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आपसी सहयोग से ही विकास संभव है
01-Jan-2017 12:30 AM 4045     

मालदीव में भारत के राजदूत अखिलेश मिश्र से आत्माराम शर्मा की बातचीत

भारतीय विदेश सेवा के 1989 बैच के अधिकारी श्री अखिलेश मिश्र विगत एक वर्ष से मालदीव में भारत के राजदूत हैं। इससे पूर्व वे टोरोंटो, कनाडा में कोंसुल जनरल थे और विदेश मंत्रालय में उप सचिव, संयुक्त सचिव के पदों पर काम करने के अतिरिक्त काबुल-अफगानिस्तान, दारेस्सलाम-तंजानिया, सैनफ्रांसिस्को-अमेरिका, काठमांडु-नेपाल, रोम-इटली और लीमा-पेरू में भी राजनयिक प्रतिनिधि रह चुके हैं। श्री मिश्र ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्वर्णपदकों के साथ मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक और एम.टेक की उपाधि प्राप्त की है। मूलतः वाराणसी के निवासी श्री मिश्र की भारतीय संस्कृति, साहित्य, दर्शन एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध आदि विषयों में गहरी रुचि है। हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्त उन्हें संस्कृत, स्पेनिश, इटैलियन और नेपाली का भी ज्ञान है। प्रवासी भारतीय दिवस के संदर्भ में उनसे हुई विशेष बातचीत के संपादित अंश :
दो बरसों के अन्तराल में आयोजित प्रवासी भारतीय दिवस के बारे में आपकी क्या राय है?
सबसे पहले तो गर्भनाल परिवार को प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर विशेषांक निकालने की पहल के लिये हृदय से धन्यवाद देना चाहूंगा। मैं गर्भनाल का नियमित पाठक हूँ। अत्यंत सीमित साधनों में आपने परिश्रम एवं समर्पण से भारत तथा अऩेकानेक देशों में स्थित हिंदी साहित्यकारों, साहित्यसेवियों, पाठकों एवं हिंदी प्रेमियों को एक अभूतपूर्व भावनात्मक सूत्र में, आत्मीयता के बन्धन में बाँध रखा है। आपकी भूमिका प्रवासी भारतीय समुदाय के लिए अत्यंत प्रशंसनीय एवं हर्षवर्धक है।
विदित ही है कि प्रवासी भारतीय दिवस समारोह का शुभारम्भ 2003 में किया गया था। आगामी समारोह जो इस श्रृंखला का 14वाँ होगा, 7-9 जनवरी 2017 को बंगलुरू, कर्नाटक प्रदेश में आयोजित होगा। इसमें पुर्तगाल के प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि होंगे। प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का आयोजन भारत सरकार एवं देश की जनता द्वारा प्रवासी भारतीयों के द्वारा भारत के सामाजिक एवं विकासात्मक प्रयासों में बहुमूल्य योगदान की मान्यता है, अभिस्वीकृति है। इस सम्मेलन द्वारा भारत सरकार न केवल प्रवासियों का सम्मान करना चाहती है, अपितु उन्हें एक मंच प्रदान करती है जिस पर वे केंद्रीय एवं प्रदेश सरकारों, विभिन्न क्षेत्रों के शीर्ष नीति-निर्माताओं, कलाकारों एवं बुद्धिजीवियों से सीधा संपर्क स्थापित कर सकें, विभिन्न विषयों और समस्याओं पर आत्मीय चर्चा, विचार-विनिमय कर सकें। माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के निर्देशन में प्रवासी