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भारतीय बाज़ार में सस्ते चीनी उत्पाद
01-Oct-2017 01:39 PM 3323     

दो देशों के बीच राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध के बाद सबसे महत्वपूर्ण होता है- व्यापारिक संबंध। भारत एवं चीन के मध्य दो हज़ार से भी ज्यादा समय से मजबूत व्यापारिक संबंध बना हुआ है, जो आज भी निर्बाध रूप से जारी है। वर्तमान में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक मित्र है जो 2007 में भारत का 7वाँ बड़ा व्यापारिक मित्र था, साथ ही साथ भारत चीन का 9वाँ बड़ा व्यापारिक मित्र है। यह व्यापारिक संबंध थोड़ा असंतुलित भी है। भारत चीन से आयात ज्यादा करता है और निर्यात कम। आज भारत का हर बाज़ार चीनी सामानों से भरा पड़ा है। चाहे भारत के सबसे बड़े त्योहार दिवाली की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति हो या रंगों के त्योहार होली का रंग-अबीर और पिचकारी हो, सब के सब चीन से ही भारत में आयातित होते हैं। एक दशक पहले चीनी मोबाइल भारत में घटिया और नकली मोबाइल के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन आज दस साल बाद चीनी मोबाइल कंपनियां अपनी मोबाइल गुणवत्ता में सुधार करते हुए भारतीय बाज़ार में अपनी मजबूत बैठ बना चुके हैं। वर्तमान भारतीय बाज़ार में सस्ते चीनी मोबाइल जैसे ओप्पो, श्याओ मी, ह्वा वेई उन भारतीय युवाओं की पहली पसंद बन चुके हैं जो एप्पल या सैमसंग के महंगे मोबाइल खरीदने में असमर्थ हैं। आज चीनी सामानों की उपलब्धता और लोकप्रियता केवल भारतीय शहरों में ही नहीं बल्कि सुदूर गाँव व देहात में भी है।
प्रश्न है कि चीनी सामान इतने सस्ते क्यों हैं? क्या भारतीय कम्पनियां इन सस्ते चीनी उत्पादों को टक्कर दे सकती हैं? क्या भारत चीन से आयात की तुलना में ही अपने उत्पादों को चीन में निर्यात कर सकता है? इन सब प्रश्नों के उत्तर के लिए हमें भारत चीन की व्यापारिक संरचना पर ध्यान देना होगा। किसी भी उत्पाद के लागत मूल्य को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं- कच्चे माल का लागत मूल्य, कर्मचारियों का वेतन, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लागत मूल्य, ट्रांसपोर्टेशन का खर्च और इनर्जी खर्च। ये सारे कारक किसी भी उत्पाद के सस्ते और मँहगे होने के लिए जिम्मेदार हैं।
चीन में कच्चे माल की उपलब्धता सर्वत्र आसानी से हो जाती है जो चीनी उत्पादों के सस्ते होने के महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। चीन में भारत की अपेक्षा पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर बहुत ही अच्छा है। रेल, सड़क और जहाज आदि की सुविधा की उत्तम व्यवस्था तो है ही साथ ही बंदरगाहों आदि पर ज़रूरी कागजी करवाई भी आसानी से हो जाती है। इन सब कारणों से उत्पादों को बहुत आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। वह भी बहुत कम कीमत पर जिसका सीधा प्रभाव उत्पादों के मूल्य पर पड़ता है। भारत में कम्पनी के उत्पादों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट से समय पर एक जगह से दूसरी जगह पर पहुँचाना अपेक्षाकृत मुश्किल है। अधिकांश भारतीय कंपनियां अपने उत्पादों की सप्लाई के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट की अपेक्षा प्राइवेट ट्रांसपोर्ट या खुद के ट्रांसपोर्ट पर ज्यादा निर्भर रहती है। इस प्रकार भारतीय उत्पादों के लागत मूल्यों के बारे में हम सोच सकते है। इस स्थिति में भारतीय कम्पनियों का चीन से सस्ता सामान बेचना आसान नहीं है। चीनी उत्पाद अपने ब्रांड के नाम से नहीं जाने जाते हैं बल्कि अपने सस्ते मूल्य से जाने जाते हैं, बल्कि भारतीय कम्पनियां सस्ते दाम की कीमत पर अपने ब्रांड का नाम नहीं ख़राब कर सकती, भारतीय कम्पनियों को अपने ब्रांड का नाम ही बनाने में सालों लग जाते हैं, जबकि चीनी कम्पनियां अपने ब्रांड के नाम की चिंता किये बिना अपने सस्ते सामानों से भारतीय बाज़ार को पाट रही हैं। इस प्रकार भारतीय कम्पनियों का सस्ते चीनी सामानों का सामना करना थोड़ा मुश्किल है।
भारत की तुलना में चीन में कार्य क्षमता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है और कम्पनियाँ समय पर उत्पादन करके समय को बचाते हुए बाज़ार में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाये रखती हैं। किसी भी विवाद की स्थिति में न्यायालय में निपटारा चीन में भारत की अपेक्षा जल्दी होता है जो कंपनियों के उत्पादों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। चीन अपने उत्पादों का उत्पादन गुणवत्ता की चिंता किये बिना थोक में करता है और उसका निर्यात भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व में करता है। भारत में जहाँ किसी कम्पनी की स्थापना के बहुत सारे जटिल नियम कानून हैं, वहीं कर नियम, श्रमिक कानून भी किसी नयी कम्पनी की स्थापना की राह में रोड़े हैं, जबकि चीन में बहुत हद तक कंपनियों को इन सारी बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता है। इस प्रकार से चीन आसानी से थोक में वस्तुओं का उत्पादन करता है जो भारतीय कंपनियों के उत्पादों से सस्ता होता है।
वैसे चीनी कम्पनियों पर भारत में डंपिंग के आरोप भी लगते रहते हैं कि चीनी कम्पनियाँ भारतीय बाज़ार में पैठ बनाने के लिए बाज़ार मूल्य से कम दाम पर बेचती हैं। अंततः इसमें कोई शक नहीं कि सस्ते चीनी उत्पादों की पहुँच भारतीय बाज़ार में बहुत अन्दर तक हो गयी है, जिसका वर्तमान में भारतीय कम्पनियों के पास कोई मजबूत विकल्प नहीं है। चीनी सरकार व्यापारिक प्रतिष्ठान की स्थापना और उनकी गतिविधियों में कम हस्तक्षेप करते हुए जरूरी सहायता उपलब्ध कराती है जबकि भारत में राजनीतिक हस्तक्षेप ज्यादा है जिससे कम्पनियों की स्थापना, कार्यक्षमता, लागत आदि प्रभावित होती हैं

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