ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
उज्जवला अब खुश थी!
CATEGORY : कहानी 01-May-2018 06:45 PM 211
उज्जवला अब खुश थी!

देखा आपने रात में कैसी रासलीला चल रही थी मोहल्ले में? पानी सर से ऊपर होता जा रहा है अब तो। वो तो अच्छा है दीदी कि हमारे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं। वर्ना इन कमीनों की हरकतें देख सुन क्या असर पड़ता उन पर राम ही जाने... चौहान काकी ने भदौरिया ताई को ताज़े बने आम के अचार से भरी कटोरी थमाते हुए कहा।
भदौरिया ताई की जुबान के नीचे दबी चिंगारी को मानो ऐसी ही किसी हवा का इन्तेज़ार था।
"का कहें ठकुराइन बहू मैं तो खुद ही हड़ी हूँ इन नीचों से। क्या माहौल बना के रखा है। अब तो किसी को घर का पता बताने में भी शर्म आती है। पूरे कस्बे में बदनाम हो गया हमारा गणेशपुरा इस कुलच्छिनी के कारण। नरक में जाए ये उज्जवला और इसकी मताई।"
उज्जवला यानि भुरा। भुरा यानि उज्जवला ये उसी लड़की का नाम था जिसके बारे में उन दिनों मोहल्ले में चर्चा आम थी। अब नाम तो उसका उज्जवला ही था पर हद से ज्यादा गोरी होने की वजह से उसे घर में भुरा (तत्सम शब्द भूरा का तद्भव) ही कहते।
कभी-कभी तो मैं भी सोचता कि कैसा अजीब नाम रखा गया है इसका, लड़की है तो भूरी क्यों नहीं कहते? कितनी अजीब बात है कि एक अशिक्षित परिवार में जन्मी उस लड़की के ये दोनों ही नाम एक दूसरे के पर्याय रखे गए थे। जबकि ये अनजाने में ही हुआ था। बहुत संभव है कि रखने वाले को भी तत्सम-तद्भव और पर्यायवाची शब्दों का ज्ञान ना रहा हो।
भुरा उम्र में मुझसे एकाध साल बड़ी ही रही होगी। सुतवां नाक, विदेशियों की तरह हलके सुनहले बाल, तीखे नैन-नक्श। आँखों से तो चंचल लगती पर रहती हमेशा बिलकुल खामोश। वो तो अच्छा हुआ कि एक बार एक मरखू गाय ने उसे सींग मारने की कोशिश की तो वो चीख कर भागी। वर्ना मैं तो उससे पहले तक उसे गूंगी ही समझता था। पता नहीं उसके परिवार से कितने गुना रहे होंगे पर हम लोग थे तो संपन्न ही। कई बार मैंने उसकी नज़रों को मेरे कपड़े या खाने की चीज़ों के इर्द-गिर्द भटकते पाया। कभी वो दीदें फाड़-फाड़ कर देखती तो कभी चोरी छुपे।
उसके शरीर से उठने वाली एक अजीब सी गंध का घेरा, जिसे बदबू या दुर्गन्ध कहें तो इतना गलत भी नहीं होगा औरों को उसके साथ खेलने या आसपास फटकने से रोकता सा लगता। सड़क से गिट्टी उठा कर उछालती और हवा में ही लपक लेती, जाने कैसे अकेले ही खेलती रहती थी वो।
उसकी माँ, जिसे लोग "कानपुरवाली" कह कर बुलाते थे, कुछ पास कुछ दूर के घरों में छोटे-मोटे काम करने जाया करती थी। कानपुरवाली इसलिए कहते हैं, क्योंकि छोटे कस्बों में किसी महिला की पहिचान के लिए उसके नाम का इस्तेमाल कम ही होता है, बल्कि लोग उसका पीहर जिस गाँव, कस्बे या शहर में होता उसके नाम के बाद वाली लगाकर उस महिला को संबोधित करना ज्यादा पसंद करते। स्थिति तब बड़ी हास्यास्पद हो जाती जब किसी शादी-ब्याह के मौके पर एक जगह से सम्बन्ध रखने वाली दो-तीन महिलायें होतीं, किसी एक वाली को आवाज़ लगाई जाती और दो-तीन वालियां दौड़ी चली आतीं।
