ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अविस्मरणीय पड़ोसी
01-Jan-2018 02:45 PM 2944     

लम्बी अवधि से हम किसी से परिचित होकर भी कभी- कभी नितान्त अपरिचित ही रह जाते हैं किन्तु कभी- कभी हमारा अल्पकालीन परिचय भी शीघ्र ही आत्मीयता और घनिष्ठता में बदल जाता है। जब किसी व्यक्ति के गुण, स्वभाव अथवा व्यक्तित्व का कोई अन्य पक्ष मन को इतना प्रभावित कर लेता है कि हम सहज ही उसकी ओर आकृष्ट हो जाते हैं। वर्ष 1963 की बात है, जब मैं जर्मन प्राध्यापिका रोजमेरी शालर के साथ पश्चिम जर्मनी के ट्यूबिगेन शहर में गार्टेन श्ट्रासे पढ़ रह रही थी। एक दिन सायंकाल घंटी बजी और द्वार खोलने पर मुस्कुराते अपरिचित दम्पत्ति को खड़े देखा। तत्काल ही परिचय मिला कि मेरे ऊपर वाले अपार्टमेंट में अभी-अभी रहने के लिये आए श्रीमती एवं श्री विल्डे हमसे भेंट करने आये हैं। शालर भी उस समय तक घर आ चुकी थी, अत: हम दोनों ने ही उनका स्वागत किया और आतिथ्य भी। प्रथम भेंट में ही मुझे वह सरल स्वभाव के लगे। "हम यहाँ रहने आये हैं तो अपने आसपास के परिवारों को हमारे विषय में और हमें उनके विषय में जानना ही चाहिये। पड़ोसी से मित्रता सुखदायी होती है- यदि स्वार्थ बीच में न आ जाये। इसीलिये हम मिलने चले आये।" उस दिन के बाद से हम लोग जब भी कभी मिलते मुस्कुराकर "गुटेन मॉर्गेन" या "गुटेन टाग" (गुडमॉर्निंग, गुड डे) कहना नहीं भूलते थे।
उस दिन बहुत बर्फ गिरी थी- वृक्ष भी बर्फ से ढँक गये थे। पृथ्वी पर भी बर्फ की मोटी तह जमी थी। मैं इंस्टीट्यूट से लौटी तो देखा घर के सामने के खुले हिस्से में मानव आकृति सी बन रही है। हिल्डेगार्ड और हेनरी ने दौड़कर मुझे दिखाया कि वे लोग स्नोमैन (बर्फ का आदमी) बना रहे हैं। उनकी माँ ने ऊपर की मंजिल में अपनी खिड़की से झांककर बच्चों को आवाज दी और स्नोमैन के गले में बांधने के लिये एक पुराना मफलर फेंका। दोनों आँखों की जगह दो बड़े कोयले लगवाये और मुँह में फंसाने के लिये सेब दिया। हाथ में छड़ी सी पकड़ने को कहा। थोड़ी ही देर में यह आकृति पूरी तरह सज गई थी। अपने परिश्रम को सफल देखकर बच्चे भी प्रसन्न हो गये थे और उनकी माँ भी बच्चों की उस कलाकृति को देखकर गद्गद् हो रही थी। अपने बच्चों को शाबाशी दे रही थी। इसी क्षण मेरे मन में विचार आया कि भारत में बादल देखकर ही हम अपने बच्चों को घर में बुला लेते हैं। पानी बरसने वाला है। भीग जाओगे। बीमार हो जाओगे। यहाँ माता-पिता अपने बच्चों को मजबूत बनाने और मनोरंजन के लिये उत्साहित भी करते हैं और मार्गदर्शन भी। पानी बरसने पर स्कूल जाने वाले हमारे बच्चे प्राय: घर में ही रुक जाते हैं और यहाँ बर्फ गिरती रहती है। फिर भी बच्चे स्कूल जाते हैं। डरकर घर में नहीं बैठ जाते। कई बार मैंने देखा था कि सड़क पर चलते हुये बच्चे चाकलेट का कागज या आइसक्रीम की डंडी तब तक हाथ में पकड़े रहते थे जब तक उसे फेंकने का कोई उपयुक्त स्थान नहीं आता था। जहाँ-तहाँ न फेंकने का पाठ उन्हें बचपन से ही पढ़ाया जाता है। सप्ताह में एक बार सफाई वाली गाड़ी आकर कूड़ा उठा ले जाती थी। सभी अपने-अपने घरों के सामने अपने ढक्कनदार बंद कूड़ेदान सबेरे ही रखकर मोटर निकालते और तब काम पर जाते थे। शाम को आकर खाली बाल्टी उठाकर घर में रख लेते थे। कभी-कभी तो पुराना फर्नीचर या और भी ऐसी प्रयोग की हुई चीजें फुटपाथ पर रखी रहती थीं, जिन्हें सफाई वाले उठा ले जाते थे।
