ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी सिनेमा देश विदेश में
01-May-2017 02:13 PM 2617     

रोटी, कपड़ा, मकान के बाद अगर भारत में आम आदमी के जीवन में किसी बात का बड़ा स्थान है तो वो है फिल्में! या कहें की दूसरी तरफ भारत  का सॉफ्ट पावर है यहां का सिनेमा। कम शौकीन भी कम से कम प्रसिद्ध फिल्में तो जरूर देखता है फिर शौकीनों की बात ही अलग है। एक ही फिल्म  को पांच-पांच बार भी देखकर मन नहीं भरता इनका।
सिनेमा संचार का एक महत्वपूर्ण शक्तिशाली माध्यम है जो सभी वर्गों के बीच में समानता बना के रख सकता है और इसमें जनता को प्रभावित करने की महान क्षमता होती है। विशेष रूप से आज की डिजिटल युग में, जहां फिल्में बनाना और उन्हें वितरित करना आसान हो गया गया है जिसके चलते इसको व्यापक दर्शकों तक पहुंचना आसान है। मुझे लगता है भारतीयों की सिनेमा देखने की तादात अन्य कई दूसरे समुदायों से अधिक ही है। दर्शकों का यही सिनेमा के प्रति प्यार बॉलीवुड फिल्मों का इतनी अधिक संख्या में बनने का कारण है।
कितने भी गरीबी या विकास के देश में मुद्दे हों पर सनीमा (सिनेमा) देखना तो सबसे ऊपर है। किसी के लिए फिल्में देखना एक मनोरंजन है तो किसी के लिए कुछ सीख लेने का तरीका और किसी के लिए म्यूजिक और डांस। पर देखना तो बनता है। ऐसा ही है हिंदी सिनेमा। इसकी लोकप्रियता सीमित नहीं है।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता एक भारतीय कहां रहता है, देश में या कि विदेश में। वह कहीं भी हो, पर हिंदी फिल्में उनके लिए एक मनोरंजन ही नहीं बल्कि एक जरूरत से कम नहीं। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के सभी बच्चों ने "हेराफेरी", "मुन्नाभाई", "दंगल", "3 इडियट" जैसी सभी फ़िल्में आनंद के साथ देखी और अक्सर दुबारा भी देखते रहते हैं।
हाल ही में हमने "बेगम जान", "मुक्ति भवन" जैसी फिल्में देखी जो अभी ही रिलीज़ हुईं हैं। भारतीयों में हिंदी समाचार, हिंदी फिल्में और हिंदी म्यूजिक शौक से ज़्यादा एक प्यार है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विविधता के संदर्भ में भारतीय फिल्म उद्योग बहुत आगे है, इसमें दो राय नहीं है। यद्यपि यह स्वीकार करना होगा कि कुछ हद तक चीनी फिल्में भी बॉलीवुड की फिल्मों की बराबरी करती हैं पर भारतीय फिल्मों में अधिकतर संगीतमय फिल्में हैं और कई फिल्में तो आकर्षक संगीत स्क्रिप्ट में ही बनी होती हैं। गाने, नृत्य, प्यार, एक्शन, कॉमेडी, रोमांच सभी का मिश्रण एक ऐसा मसाला तैयार करता है जो भारतीय दर्शकों के लिए पैसा वसूल आइटम होता है। अमेरिका में हिंदी के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं का सिनेमा भी अत्यंत लोकप्रिय है। चाहे वे मराठी फिल्में हों अथवा तमिल, तेलगु और मलयालम। सभी के दर्शक यहाँ उतने ही हैं, जितने की हिंदी फिल्मों के। याद है मुझे बाहुबली फिल्म आने के पहले ही लोगों ने फिल्म देखने के लिए एडवांस बुकिंग करवा ली। टिकट मंहगा है, सस्ता है, कोई परवाह नहीं, बस फस्र्ट डे फस्र्ट शो देखने की जो होड़ थी बस देखते ही बन रही थी। दूसरा वाकया मुझे याद आता है दिलवाले फिल्म के समय का, जब थिएटर में भारतीयों के संख्या और विदेशियों की संख्या लगभग बराबर ही थी।
भारतीय सिनेमा परंपरा के साथ कलात्मक उद्देश्यों और अधिक परिष्कृत कहानियों के साथ हमेशा से अपनी एक अलग छाप छोड़ता है जिसको समानांतर सिनेमा देख कर आसानी से समझा जा सकता है। दूसरी तरफ भारतीय सिनेमा भारत में फैशन में एक प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। भारत की पारंपरिक पोशाक और बहुत सारे विदेशी देशों में साड़ी के प्रति प्यार का बड़ा कारण सिनेमा भी है। इसके अलावा सिनेमा से विदेश में बैठे बहुत से लोग भारत के लगभग सभी प्रसिद्ध स्थानों को देख कर उनकी यात्रा करने के लिए प्रेरित होते हैं।
भारतीय सिनेमा ने भारतीय त्यौहारों होली और दिवाली आदि को आम विदेशी दर्शकों तक के लिए भली-भांति परिचित त्यौहार बना दिया है। दीपा मेहता की फिल्म जल और डैनी बॉयल की स्लमडॉग मिलियनेयर जैसी फ़िल्में सामाजिक बुराइयों को उजागर करने में अपनी भूमिका निभाती हैं जो हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा हैं। भारतीय फिल्मों को कई वर्षों में ऑस्कर, कान, और अन्य प्रमुख फिल्म समारोहों जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों में प्रस्तुत किया गया है। अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय, सोनम कपूर, विद्या बालन, इरफान खान जैसे अनेकों भारतीय कलाकार अलग-अलग तरीके से विदेशी तट पर अपनी उपस्थिति महसूस करा रहे हैं। वे या तो विदेशी फिल्मों में अभिनय करने में शामिल हैं या प्रमुख फिल्म समारोहों में जूरी का हिस्सा हैं, जैसे कि फ्रांस में प्रसिद्ध कान समारोह। ये कलाकार भी अपनी उपस्थिति के साथ-साथ विदेशों में भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने में भी बड़ी भूमिका निभा रहे है।
भारतीय फिल्में विदेशों में लोग बहुत ही रोमांचित होकर देखते है। मेरे ही कुछ अमेरिकन्स मित्रों ने "3 इडियट" और "दिलवाले", "स्लमडॉग मिलियनेयर" जैसी कई फिल्में देखी जो उनको बहुत ही पसंद आयीं और जिनको उन्होंने इतना पसंद किया कि हिंदी फ़िल्में देखने की उनकी उत्सुकता और भी बढ़ गयी। यहाँ कुछ के लिए शाहरुख़ खान बॉलीवुड है तो कुछ के लिए अमिताभ बच्चन, "द टाल मैन" (द्यण्ड्ढ द्यठ्ठथ्थ् थ्र्ठ्ठद)। हिंदी सिनेमा ने अपनी एक मजबूत पकड़ बना ली है, देश और विदेश में इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता।

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