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सामाजिक सरोकारों से हटता सिनेमा
01-May-2017 01:30 PM 3607     

हमारे जीवन में फिल्मों का अहम स्थान है। मुझे लगता है कि मेरा बचपन सिनेमा नाम की चिड़िया को चौदह साल की आयु में ठीक-ठाक तरीके से जान पाया होगा। इससे पहले बचपन में कभी-कभार सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए गाँवों में भारत सरकार का फिल्म प्रभाग सरकारी उपलब्धियों वाली फिल्मों के साथ एकाध डाक्यूमेंट्री फिल्में दिखाता था। हम गाँव वालों का सिनेमा से पहला परिचय यही था।
हमारे समय में (आठवें दशक के दौरान) बच्चों को यह कहकर फिल्में देखने से रोका जाता था कि इससे वह बिगड़ जाएँगे। यह माध्यम हमारे लिए उस समय किसी परीलोक की सैरगाह या चमत्कार से कम न लगता था। आँखों के सामने जो परदे पर आता था वह दिमाग के जरिए उतरकर कई बार मन को बहुत छूता था। सिनेमा की लोकप्रियता की वजह यही है कि यह हर बार जिंदगी से रू-ब-रू होने जैसा होता है। जिंदगी के अनदेखे कोनों और वर्जित क्षेत्रों को भी दिखा देता है सिनेमा। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि सिनेमा की यह यात्रा हजारों फिल्मों में समाई हुई है। सिनेमा का एक बहुत बड़ा कालखंड हमारे सामने पसरा हुआ है। आसान नहीं है हिंदी सिनेमा की बहुलतावादी इंद्रधनुषीय छवि के भीतर उतरना और उसकी पड़ताल करना। सिनेमा की खूबियों और खामियों पर बात करना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान काम नहीं है।
आज स्थिति यह है कि एक वाक्य में कहें तो "राजा हरिश्चंद्र" की मूक अभिव्यक्ति से बहुत आगे बढ़कर हिंदी सिनेमा "रा वन" की उच्च प्रौद्योगिकी क्षमता के स्तर तक पहुँच चुका है। सिनेमा अपने आरंभिक दौर के शिक्षणकाल से निकलकर मनोरंजन और प्रोपेगंडा तक पहुँच चुका है। हिंदी सिनेमा के साथ-साथ क्षेत्रीय मसलन - मराठी, गुजराती, मलयालम, तेलुगु, कन्नड, तमिल, उड़िया, बांग्ला, भोजपुरी, गढ़वाली, हरियाणवी, पंजाबी और पूर्वोत्तर की भाषाओं में भी भारतीय सिनेमा की एक समानांतर दुनिया फैली हुई है। हिंदी सिनेमा को देश ही नहीं विदेशों में भी बड़ी बेकरारी के साथ देखा जाता है। विश्व के कई देशों में जहाँ प्रवासी भारतीयों की संख्या बहुत अधिक है वहाँ हिंदी सिनेमा को खासी लोकप्रियता प्राप्त है।
सिनेमा की पूरी यात्रा पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि हर दशक के साथ न सिर्फ सिनेमा का रूप स्वरूप बदलता रहा है बल्कि तेवर और सरोकार भी बदलते रहे हैं। सिनेमा पर आठवें और नौंवें दशक के दौरान अडरवल्र्ड से संबंध और उसकी पूँजी के इस्तेमाल के आरोप भी लगते रहे हैं। सच तो यह है कि सिनेमा की शुरुआत में फिल्मों के निर्माण पर कम पूँजी और अधिक समय लगता था। आगे चलकर जब तकनीकी स्तर पर हिंदी सिनेमा मजबूत हुआ तो फिल्में साल दो साल के बजाय फटाफट वाली रफ्तार से बनने लगीं। यहीं से फिल्म उद्योग पर पूँजी का वर्चस्व इतना अधिक बढ़ा कि उसने कंटेंट और सामाजिक सरोकारों को बहुत पीछे ढकेल दिया। यही वजह है कि आज की फिल्मों में हमें गाँवों के भारत की तस्वीर कम दिखती है जबकि मेट्रो शहरों मुंबई या गोवा की चमक-दमक, शापिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स अधिक दिखता है। हालाँकि कुछ फिल्मकारों ने प्रतिरोध के सिनेमा या सामाजिक सवालों की धारा को अपनी फिल्मों के माध्यम से बरकरार रखा है जिसमें प्रकाश झा का नाम अग्रणी है। कभी-कभार "हल्ला बोल" जैसी सार्थक फिल्में भी आती हैं जिनसे उम्मीद बनती है कि सब कुछ अभी बदला नहीं है। सार्थकता की उम्मीद नए आने वाले युवा फिल्म निर्माताओं से अभी बाकी है जिन्होंने नई-नई शुरुआत की है।