भारतीय दिवस संयोजन के प्रारूप में मूलभूत परिवर्तन किया गया है। अब इस सम्मेलन का उद्देश्य प्रवासी भारतीयों की बड़ी से बड़ी भीड़ एकत्र करना नहीं है, बल्कि प्रवासी समुदाय से संबंधित विभिन्न विषयों पर, उनकी समस्याओं पर, भारत के आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी एवं कला संस्कृति के विकास में प्रवासियों की सहभागिता बढ़ाने की संभावनाओं पर आत्मीय, मुखर परिचर्चा एवं सार्थक विचार-मंथन करना है। इस बार युवा प्रवासियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
मालदीव में प्रवासी भारतीयों की उपस्थिति।
मालदीव में लगभग पच्चीस हजार प्रवासी भारतीय हैं और वे लगभग सभी भारत के नागरिक हैं। प्रवासी भारतीयों की मालदीव, जिसकी कुल जनसंख्या 4 लाख से कम है, के सर्वांगीण विकास में बहुमूल्य भूमिका रही है। विशेषत: चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक एवं वित्तीय प्रबंधन व पर्यटन में। यहां प्रमुखत: केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के भारतीय हैं।
प्रवासी समुदाय में भारत का आकर्षण किस रूप में है, अतीतजीवी या व्यावहारिक।
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी। भारत को देखने का दृष्टिकोण एवं भारत की छवि समूचे भारतीय समुदाय में एक जैसी नहीं है, क्योंकि प्रवासी भारतीय स्वयं में विविधता पूर्ण हैं। मोटे तौर पर उन्हें पांच वर्गों बांट सकते हैं- विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिक, भारत में जन्म विदेशी नागरिक, विदेशों में जन्मे, दूसरी-तीसरी पीढ़ी के भारतीय मूल के विदेशी नागरिक, भारतीय मूल के आर्थिक कारणों से शरणार्थी बने विदेशी नागरिक और भारतीय मूल के अपराधी, आतंकवादी, भारत विरोधी विदेशी नागरिक या शरणार्थी। भारत के साथ प्रत्येक वर्ग का भावनात्मक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध और उसका दृष्टिकोण अलग है। जहां एक बड़ा वर्ग दशकों विदेश में जीवनयापन करने के बाद भी भावनात्मक रूप से, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से भारत की भूमि से अनवरत जुड़ा रहा है और कई अर्थों में भारत के भारतीयों से भी अधिक भारतीय है, तो वहीं नई पीढ़ी के लोग भारत की सांस्कृतिक विरासत से कटते जा रहे हैं और कुछ तो ऐसे भी प्रवासी भारतीय हैं जो दिन-रात केवल भारत के विषय में विद्वेषपूर्ण दुष्प्रचार में और भारत विरोधी गतिविधियों में ही लगे रहे हैं। अत: प्रवासी भारतीय समुदाय के लिए भारत सरकार को एक बहुआयामी और बहुस्तरीय, रणनीति बनानी चाहिए। यथार्थ में केवल भावनाओं पर संबंध नहीं टिक सकते, उन्हें ठोस, पारस्परिक रूप से लाभदायक, आधार की आवश्यकता होती है। मात्र अतीतजीवी प्रवृत्ति के सहारे प्रवासी भारतीयों के साथ भारत का संबंध विकसित नहीं हो सकता।
कई पीढ़ियों से विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के नागरिक अपनी आगे की पीढ़ी को भी भारत की अस्मिता से परिचित करवाना चाहते हैं?
