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बावरा मन
01-Dec-2017 10:04 PM 1660     

चहकती चिड़िया संग
कभी लगे चहकने
दूर गगन में लंबी
और ऊँची उड़ान भरे
कभी तितली संग
फूलों पर लगे मँडराने
बावरा मन मेरा।

पूनम की रात में
पूर्णमासी चाँद के संग
लगे पूरी रात बिताने
शीतल चाँदनी में
खोया हुआ
अध खुली आँखों
स्वप्न कोई बुनता
बावरा मन मेरा।

कभी विरह के गीत गाता
कभी मिलन के स्वप्न सँजोता
प्रस्फुटित आनन्द के संग
प्रणय गीत नया कोई रचता
कभी गाता कभी मुस्कुराता
खुद से हर पल बातें करता
बावरा मन मेरा।

नयी नवेली दुल्हन-से
अनोखे रंगीन सपने
उमंग उत्साह का सागर
जैसे लेता रहता हिलोरे
वैसे ही सागर की मस्ती संग
हरदम लेता हिलोरे
बावरा मन मेरा।


खुद में हरदम खोया रहता
खुद ही खुद से बातें करता
कभी उत्साह का पार नहीं
तो कभी उदासी का अंत नहीं
धीर गंभीरता की चादर ओढे
तो कभी हँसी संग
रेशमी दुपट्टा उड़ाता
बावरा मन मेरा।

चाहे नयी तस्वीर बनाना
तो कभी शब्दों के संग खेलना
दूर गगन में लंबी उड़ान भरता
कभी फूलों के संग खिलता
तो कभी खुशबू के साथ महकता
कल्पना लोक में विचरण करता
बावरा मन मेरा।

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