कला और सामाजिक सरोकार व्यक्त करने के माध्यम के रूप में विकसित करने के लिए अपने को समर्पित किया। पुणे स्थित राष्ट्रीय फ़िल्म अभिलेखागार के पूर्व संस्थापक निदेशक, स्वर्गीय पी.के. नायर का मानना है कि बीसवीं शताब्दि के पूर्वार्ध से, 1931 में पहली बोलती फ़िल्म "आलम आरा" के आने तक दादा साहेब फाल्के की "श्रीकृष्ण जन्म" (1918), "कालिया मर्दन" (1919) सरीखी फिल्मों ने, ब्रितानी साम्राज्य के अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध सांकेतिक रूप से आवाज़ उठायी। यानि सिनेमा का एक सामाजिक सरोकार प्रारम्भ से ही रहा।
1950 के दशक की उत्कृष्टता के पीछे, 1930 और 1940 के दौर का परिश्रम और पृष्ठभूमि थी। विशेषकर मूक फिल्मों के दादा साहेब फाल्के के दौर के बाद, एक ठोस फ़िल्म संस्कृति स्टूडियो के दौर से जन्मी। इस दौर के तीन शीर्षस्थ स्टूडियो थे - कलकत्ता का न्यू थियेटर्स, पूना का प्रभात और बंबई का बॉम्बे टॉकीज़।
बी.एन. सरकार के न्यू थिएटर्स ने भारत में स्तरीय सिनेमा की नींव डाली। देवकी बोस की "पूर्ण भक्त" (1933) और "चंडीदास" (1932) ने सिनेमा में संगीत का मुहावरा गढ़ा। आर.सी. बोराल रचित और के.सी. डे की आवाज़ में "जाओ जाओ रे मेरे साधू रहो गुरु के संग" फ़िल्म संगीत में एक मील का पत्थर है।
प्रभात स्टूडियो, जो कि पूना में स्थित था, फतेहलाल, दामले और वी. शांताराम ने स्थापित किया जिसने भारतीय सिनेमा को "संत तुकाराम" (1936) जैसी फ़िल्में दीं। आगे चलकर, शांताराम ने "दुनिया ना माने" (1937), "पड़ोसी" (1941) और "दो आंखें बारह हाथ" (1957) जैसी अमर कृतियों का निर्माण किया। बॉम्बे टॉकीज़, जिसे हिमांशु राय और देविका रानी ने स्थापित किया, राज कपूर, अशोक कुमार और दिलीप कुमार जैसी हस्तियों की कर्मभूमि रही जहाँ से उन्होंने काम सीखा।
स्टूडियो सिस्टम से निकली प्रतिभाओं ने स्टार सिस्टम को जन्म दिया और 1940 के अंत तक स्टूडियो प्रणाली चरमरा गयी।  नौजवान राज कपूर और देव आनंद ने  अपनी-अपनी कम्पनियां बना लीं और आने वाले दौर के लिए फ़िल्म निर्माण के सपनों में डूब गए।
भारतीय सिनेमा के 104वें वर्ष पर पांच सिनेकारों की चर्चा की जा सकती है जिनकी फिल्मों ने, बाद के सिनेकारों के लिए, उत्कृष्टता के मापदंड तय किये - महबूब खान, बिमल रॉय, राज कपूर, गुरुदत्त और विजय आनंद। पांचों  भारतीय सिनेमा के 1950 के दशक के "सुनहरे दौर" की उपज थे।  
इन पांच सिनेकारों के अलावा, वी. शांताराम, कमाल अमरोही, ऐ.आर. कारदार, के. आसिफ समेत कई सिनेकार, संगीतकार, गीतकार व कई प्रतिभावान लोग इस दौर में आये। गुजरात के एक ग़रीब ग्रामीण परिवार में जन्मे, महबूब खान अशिक्षित थे, पर अपने जज़्बे से भारत के ऐसे सिनेकार बने जिनकी "मदर इंडिया" (1957) भारत की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिनी जाती है। "मदर इंडिया" विदेशी भाषा के लिए प्रतिष्ठित ऑस्कर सम्मान के लिए भेजी जाने वाली भारत की पहली फ़िल्म थी।