नई जमीन पर सब कुछ तो मिल गया लेकिन, / मलाल होता है, छोड़े गए मुकामों का। भारत में जन्मे, पले-बढ़े पुरानी पीढ़ी के लोग जो मातृभूमि और मातृभाषा से जुड़े हैं, प्राय: अपने गांव-समाज से पुन: जुड़ना चाहते हैं और अपने ज्ञान, अनुभव और आर्थिक साधनों से अपने मातृभूमि के विकास में योगदान करना चाहते हैं। परन्तु बाद की पीढ़ियां भारत के प्रत्यक्ष अनुभव से वंचित हैं। वे भारतीय भाषायें नहीं बोलते-समझते हैं। उन्हें भारत से जोड़ने के लिये ठोस कदम उठाने होंगे।
भारतीय मूल के लोगों की सुदृढ़ स्थिति का लाभ उठाने के लिये क्या प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रवासी भारतीय भारत को आर्थिक, राजनैतिक, सैन्य शक्ति में विश्व समुदाय में सम्मानित एवं अग्रगण्य देखना चाहते हैं। इस साझेदारी के लिये एक व्यावहारिक, पारदर्शी एवं सुविधाजनक ढांचे की आवश्यकता है जिसके माध्यम से प्रवासी भारतीयों का ज्ञान, अनुभव, निवेश भारत के सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी विकास में लग सके।
भारतीय सभ्यता-संस्कृति को प्रवासी अपनी पहचान के तौर पर देखते हैं या फिर यह सिर्फ सुविधायें पाने के लिये किया गया प्रपंच है।
उल्फत का जब मजा है, कि वो भी हों बेकरार / दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई। प्रेम केवल प्रपंच पर नहीं आधारित हो सकता, संबंध द्विपक्षीय हो तभी टिकता है। प्रवासियों और भारतवासियों के बीच पारस्परिक लाभदायी आदान-प्रदान चाहे भावनात्मक, सांस्कृतिक या कोरा आर्थिक और व्यापार का हो तभी संपुष्ट होगा। भारतीय संस्कृति की बात करें तो भारत की मिट्टी की सुगंध में, उसकी उर्वरता में, संस्कृति की विविधता में, जिजीविषा में जो अद्भुत शक्ति है वह कभी नहीं मिटती- चाहे व्यक्ति की वेशभूषा बदल जाये, भाषा, धर्म और नागरिकता भी बदल जाये।
अनेक देशों में प्रवासी भारतीय वहां की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन चुके हैं।
यह हमारे लिये अत्यंत सुखद संयोग है कि भारतीय मूल के लोग विश्व के कोने-कोने में, हर क्षेत्र में उन्नत स्थान और प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं। उनके पास व्यापार, विज्ञान-तकनीकी विकास, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण आगार है ज्ञान का, अनुभव का और संपर्क सूत्रों का। कर्म भूमि और भारत के बीच वे अत्यंत प्रभावी और स्वाभाविक कड़ी बन सकते हैं। लेकिन द्विपक्षीय आदान-प्रदान और आवागमन के लिये एक सेतु की आवश्यकता होती है, जिसका निर्माण भारत और भारतीयों को ही करना होगा। "अतिथि देवो भव" का मंत्र जप करने मात्र से कार्य सिद्ध नहीं होगा उनके स्वागत, सुविधानजक प्रवास के लिये यथोचित व्यवस्था करनी होगी। भौतिक ढांचा सुधारना होगा, व्यापार और काम करने की सुगमता में हम बहुत पीछे हैं। आधुनिक तकनीक हमारे सरकारी तंत्र की दक्षता बढ़ाने, पारदर्शिता बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकती है। सोशल मीडिया प्रवासी भारतीयों को जोड़ने में बहुत उपयोगी है। आज वैश्वीकरण के युग में प्रवासी भारतीय, भारत का अन्य देशों के साथ आर्थिक, राजनैतिक, तकनीकी, शिक्षा और सांस्कृतिक क्षेत्रों में संबंध विकसित करने में एक प्रभावी उत्प्रेरक बन रहे हैं। भारत किसी से चैरिटी या दान की अपेक्षा नहीं रखता अपितु सभी पक्षों के लिए सुविधानजक, लाभदायक संबंधों को प्रोत्साहन देना चाहता है।
प्रवासी भारतीयों और उनकी संतानों की नागरिकता को लेकर दुविधा की स्थिति।
भारत सरकार नागरिकता को लेकर प्रवासियों के मानसिक द्वन्द्व एवं असमंजस की स्थिति से परिचित है। प्रवासी भारतीय भले ही परिस्थितियों वश या व्यावहारिक कारणों से अन्य देशों की नागरिकता स्वीकार कर लें, उनका दिल हिन्दुस्तानी ही बना रहता है, उनकी सांस्कृतिक विरासत कोई उनसे नहीं छीन सकता। वे जिस भी रूप में भारत से, भारतीय अर्थव्यवस्था, भारतीय संस्कृति से जुड़ना चाहें भारत सरकार और जनता उनकी भावनाओं का सम्मान करती है, स्वागत करती है।
इन्वेस्टर्स समिट आयोजनों के बारे में क्या कहेंगे?
