ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
परंपरा और आधुनिकता की समझ
01-Jun-2019 12:25 AM 317     

बीसवीं सदी में आधुनिकता की बात खूब हो चुकीं, जिसका यह पैमाना बनाया गया था कि दुनिया के जो विकसित देश हैं उनकी तुलना में दुनिया के अविकसित देश किस तरह उनकी बराबरी करेंगे। यानि परिवहन, तकनीक, बिजली के उत्पादन और सुखोपभोग में दुनिया के अविकसित देश कब योरोप की तुलना में विकसित होकर आधुनिक कहे जायेंगे। उस समय आधुनिकता की इससे अधिक परिभाषा नहीं थी, फिर उसमें साहित्य, कला आदि को भी जोड़ लिया गया कि वे भी इस आधुनिकता के पिछलग्गू बनकर राज्य और राजनीति के पक्ष में कुछ काम करते रहेंगे जिससे इस आधुनिक प्रगति को बढ़ावा दिया जा सके।
भारत की ओर देखते हैं तो वहां की प्राचीन चिंतनधाराओं ने आधुनिकता की कोई विशेष चर्चा नहीं की है। भारतीय मनीषा यह सदा से विश्वास करती आई है कि जो पारंपरिक है यानि जो सनातन है और न जाने कब से है वो नित्य नूतन होता रहता है और वह नूतन होते हुए अपनी परंपरा से विच्छिन्न भी नहीं होता। भारत के ऋषियों ने इसे आधुनिकता नहीं कहा बल्कि नया उन्मेष करने वाली प्रज्ञा कहा और प्रत्येक मनुष्य की प्रतिभा को नव-उन्मेषशालिनी कहा।
संसार का कोई भी दार्शनिक यह तो मानेगा ही कि जीवन एक अनंत श्रृंखला है। कब से है, कहाँ तक जायेगा ये सारे प्रश्न उठते ही रहेंगे। यानि जीवन की कोई एक परंपरा है अगर हम आधुनिक भाषा में कहें तो दुनिया एक - लाइफ इंडस्ट्री है - जो न जाने कब से चली आ रही है। इस उद्योग को कोई आधुनिक व्यापारी नहीं चला रहा है बल्कि इस उद्योग में अपना उद्योग मिला कर, इस जीवन का, उद्योग का गहन शोषण कर रहा है।
दुनिया में शोषण के अनेक स्तर हैं। पहला तो यही कि मनुष्य के मन को ठग लिया जाये। उसे आधुनिक दुनिया के कर्णधार अपने-अपने उद्योग के अनुरूप ठगकर अपनी-अपनी दिशाओं में हाँक रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। आधुनिक विश्व बाजार की सारी विनिमय प्रणाली मनुष्य के मन को ठगने पर आधारित हैं। यह बाजार अब सिर्फ वस्तु विनिमय तक ही सीमित नहीं रहा, यह तो साहित्य, कला, भाषा और अनुवाद की दुनिया में भी प्रवेश कर गया है। कला अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकाऊ है। साहित्य (जिसे साहित्य न ही कहें तो अच्छा है) बाजार की मांग पर व्यावसायिक किस्म के लेखक लिख रहे हैं और उस साहित्य से जीवन मूल्य पैदा ही नहीं हो रहे, बल्कि जीवन निर्मूल्य हुआ जा रहा है। आज कम्प्यूटर टेक्नालॉजी ने विश्व की सारी भाषाओं को आपस में एक अनुवाद करने वाली प्रणाली से भी जोड़ दिया है। आप कंप्यूटर के स्क्रीन पर अंग्रेजी की हिंदी बना सकते हैं। आप जर्मन से भी हिंदी बना सकते होंगे। लेकिन इसके वाबजूद आप वास्तविक अनुवाद नहीं कर पाते हैं। सुनने में तो यही आता है कि पूरी दुनिया पर अंग्रेजी का दवाब है। संसार की ज्यादातर भाषाओं की कृतियाँ अंग्रेजी में अनूदित होती हैं और उसीसे दूसरी भाषाओं में अनुवाद का कार्य व्यापार चलता है। कितनी अजीब बात है कि अंग्रेजी का ईडियम जर्मन स्पेनिश या फ्रेंच आदि भाषाओं से किसी न किसी रूप में तो अलग होगा ही लेकिन अगर आप सिर्फ अंग्रेजी अनुवादों के माध्यम से हिंदी या भारत की दूसरी भाषाओं में अनुवाद करेंगे तो उन भाषाओं में जर्मन, फ्रेंच या स्पेनिश का स्वाद कैसे आयेगा। वह तो अंग्रेजी का ही स्वाद होगा जिसे मूल भाषा से हिंदी में अनुवाद कहकर बेचा जा रहा है।
