ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रेम का बन्धन
01-Jan-2017 01:13 AM 3639     

लम्बा प्रवास, भारत की तैयारी थी, न थे पैर जमीं पर
आकाश में मैं उड़ती थी, आ पहुँची मैं वतन अपने पर
इन्दिरा गाँधी एयरपोर्ट पर, धीमी बत्तियां जलती थीं
अमेरिका की चकाचौंध के बाद, मीठी-सी ये लगती थीं
आंखों से अश्रु ढुलक गये, नयनों से अश्रुधारा बहती थीं
प्रेेम का बन्धन होता है कुछ ऐसा जाना तब
भारत की धरती को मैंने स्पर्श किया जब

चिर-परिचित बन्धु-बान्धव स्वागत को थे आये सब
आंख मिली और गले लगाया, थमा हुआ था बांध तब
टूट गया और अश्रु की नदियां दोनों ओर से बह निकलीं
प्रेम का बन्धन होता है कुछ ऐसा जाना तब
सबने मुझको आलिंगन में बांध लिया जब

क्यों भूल गयीं तुम हमको, क्यों दूर गयीं इतनी तुम
क्या याद हमारी आती नहीं, क्यों रूठ गईं हमसे तुम
प्रश्नों की झड़ी लगी, मैं मूक-बधिर सी खड़ी रही
क्या उत्तर दूँ मैं उनको, दोषी अपने को ही पाती रही
प्रेम का बन्धन होता है कुछ ऐसा जाना तब
प्रेम से विह्वल-सा हुआ उनको पाया मैंने जब

चेहरे पर उनके खुशियां थीं, हृदय हिलोरें लेता था
अगली पिछली बतियां करते, धूप-छांह की सहते छइयां
गुजरे दिन हमने याद करे, जब खेल में बीता बचपन था
डाल मां के गलबहियां सोते थे, हम सब बहिना भईया
प्रेम का बन्धन होता है कुछ ऐसा जाना तब
बचपन की स्मृति के झूले में मैं झूल गई जब

आनन-फानन में दिन वो थे फिर बीत गये
फिसल-फिसल वो जाते थे, हाथ न फिर वो मेरे आते थे
पंख उन्हें लग जाते दूर सुदूर जा, लौट न फिर वो आते थे
चलने पर आंखें थीं भरी हुईं, चेहरे पर अवसाद के कण थे

अबकी गई फिर कब लौटोगी, पूछ रहे थे सब मिलकर
लूट चलीं तुम मिलने की खुशियाँ, जो हमने पाई थीं
रोके न रुकोगी, लौट चलीं तुम, कहा उन्होंने बेमन से
लौटोगी तुम जल्दी ही अब यही दिलासा हमको दे चलीं
प्रेम का बन्धन होता है, कुछ ऐसा जाना मैंने तब
भीगी पलकें बहते अश्रु अपनों से विदा हुई मैं जब

बैठ किसी और के पंखों पर, भारत माँ को नमन किया
वापस कैलिफोर्निया जाने को फिर मैंने प्रस्थान किया
ढुलक अश्रु जब गिरते थे, प्रिय यादों के बादल घेरे लेते
खिड़की से झाँक रहे रूपहले बादल, मुझको बेमानी लगते

एयरपोर्ट से घर पहुँची, सब स्वागत को तत्पर थे
चेहरे पर थीं अपार खुशियाँ, जैसे सब मुझमें समा गये
क्यों आई हो दिन इतने में, सबने मिल उलहना दिया
नन्हे निकिता और अनीश बोले दादी सपने में आती थीं
कहकर वे मुझसे लिपट गये और अंक में मेरे समा गये
प्रेम का बन्धन होता है ऐसा कुछ जाना मैंने तब
खुशी से खिलता चेहरा देखा उनका मैंने जब।

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