विल्डे परिवार बड़ा मिलनसार था। वे कभी कहीं घूमने जातीं तो मुझसे भी चलने को कह देतीं, बच्चे भी आग्रह करते। बाजार जाते समय भी प्राय: मुझसे पूछ लेतीं कि कुछ चाहिये तो नहीं? उधर से लेती आयेंगी। मैं भारत से अपने लिये चमड़े के जूते खरीद कर ले गई थी, उन्हें पहनने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। मैंने चलने से पूर्व उनकी बेटी हिल्डेगार्ड को भेंट किये तो मुझसे मूल्य बताने का आग्रह करने लगीं। बड़ी कठिनाई से मैंने उन्हें रोक पाया था। मैंने बच्चों के पिता से कमरे, टेपरिकॉर्डर और टाइप राइटर और प्रोजेक्टर की जानकारी ली थी और उनके प्रयोग की विधि भी सीखी थी। उस समय टेपरिकॉर्डर और टीवी आदि भारत में बहुत ही कम दिखाई देते थे और वह भी कुछेक अत्यन्त समृद्ध परिवारों में ही रहते थे। रेफ्रीजरेटर भी अधिक सुलभ नहीं थे। वहाँ घरों-घरों में ये सभी वस्तुएँ सामान्य सी बात थी। कभी-कभी मैं सोचती कि पता नहीं भारत में ये सुविधायें कभी प्राप्त हो सकेंगी या नहीं?
एक दिन मैं संध्या समय श्रीमती विल्डे से मिलने उनके घर गई। बातचीत के दौरान वे लोग मेरे परिवार एवं भारत के विषय में बात करने लगे। ये समय भारत के लिये सुख-शांति का नहीं था। 1963 में चीनी आक्रमण से संकट उपस्थित हो गया था। विल्डे ने चिंता प्रगट करते हुये कहा था- "ईश्वर करे शीघ्र ही भारत में शांति स्थापित हो जाये, मैंने तो युद्ध की विभीषिका को देखा ही नहीं। उसके दुष्परिणामों को भोगा है, संकटों को भी झेला है, कभी भी ऐसी विपत्ति किसी देश पर न आये यही कामना करता हूँ।" सचमुच कुछ आवश्यकता से अधिक महत्वाकांक्षी व्यक्ति सत्ता लोलुप होकर जन साधारण को चक्की में पीस देते हैं। ये बहुत बड़ा अन्याय है। कितने ही परिवार बिखर जाते हैं, धन-जन की हानि होती है और सुख-शांति छिन जाती है।
विल्डे द्वितीय विश्व महायुद्ध में युद्धबंदी होकर रूस के साइबेरिया प्रदेश में लम्बे समय तक रहे थे। वहाँ के कष्टों का क्या कहना? मुँह धोने के लिये पानी की आवश्यकता होने पर बर्फ को हाथ में लेकर मलते थे, पिघल जाने पर उसे ही मुँह पर लगा लेते थे। खाने के लिये कई-कई दिन बाद सूखे, कड़े और मोटे टिक्कड़ मिलते थे, जो चबाते ही नहीं बनते थे। वस्त्रों के रूप में बोरे से लटकाये घूमते थे। अवधि की समाप्ति पर आँखों में पट्टी बांधकर उन्हें सीमा पर लाकर छोड़ दिया गया था। उस रूप में समाज में प्रवेश करने में उन्हें लज्जा अनुभव हो रही थी। पास में पैसा भी नहीं थे जो वस्त्र खरीद लेते। किसी व्यक्ति से कहकर किसी तरह अपनी पत्नी के पास जीवित लौटने की सूचना भेजी थी जो उनके पहनने के लिये कपड़े लेकर आईं और वे अपने घर पहुँचे। इस अवधि में उनकी पत्नी को उनके जीवित होने की भी जानकारी नहीं थी। यहाँ वहाँ भाग-भागकर पता करने के लिये अनथक प्रयत्न करती रहीं। कहीं-कहीं कार्य करके जीविका निर्वाह करती रहीं थीं। श्रीमती विल्डे कहती थीं कि वापस आने के बाद भी कुछ भी बात करते समय वे