विभिन्न प्रदेश सरकारों द्वारा अपने विकास कार्यक्रमों, विदेशी निवेश की संभावनाओं के बारे में जागरूकता फैलाने के प्रयास अवश्य ही प्रशंसनीय हैं। प्रयास लेकिन पर्याप्त नहीं है। इन्वेस्टर्स समिट की सफलता के लिये आवश्यक है कि वे सामाजिक आयोजन बनकर न रह जायें, बल्कि ठोस निवेश के प्रस्ताव प्रस्तुत करें, उनकी कार्यान्वयन की प्रक्रिया पर समुचित ध्यान दें। आज अधिकांश सूचनायें जो इन्वेस्टर्स समिट में प्रस्तुत की जाती हैं, ऑनलाइन सुगमतापूर्वक उपलब्ध हैं। सफल सम्मेलन के लिये हमें बहुत सतही, सामान्य सूचनाओं के आदान-प्रदान से आगे बढ़ना होगा।
भारत की राजनीतिक व्यवस्था तथा नौकरशाही को कभी न सुधरने वाले सन्दर्भ के तौर पर देखा है। क्या इस स्थिति में बदलाव आयेगा।
विश्वभर में किसी देश या व्यक्ति के पास जादुई छड़ी नहीं है कि पलक झपकते ही आदर्शतम व्यवस्था स्थापित की जा सके। स्वच्छ प्रशासन, न्याय संगत समाज के लिये सर्वांगीण प्रयास, सबका सहयोग, सबकी सहभागिता अनिवार्य है। केवल सरकार, केवल प्रधानमंत्री, मंत्री, नेता या अधिकारी संस्थागत कमियों के लिये उत्तरदायी नहीं ठहराये जा सकते, जनता भी उतनी ही उत्तरदायी है। भ्रष्टाचार मुक्त, स्वच्छ, पारदर्शी व्यवस्था के लिये अनिवार्य है कि सरकारी प्रक्रियायें, नियम-कानून आसान और सुबोध हों, पर्याप्त नियंत्रण एवं संतुलन हो, विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं में सबमें नियम-कानून के प्रति आस्था हो, अनुशासन हो और नियम-कानून के उल्लंघन पर दंड का डर हो। विकसित देशों की तुलना में न्यायाधीशों, सुरक्षा कर्मियों, सरकारी-सेवादल अधिकारियों की संख्या भारत में बहुत कम है। उन्हें अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों में, सीमित साधनों में काम करना पड़ता है। आमूलचूल परिवर्तन के लिये सबको अपना-अपना दायित्व, अपनी भूमिका ईमानदारी से, अनुशासनबद्धता से निर्वाह करना पड़ेगा जैसे विकसित देशों में प्राय: होता है और जैसा उन देशों में स्थित प्रवासी भारतीय भी करते हैं।
दोहरी नागरिकता के संबंध में आपकी क्या राय है?
भारत में दोहरी नागरिकता संभव नहीं है। कोई विदेशी नागरिक, भारतीय नागरिकता या भारतीय पासपोर्ट नहीं रख सकता। भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को भारत से जोड़ने के लिये सरकार ने ओवरसीज सिटिजेनशिप ऑफ इंडिया (ग्र्क्क्ष्) स्कीम प्रारंभ की है। यह दोहरी नागरिकता नहीं है और राजनैतिक अधिकार (मतदान या संवैधानिक पदों पर चुना जाना) नहीं प्रदान करता। ओसीआई के तहत विदेशी अधिकांश व्यावहारिक क्षेत्रों में भारतीय नागरिकों के समतुल्य सुविधायें पाते हैं। विदेश मंत्रालय/गृह मंत्रालय के वेबसाइट पर ओसीआई आवेदन की प्रक्रिया के विषय में पूरी जानकारी दी गई है। कोई भी उन नियमों के अनुसार ओसीआई के लिये आवेदन कर सकता है। जैसा पहले स्पष्ट किया गया, भारत के संविधान में "दोहरी नागरिकता" का प्रावधान ही नहीं है।
क्या ओसीआई केवल धनाढ्य प्रवासियों के लिये है?