संघर्ष के प्रारंभिक दौर में, महबूब खान ने आर्देशीर ईरानी के दरवाज़े पर काफी चप्पलें चटकायीं। यह कम साहस की बात नहीं कि महबूब ने 1930 और 1940 के दशक के भारत के ब्रिटिश शासनकाल में, उत्पीड़ित कृषकों के हालात उजागर करने के लिए सिनेमा के कैनवास का इस्तेमाल किया। यह अहसास बहुत कम लोगों को है कि "अंदाज़" (1949) और "मदर इंडिया" (1957) को छोड़कर उनकी अधिकांश फिल्में, आज़ादी के पहले बनीं और चर्चित हुईं। "मदर इंडिया" को भारत में वही दर्ज़ा प्राप्त है जो पश्चिमी सिनेमा में "गॉन विथ द विंड" (1939) को। महबूब की यह फ़िल्म आज भी भारतीय महिला के शोषण और सामाजिक स्थिति का आइना है और नर्गिस के लिए उनके कैरियर की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म।
बिमल रॉय ने सिनेमा की समझ और गहराई 1930 के दशक में न्यू थिएटर्स में रहकर विकसित की। काम की शुरुआत एक कैमरामैन के रूप में की और पी.सी. बरुआ की "देवदास" (1935) और "मुक्ति" (1937) का छायांकन किया। न्यू थिएटर्स के विघटन के बाद, वे बम्बई आ गए और जीवन पर्यन्त सिनेमा के प्रति समर्पित रहे। इतालवी नव यथार्थवाद के प्रतिनिधि सिनेकार, डि-सिका की "बाइसिकल थीव्स" से प्रेरित होकर उन्होंने 1953 में "दो बीघा ज़मीन" बनाई जोकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित और पुरस्कृत हुई।
ग़रीब किसान शम्भू की भूमिका बलराज साहनी ने अदा की जोकि उनके कैरियर की सर्वश्रेष्ठ भूमिकाओं में से एक है। लोक गीतों कि तर्ज़ पर लिखे शैलेन्द्र के दर्द भरे गीतों और सलिल चौधरी के अलौकिक संगीत ने "दो बीघा ज़मीन" को अमरता दे दी है।
1950 के दशक में सर्वाधिक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित करने वाले भारतीय सिनेकार थे राज कपूर जिनकी "आवारा" (1951) और "श्री 420" (1955) सोवियत संघ और मध्य पूर्व में बहुत लोकप्रिय हुई। "मेरा जूता है जापानी" की धुन वहाँ आजतक प्रचलित है। जाने-माने पृथ्वीराज कपूर के पुत्र होने के बावजूद, राज कपूर कड़ी मेहनत से आगे बढ़े। अपने कैरियर की शुरुआत उन्होंने बॉम्बे टॉकीज़ में क्लैपर बॉय से की।
गुरुदत्त हिंदी सिनेमा के कवि हैं। उनकी प्रतिभा को खिलने का पहला मौक़ा दिया देव आनंद ने जब उन्होंने अपनी नयी कंपनी नवकेतन स्थापित की। निर्देशक के तौर पर गुरुदत्त की पहली फ़िल्म "बाज़ी" (1951) थी जो नवकेतन के लिए लाटरी खुलने जैसी थी। भारतीय सिनेमा के लिए यह पहली रोमांचक अपराध फ़िल्म थी। इस फ़िल्म ने साहिर जैसे गीतकार को मौक़ा दिया और स्वयं देव आनंद को पूरा स्टार बना दिया।
"प्यासा" (1957) और "कागज़ के फूल" (1959) ने गुरुदत्त को कला  की दृष्टि से एक चोटी के फिल्मकार के रूप में स्थापित कर दिया। गुरुदत्त की संवेदनशीलता ने जीते जी उन्हें व्यावसायिक सफलता से रोका। जहाँ "प्यासा" बॉक्स ऑफिस पर बहुत सफल रही, "कागज़ के फूल" अपनी सारी उत्कृष्टता के बावजूद, उन्हें ले डूबी। पर आज ये फ़िल्म भारत की सुन्दरतम फिल्मों में से एक है।