सदा भयभीत और आशंकित से रहते थे। इधर-उधर देखकर धीरे से कुछ भी बोलते थे। इतने वर्षों तक (रूस में) युद्ध बंदी रहते हुये उनके मन में बसी दहशत उनका स्वभाव सा बन गई थी। हर समय उन्हें लगता था कि उनके आसपास छिपा हुआ कोई व्यक्ति उनकी बात को सुन रहा है और कहीं कोई बात उनके लिये किसी नये संकट का कारण न बन जाये। बार-बार चौंक पड़ते थे और अक्सर पीछे घूम-घूमकर देखते थे कि कहीं कोई उनका पीछा तो नहीं कर रहा है? उन्हें सामान्य स्थिति में आने में बहुत समय लगा। इस बीच उनके पति चुपचाप बैठे सारी बातें सुनते रहे फिर बड़े गंभीर होकर बोले थे- "उन दिनों मैं सोचता था कि कभी जीवित अपने देश पहुँच गया तो यही सोचूँगा कि मुझे पहनने को एक जोड़ कपड़े और समय पर खाना मिल जाये बस मैं पूरी तरह संतुष्ट रहूँगा। अपने आपको बहुत बड़ा आदमी समझँूगा।" मैं अवाक् उन्हें देखती रह गई।
समय के साथ परिवर्तन स्वाभाविक है। शान्त स्वभाव के (हेअर-जर्मन में मिस्टर के लिये प्रयुक्त होता है)। हेअर विल्डे और उनकी पत्नी ने स्वयं को पुन: जिन्दगी से जोड़ लिया था। अपने दोनों बच्चों के साथ उन्हें और भी खुशियाँ मिल गईं थीं। सामान्य जर्मन परिवारों की भांति उन्होंने भी अपने पुरुषार्थ से प्रतिकूल परिस्थितियों और निराशा को जीवन से उखाड़ फेंका था और अपनी दुनिया को ऐसी रोशनी से जगमगा दिया था कि सारा अंधेरा कहीं दूर भाग कर खो गया था।
मेरे ट्यूबिंगेन से चलने के पूर्व एक दिन विल्डे परिवार ने मुझे रात्रि भोजन पर आमंत्रित किया था। भोजन के बाद मुझे गिलास में कुछ पेय देते हुये श्रीमती विल्डे बोलीं- पीकर देखो, तुम्हें जरूर अच्छा लगेगा। मेरे मना करने पर उनका प्रश्न था कि वह अंगूर से बना है फिर मैं क्यों नहीं पी सकूँगी? मैंने किसी दिन उनसे कहा था कि मैं फल से बना पदार्थ खा लेती हूँ। इसी धारणा से उन्होंने बड़े आग्रह से ग्रेप वाइन पीने को दी थी। मुझे अपना दृष्टिकोण उन्हें स्पष्ट करना पड़ा तो वे मुस्कुरा दीं। ट्यूबिंगेन की चित्रावली पुस्तक के रूप में भेंट की। वर्षों पत्र-व्यवहार चलता रहा, बच्चे भी लिखते थे। क्रिसमस पर उपहारों का आदान-प्रदान भी होता रहा था। मेरे बच्चों के जन्म पर बधाई संदेश और खिलौनों के उपहार भी आये। उसके बाद कुछ समय तक सम्पर्क टूट सा गया था। बहुत समय तक उनका कोई पत्र भी नहीं आया था। मुझे शालर से ये सूचना मिली थी कि विल्डे कुछ अस्वस्थ चल रहे हैं, अस्पताल में हैं। दो वर्षों पूर्व श्रीमती विल्डे का खत आया था लिफाफे में एक फोटो थी। विल्डे की समाधि के सामने उनकी पत्नी और बेटे-बेटी खड़े थे। कब्र (समाधि) के चारों और बहुत से फूल लगे थे। विल्डे का मुस्कुराता चेहरा आँखों के सामने घूम गया। अल्बम निकालकर देर तक उनके परिवार के साथ खींची गई तस्वीरें देखती रही। पिछली सारी घटनाएँ चलचित्र की समान दिखाई दीं। मन स्थिर होने पर पत्र पढ़ने की याद आई। विल्डे कैंसर से पीड़ित हो गये थे, बड़े कष्ट में रहे, अंत में स्वर्गवास हो गया। उनकी पत्नी ने अपने मन का दर्द उस पत्र में बहा दिया था। कई बार पत्र पढ़ा और अनायास ही आँखों से कई अश्रु बिन्दु पत्र पर ढुलक गये।

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