यह धारणा कि भारत सरकार का उद्देश्य केवल धनाढ्यों को लुभाना है- पूर्णतया असत्य और अनुचित है। प्रवासी धनाढ्य पूंजी ला सकते हैं, तकनीकी, वैज्ञानिक, सामाजिक विकास में योगदान कर सकते हैं और हम उनका स्वागत करना चाहते हैं। लेकिन सरकार का निरन्तर प्रयास रहा है कि विदेशों में अपेक्षाकृत दीन-हीन स्थिति में कार्यरत प्रवासी भारतीयों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाये। हमारी माननीया विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी स्वयं सोशल मीडिया, ट्विटर के माध्यम से हर भारतीय से जुड़ी हैं और बिना किसी भेदभाव के प्रवासियों के कष्ट निवारण में संलग्न हैं। आगामी प्रवासी भारतीय दिवस समारोह में भारतीय कामगारों की समस्याओं पर एक विशेष परिचर्चा होगी, विविध काउंसलर सेवाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जायेगा।
ऐसे भारतीय जो विकास का समुचित वातावरण न मिलने के कारण देश छोड़कर विदेश चले गये, क्या कहेंगे।
भारत एक प्रजातांत्रिक गणराज्य है जहां हर व्यक्ति को संविधान द्वारा विभिन्न अधिकार प्रदान किये गये हैं। हर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत विकास के लिये अपनी इच्छानुसार निर्णय लेने के लिये स्वतंत्र है विदेश में पढ़ने, काम करने या बसने के लिये। भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम जैसी अनेक विभूतियां हुईं हैं जो देश में रहकर ही विश्वविख्यात हुई हैं, तो अनेक लोग विदेशों में जाकर चमके हैं। भारतीय भाई-बहन, बच्चे जहां भी रहें, सुख-समृद्धि में रहें, निरन्तर उत्कर्ष एवं प्रगति के पथ पर रहें यही हमारी कामना है। जहां कहीं भी स्थित हों, वे भारत के विकास में योगदान कर सकते हैं।
अनेक देशों में भारतीयों को वहां के मूल निवासियों का विरोध सहन करना पड़ रहा है।
देखा उन्हें करीब से हमने तो रो दिये
जिन बस्तियों में आग लगाने चले थे हम
प्राय: विदेशों में भारतीय समुदाय के प्रति द्वेष एवं हिंसा के पीछे, उनका मूल निवासियों के साथ तालमेल और समझदारी की कमी होती है। विदेशों में स्थित भारतीयों के लिये यह आवश्यक है कि वे मूल निवासियों के साथ समरस, सौहाद्र्रपूर्ण संबंध बनाकर रखें और उनकी संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं के प्रति आदर एवं कृतज्ञता का भाव रखें। भारतीयों को यथाशक्ति स्थानीय समाज के हितों और उसके विकास के प्रति अंशदान करना चाहिए तथा बदलते राजनैतिक, सामाजिक, सुरक्षा की स्थिति के प्रति जागरूक तथा संवेदनशील रहना चाहिए।
विदेशों में भारत सरकार की सुरक्षा का तंत्र नहीं होता, स्थानीय सरकार और स्थानीय जनता के सहयोग एवं सद्भाव से ही सुरक्षा संभव है। हर एक को इस दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है। परस्पर आत्मनिर्भरता का बोध ही पारस्परिक सुरक्षा का आधार बन सकता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में सनातन से सबके मंगल की प्रार्थना की परम्परा रही है -
नन्दन्तुसर्वभूतानि स्निह्यन्तु विजनेष्वपि।
स्वस्त्यस्तु सर्वभूतेषु निरान्तकानि सन्तु च।।

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