तो सुनते हैं कि कानपुरवाली तेल-मालिश भी कर दिया करती थी। ये बात तब की है जब भुरा चौदह साल की रही होगी। उसकी माँ एक दिन एक दबंग के घर उसकी तेल-मालिश के लिए गई होगी और उसके गठीले बदन की मालिश करते-करते कब खुद को उससे जोड़ बैठी नहीं पता।
पता नहीं किस कारण से लेकिन उस 38 साल के शख्स ने इस उमर तक भी शादी नहीं की थी। चोरी-चकारी और लोगों को मारते-पीटते रहने की वजह से कसबे में कई लोग उससे डरते थे या कहें कि वो स्वयं घोषित गुंडा था। और गुंडा ही होता तब भी ठीक था किसी तरह पुलिस का डर तो होता उसे। लेकिन वो तो एक प्रभावी राजनैतिक पार्टी का सदस्य भी था। अरे साधारण भाषा में कहें तो वही "नेता" यानी करेला और वो भी नीम चढ़ा। मोहर सिंह नाम था उसका।
जैसा कि कहते हैं कि इज्जत का डर सबसे ज्यादा मध्यम वर्गीय परिवारों को होता है, न तो अभिजात्य वर्ग को इज्जत़ से इतना प्यार होता है और ना ही गरीबों को। तो वही हुआ। एक-दो बार जब मोहर सिंह कानपुरवाली के घर आया-गया तो फिर ये आदत सी बन गयी। अब कानपुरवाली का पति याने भुरा का पिता एक बहुत ही भोला सा या कहें कि जिसे लोग बेवकूफ कहते हैं उस तरह का आदमी था। बीवी से डर कर तो हमेशा ही रहता कई बार तो उसके बच्चे भी उसे घुडकी दे देते और वो बेचारा कुछ न कह पाता। कहने को वह पांच-पांच बच्चों का बाप था। तीन लड़के और दो लड़कियां, लेकिन उसका कहा एक पर भी ना चलता। ौर फिर जिसका कहा उसकी बीवी ना सुने उसका बच्चे क्यों कर मानने लगे भला?
धीरे-धीरे ये हाल हुआ कि मोहर सिंह अपने घर कम जाता और कानपुरवाली के यहीं ज्यादा रहता। दिन हो या रात वो बस वहीं दिखाई देने लगा। यहाँ तक कि मोहर सिंह से मिलने-जुलने वाले भी अब वहीं आने लगे और उसके नाम की चिट्ठी-पत्री भी। कई लोग तो उसे ही मोहर सिंह का घर समझते। भुरा का बाप ये सब देख कर भी चुप रहता। पता नहीं तिलमिलाता भी होगा या नहीं। वैसे जो आदमी सीधे-सादे लोगों से भी डरने वाला हो वो किसी गुण्डे के सामने क्या बोलेगा। और वो घर उसका था कब, पहले लोग "कानपुरवाली का घर" कहते थे तो अब मोहरसिंह का कहने लगे। भुरा के तीनों भाई दिन-रात मोहरसिंह की सेवा-सत्कार में लगे रहते। अपने बाप के आगे शेर बने रहते और उस मोहर सिंह के आगे पालतू कुत्ते की तरह दुम हिलाते।
वैसे मोहल्ले में उस आदमी का आना-जाना रास तो किसी को ना आता था लेकिन कोई करता भी क्या। अपने हाथों कौन मुसीबत मोल लेता, बदमाशों का क्या भरोसा कब किसके सामने क्या कह दें, क्या कर दें? धीरे-धीरे कानपुरवाली सबकी नज़र से गिरती चली गई, अब सब उसे कानपुरवाली के अलावा मोहरसिंह की रखैल के नाम से जानते। हर कोई उसे काम के लिए बुलाने से हिचकता। पर उस पर क्या फर्क पड़ने वाला था। उसे तो हर महीने मोहरसिंह से एक मुश्त मोटी कमाई मिल जाया करती। उसकी जात-बिरादरी वाले भी मोहरसिंह की वजह से कुछ ना कहते।