कितने गहरे दुख की बात है कि भारत में परंपरा का अर्थ सहेजना था जीवन को और उन सारी चीजों को जो जीवन के लिये जरूरी हैं पर योरोप में आधुनिकता का अर्थ सहेजना तो हुआ ही नहीं, बेचना हुआ। आधुनिकता पर यह प्रश्न उठाया ही जाना चाहिये कि उसने जीवन और उसके उपयोग की वस्तुओं को एक बाजारू मूल्य प्रदान किया और यही कारण है कि भारत जैसे देश में घर, परिवार, कुटुम्ब, मित्रता, पड़ौस धीरे-धीरे नष्ट होते गये और यह सुखद है कि वे योरोपीय आधुनिकता के दवाब के बावजूद अभी भी किसी न किसी रूप में भारत में बचे रह गये हैं और यहां के साहित्यकारों को अभी भी कहानी रचने की, कविता रचने की प्रेरणा से भरते हैं। भारत का आदमी अभी इतना अकेला नहीं हुआ है जितना योरोप का आधुनिक आदमी एक आउट साइडर बनकर अपने ही देश में निर्वासन की जिंदगी जी रहा है। हम काफ्का और कामू जैसे उपन्यासकारों के कथानक पढ़कर यह भलीभांति जानते हैं।
अंत में हम यही कह सकते हैं कि भारत की परंपरा एक अखंड कीर्तन को सुनती आई है जो अंतरिक्ष में बसा हुआ है और उस कीर्तन को सुनकर अपने मंदिरों और घर-द्वारों में उसका अनुकीर्तन करती आई है, जैसे वह अखंड तत्व से जुड़कर ही उसकी किसी स्वर लिपि को अपने जीवन में बाँधकर चल रही हो। अगर भारत की दृष्टि से अनुवाद अनुकीर्तन हो सके तो इसका अर्थ यह होगा कि हम अपनी भाषा में वह सुन सकें जो हमें अभीष्ट है। हमें वह न सुनाया जाये जो आप हम पर थोपना चाहते हैं।
और अंत में...
अभी-अभी दुनिया के बड़े लोकतंत्र भारत में आम चुनाव सम्पन्न हुए। भारत सदियों से एक ऐसा देश रहा है जिसमें बोलियों की संस्कृति ने उसके गांव-गांव तक इस देश को लोक संस्कार से परिपूर्ण बनाया है। अनेक भाषाएँ एक संस्कृति में बँधी होती हुई भी अपने समाज के बीच बहुविध अभिव्यक्ति की प्रणाली से सम्पन्न हैं। भारत के दर्शन और उसकी सामाजिक व्यवस्था कुछ ऐसी बनी है कि व्यक्ति ही अपनी मुक्ति और जय-पराजय के लिये जिम्मेदार है। बल्कि यहां तक कह सकते हैं कि इस देश का दर्शन व्यक्ति को उस गहराई तक ले गया जहाँ वह यह पाता है कि जय और पराजय दोनों ही व्यर्थ हैं, जीवन ही मूल्यवान है। यही कारण है कि भारत में पिछले सात आठ सौ वर्षों में अनेक जातियां यहाँ आती रहीं। उनमें से कुछ ने इस देश को आक्रांत भी किया, पर अंततः उनको इस देश की संस्कृति में घुल मिल जाना पड़ा। इस देश की खूबी भी यही है कि यह सबके साथ जीना जानता है। यह ज़रूर है कि इसके मन में यह भाव तो है ही कि जो लोग इस देश को सताते रहे और अब भी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में प्रताड़ित करते रहते हैं उऩ्हें लोकतांत्रिक शक्ति के अनुरूप कुछ सबक तो सिखाया ही जाना चाहिये। यह आम चुनाव एक ऐसा ही सबक है। भले ही भारत में ईमानदारी का जुम्मा सिर्फ व्यक्ति पर डाला गया हो पर सामाजिक रूप से यह तो प्रमाणित करना ही होगा कि देश के प्रति कोई लोकतांत्रिक जिम्मेदारी सामाजिक रूप से बनती है। शायद यही कारण है भारत के लोगों ने पहले से चले आ रहे जातिवाद के राजनैतिक प्रभावों को काफी हद तक कम करके एक नये तरह की सत्ता गढ़ने का प्रयास किया है। जनता का यह निर्णय इस बात को दर्शाता है कि उसे किसी से कोई भय नहीं है। वह अनेक संघर्षों से गुजरती आई है और अगर उसने अपने पुराने निर्णयों में कुछ संशोधन करके एक नया जनादेश दिया है तो यह आशा की जा सकती है कि वह अपने देश के लोकतंत्र में एक नया प्रयोग करती-सी जान पड़ती है। प्रयोग विफल भी हो जाते हैं, पर उसने प्रयोग किया है तो इसलिये कि बिना कुछ नया किये, कुछ भी कैसे नया हो सकता है।

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