निर्देशक के रूप में विजय आनद एक ऐसे सिनेकार थे जिन्हें पटकथा, संवाद, संगीत, फिल्मांकन और संपादन की गहरी पकड़ थी और ये गुर उन्होंने स्वयं गिर -पढ़कर हासिल किये थे। चाहे "गाइड" (1965) जैसी गहरी दार्शनिक फ़िल्म हो, या फिर "तीसरी मंज़िल" (1966) या "ज्वेल थीफ़" (1967) जैसी रोमांचक अपराध फ़िल्म, माध्यम की पकड़ में उनका कोई सानी नहीं था।  
विजय आनंद अपनी पटकथा हिंदी में लिखते थे। अव्वल तो उस ज़माने में सिनेकार पटकथा लिखते ही नहीं थे या फिर अंग्रेजी में। "ज्वेल थीफ" जैसी मौलिक पटकथा आज भी नज़र नहीं आती। अमर का प्रमुख किरदार जिसके इर्द-गिर्द पूरा कथानक घूमता है, पूरी फ़िल्म के दौरान दर्शकों को तनाव में रखता है। फ़िल्म के अंत में पता चलता है कि ऐसा कोई चरित्र था ही नहीं।
1970 और 1980 का दशक हिंदी सिनेमा में आमूल चूल परिवर्तन लाया। भारतीय सिनेमा के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना की लोकप्रियता जिस तेज़ी से बढ़ी उसी तेज़ी से अमिताभ बच्चन की प्रतिभा के क़द के तले धंस गयी। अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता और सफलता की वजह मनोवैज्ञानिक और वास्तविक स्तर पर दर्शकों का उनके चरित्रों से तादात्म्य था। दूसरी ओर श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी और सईद अख्तर मिर्ज़ा सरीखे सिनेकारों ने एक नए सिनेमा का आगाज़ किया। भारतीय सिनेमा के लिए, कुछ अपवादों को छोड़कर, सबसे शर्मनाक दशक 1990 का है जिसने सिनेमा को सेक्स और हिंसा के खोखलेपन के कगार तक धकेला।   
सिनेमा की  वापसी का पहला संकेत इक्कीसवी शताब्दि के प्रारम्भ में आयी आशुतोष गोवारिकर की "लगान" (2001) थी। पर भारतीय सिनेमा अपनी बुरी आदतों से अभी तक नहीं उबरा है। बल्कि अब एक नयी लत भी सिनेमा ने पाल ली है "आइटम सोंग्स" की। इस लत ने तथाकथित संजय लीला भंसाली और विशाल भारद्वाज तक को नहीं छोड़ा है। भंसाली की "राम लीला" (2013) की फूहड़ता इसका जीवंत प्रमाण है कि किस तरह बिना कथानक और यथार्थवादी चरित्रों के, आप एक विशालकाय गाने-बजाने वाला तमाशा तैयार कर, उसे सिनेमा का नाम दे सकते हैं।
नयी पीढ़ी के सिनेकारों की प्रतिभा को देखते हुए भारतीय सिनेमा से काफ़ी उम्मीदें हैं। दूसरी ओर हिंदी सिनेमा अभी भी व्यावसायिक दबावों में जकड़ा हुआ है। सिनेमा को इस ग़ुलामी से उबारना होगा। साथ ही दर्शकों में एक स्तरीय फ़िल्म की समझ विकसित करनी होगी। ये समझना होगा कि क्या फ़िल्म मात्र मनोरंजन है, जिसके गीत मात्र आइटम नंबर हैं और संवाद मात्र उत्तेजना, या फिर सिनेमा साहित्य की तरह एक रचना है जहाँ संवाद उसके कथानक का निर्वाह है, गीत उसका मुहावरा है और संगीत उसका माहौल। फिल्मों में परिवर्तन लाने के पहले, दर्शकों के लिए सिनेमा की एक सही परिभाषा गढ़नी होगी।

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