दो सालों तक ऐसा ही चलता रहा, पर एक पुरानी कहावत है कि "कुत्ते का काटना और चाटना दोनों ही कष्टदायी होता है।" वैसा ही कुछ कानपुरवाली के साथ होने लगा। मोहरसिंह अब कानपुरवाली के उमर के साथ ढलते जिस्म से ऊब चुका था। अब वो कोई उसकी बीवी तो थी नहीं जो मजबूरी में उसे सारी ज़िंदगी उसके साथ निभानी होती। जब कानपुरवाली को ये अहसास हुआ तो वो परेशान रहने लगी कि कहीं ये मुर्गा हाथ से निकल गया तो घर का गुज़ारा कैसे चलेगा। अब तो उसे कोई काम भी देने से रहा। उधर मोहर सिंह की नीयत सोलहवें साल में प्रवेश करती भुरा पर ख़राब होने लगी थी। जब इस बात का अंदाज़ा कानपुरवाली हुआ तो उसे कुछ बुरा तो लगा लेकिन फिर उसे भी लगने लगा कि मोहर सिंह को फंसाए रखने का यही एक तरीका है। जवानी की देहलीज़ पर कदम रख रही भुरा को पहले ही अपनी माँ का मोहरसिंह से नाजायज़ रिश्ता पसंद ना था, जब उसे ये पता चला कि अब उसे भी उसी नरक में धकेला जाने वाला है तो वो बौखला उठी। पर कर क्या सकती थी। जिस उम्र में वो थी उसमें घर छोड़ना और भी बड़ी बेवकूफी होती। हर तरफ तो भूखे भेड़िये बैठे रहते हैं जवान गोश्त को चबा जाने को।
आये दिन उसकी माँ कभी मोहर सिंह के पैसों का लालच दिखाती तो कभी उसकी ताकत का डर, जब कई दिनों तक भुरा पर इन सब बातों का कोई असर ना हुआ तो एक रात वो घट गया जो अपनी बेटी के साथ करने से पहले कोई आम माँ मर जाना ज्यादा पसंद करेगी। "पूत कपूत सुने हैं जग में, माता नहीं कुमाता।" जैसी पंक्तियाँ थोथी कविता बन कर रह गयीं। उस रात भुरा के खिलाफ जो षड़यंत्र रचा गया उसके आगे "जूलियस सीजर" की हत्या का षड़यंत्र भी कुछ नहीं जान पड़ता। किसी दुश्मन से भी इससे बेहतर सलूक की उम्मीद की जा सकती थी।
जनवरी के एक इतवार की रात करीब डेढ़ बजे की बात थी, मोहर सिंह कानपुरवाली की सहमति से गहरी नींद में सो रही भुरा के बिस्तर में जाके घुस गया और उसे काबू में करने की कोशिश करने लगा। ख्वाबों में डूबी भुरा पर जब अचानक ऐसा अप्रत्याशित हमला हुआ तो वो हडबडा कर उठ बैठी और चीख कर कमरे से बाहर भागी। इतनी जोर से चीखी कि मोहल्ले के आस-पास के कई घरों तक उसकी आवाजें पहुँचीं। कस्बों में खुली छतें और आँगन ज्यादा होने की वजह से आसानी से एक-दूसरे के घरों में झाँका जा सकता है। कई लोगों ने अपनी खिड़की से भुरा को अपने घर की छत की तरफ भागते देखा। लेकिन पीछे से सीढ़ियों पर ही उसकी माँ ने उसका पैर पकड़ उसे नीचे खींच दिया। पीछे से उसके दोनों कलयुगी भाई और मोहर सिंह आ गए। भुरा असहाय बलि के लिए ले जाए जा रहे बकरे की तरह फड़फड़ाये जा रही थी, वो बिलख-बिलख कर रोये जा रही थी।
"हाय अम्मा छोड़ दो, मर जेहें अम्मा मर जेहें। हाय भैया बचा लो, हाय बाबा, कोऊ बचा लो हमें। हाय देखो जे का कर रये। तुमाई बिटिया हैं हम। अम्मा ऐसो ना करो हमाये संगे, का बिगाड़ो हमने तुमाओ।"
