ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कामायनी
01-Sep-2016 12:00 AM 5252     

कोमल किसलय के अंचल में
नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी
गोधूली के धूमिल पट में
दीपक के स्वर में दिपती-सी।

मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में
मन का उन्माद निखरता ज्यों-
सुरभित लहरों की छाया में
बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों-
वैसी ही माया में लिपटी
अधरों पर उँगली धरे हुए
माधव के सरस कुतूहल का
आँखों में पानी भरे हुए।

नीरव निशीथ में लतिका-सी
तुम कौन आ रही हो बढ़ती?
कोमल बाँहे फैलाये-सी
आलिंगन का जादू पढ़ती?
किन इंद्रजाल के फूलों से
लेकर सुहाग-कण-राग-भरे
सिर नीचा कर हो गूँथ माला
जिससे मधु धार ढरे?
पुलकित कदंब की माला-सी
पहना देती हो अंतर में,
झुक जाती है मन की डाली
अपनी फल भरता के डर में।


वरदान सदृश हो डाल रही
नीली किरणों से बुना हुआ
यह अंचल कितना हलका-सा
कितना सौरभ से सना हुआ।

सब अंग मोम से बनते हैं
कोमलता में बल खाती हूँ
मैं सिमिट रही-सी अपने में
परिहास-गीत सुन पाती हूँ।

स्मित बन जाती है तरल हँसी
नयनों में भरकर बाँकपना
प्रत्यक्ष देखती हूँ सब जो
वह बनता जाता है सपना।

मेरे सपनों में कलरव का संसार
आँख जब खोल रहा
अनुराग समीरों पर तिरता था
इतराता-सा डोल रहा।

अभिलाषा अपने यौवन में
उठती उस सुख के स्वागत को
जीवन भर के बल-वैभव से
सत्कृत करती दूरागत को।

किरणों का रज्जु समेट लिया
जिसका अवलंबन ले चढ़ती
रस के निर्झर में धँस कर मैं
आनन्द-शिखर के प्रति बढ़ती।

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