वैश्वीकरण के बाद सिनेमा पर इन दिनों धीरे-धीरे औद्योगिक घरानों का दखल बढ़ रहा है जो कि उसे और अधिक लाभ कमाऊ फैक्ट्री में तब्दील कर रहा है। आज फिल्मों पर बाजारवाद का वर्चस्व इस कदर बढ़ा है कि वह दर्शकों को क्या परोसा जाएगा यह तय करता है। जिस तरह टीआरपी (टेली रेटिंग प्वाइंट) सर्वाधिक देखे जाने वाले कार्यक्रमों की सूची हर सप्ताह जारी करती है। टीआरपी के आधार पर ही तमाम मनोरंजन प्रधान धारावाहिकों की थीम और कंटेंट तय होता है और दर्शकों में लोकप्रिय धारावाहिकों को विज्ञापनदाता कंपनियाँ प्रायोजित करती हैं। यही स्थितियाँ सिनेमा पर भी लागू होती जा रही हैं। यानी दर्शक यहाँ निर्णायक नहीं है बल्कि विज्ञापनदाता कंपनियाँ या प्रायोजक ही माई बाप हैं। दर्शकों के पास पैसे खर्च करने के बावजूद भी चुनाव के सीमित विकल्प हैं। यही कारण है कि आज फिल्में सिर्फ पैसा कमाने के लिए बनती हैं उनका उद्देश्य कहीं से भी सामाजिक सवालों से टकराना या उन्हें उठाना नहीं है। आज का सिनेमा कई बड़े औद्योगिक घरानों की अकूत पूँजी पर खड़ा है। भारतीय सिनेमा पर पूँजी का यह दखल इस कदर बढ़ रहा है कि यह सिने निर्देशकों के सरोकारों पर खासा असर डाल रहा है। उनकी मानसिकता को बाजारवादी ताकतों के साथ मिलकर कदमताल करने पर मजबूर कर रहा है।
सच तो यह है कि सिनेमा जैसा बेहद प्रभावशाली माध्यम, जिससे एक बड़े जनसमुदाय को संबोधित करने या उसे जागरूक करने की अपेक्षा की जाती थी, वह संभावना अस्ताचल की ओर अग्रसर है। यही वजह है कि सिनेमा की मास अपील कम हो रही है। सिनेमा का अंदाज और कंटेंट पिछले दो दशकों के दौरान बहुत सतही हुआ है और फिल्मों में हिंसा और मारधाड़ हावी हो चली है। इसकी एक वजह यह भी है कि इंटरनेट, सीडी, मनोरंजन चौनलों और अखबारों ने गंभीरता की विदाई कर दी है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सिनेमा का नियंत्रण जब कारपोरेट ताकतों के पास होगा तो वे उसे किसी फैक्ट्री की भाँति चलाएँगी ही। ये ताकतें जब पूँजी निवेश करेंगी तो उसकी वापसी मुनाफे के साथ कराने के लिए वे उसे बदलेंगी ही क्योंकि उनके लिए सरोकार और शिक्षण के बजाय कमाई ज्यादा मायने रखती है। आज यही हो रहा है। यही कारण है कि सिनेमा अब कस्बाई नहीं बल्कि मेट्रो और माल वाला हो गया है। आज छोटे कस्बों और छोटे शहरों से सिनेमा की विदाई हो गई है वे या तो आलू के गोदाम बन गए हैं या फिर गेस्ट हाउस या बारातघर। फिल्म निर्माता पर बाजारवादी ताकतों का इतना दबाव है कि वह चाहे हीरोइन के कपड़े उतरवाएँ या डांस कराएँ लेकिन फिल्म निर्माण पर लगा बजट जरूर वापस कराएँ। वैसे सच तो यह है कि आज का सिनेमा सिर्फ इंटरटेनमेंट है और इससे अलग कुछ भी नहीं। यही वजह है कि सिनेमा आज अपने सामाजिक सरोकारों से पीछे हटता जा रहा है। आज की फिल्मों को और हिंदी सिनेमा को इसी रूप में देखा जाना चाहिए।

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