उसकी चीखें रात में निकले शैतानों के दिलों को भी पिघलाने का माद्दा रखती थीं। पर उसके डरपोक बाप को मानो लकवा मार गया था। उसकी छोटी बहिन एक कोने में सिमटी खड़ी रोये जा रही थी और एक भाई चुपचाप तमाशा देख रहा था। सारा मोहल्ला आज नपुंसकों की बस्ती से गया गुज़रा नज़र आ रहा था। फिर किस अवतार की उम्मीद करते, उस अभागन के लिए कौन कृष्ण बन कर आता जिसके भाई और माँ ही उसकी इज्जत़ के दुश्मन बन बैठे हों। उसे घसीट कर मोहर सिंह के साथ कमरे में बंद कर दिया गया और बाहर से सांकल चढ़ा दी गई। वो दीवालों से अपना माथा मारती रही पर पैसों के लालच में पिशाचिनी बन चुकी उसकी माँ और लालची भाइयों पर कोई असर ना पड़ा। दुनिया में शायद पहली बार किसी माँ और भाइयों की सहमति से उनके ही घर के अन्दर उनके बेटी-बहिन का बलात्कार हो रहा था। पूरे मोहल्ले के दसियों लोगों की गवाही में एक मजबूर लड़की की इज्जत़ को रौंदा जा रहा था और सब उनका घरेलू मामला कह कर एक-एक कर अपने घरों की दरवाज़े-खिड़कियाँ बंद करते जा रहे थे।
उस काली रात को रात भर उसके जिस्म की बोटियाँ नोची जाती रहीं और अगले दिन सुबह दिन-भर से इसी सब का ठीकरा लोग उलटे भुरा के सर ही फोड़ रहे थे। जिनमें चौहान काकी और भदौरिया ताई भी शामिल थीं। एक मासूम पर हुए अत्याचार पर अचार लेने-देने के बहाने जब औरतें ही चटखारे ले रही हों, तो फिर मर्दों को तो पूछिए ही मत।
कई दिनों तक भुरा अपने ही घर के एक कमरे में कैद रही। बारहवीं पास वो लड़की आगे ना पढ़ पायी। किसी ने बताया कि हर रिश्ते से उसका भरोसा उठ गया, जिंदा थी तो पता नहीं किसलिए, पता नहीं किसके लिए। इधर दु:ख ने जबरन उसके घर आवाजाही बनाये रखी और उधर सुख उससे घड़ी-घड़ी फरेब करता रहा। उसे महसूस होता कि जिस दुनिया में वो है उसमें कोई अपराध करना उतना बड़ा अपराध नहीं, जितना बड़ा अपराध कि एक लड़की होना है।
उसके साथ जो भी हुआ वो वैसे ही था जैसे कि एक कोमल कली को सही वक्त पर खिलने से पहले एक जोड़ा कठोर हाथों की आठ बेदर्द अंगुलियाँ और दो अंगूठे मिल के जबरन ही उसे खिला दें, जिससे ना केवल उसकी कोमलता बल्कि खूबसूरती बड़ी बदसूरती से कुचल दी जाए। पर फूल का तो सिर्फ तन होता है, उसके मन का क्या पता, किसे पता? लेकिन यहाँ तो तन और मन दोनों को कुचला गया, दोनों को रौंद डाला गया था।
वह कई बार सोचती कि अमावस कहीं इसलिए तो नहीं आती कि चाँद इतना खूबसूरत है और उसकी खूबसूरती से जलकर दुनिया भर की बुराइयों ने, ज़माने भर के काले सायों ने उसके मान-मर्दन की घ्रणित योजना बनाई हो और हर दिन चुपके से थोड़ा-थोड़ा उसके मुँह पर कालिख मलते हों और एक दिन मौका पाते ही उसके सारे मुख पर ही ये कालिख पोत देते हों।
खामोश रहने वाली भुरा अब लगता है कि सच में गूंगी हो गई। अब अगर कोई गाय उसे सींग दिखाए तो क्या अगर मार-मार के उसकी जान भी ले-ले तो भी शायद उसके मुँह से आवाज़ ना निकले। कानपुरवाली के साथ-साथ अब भुरा भी मोहर सिंह की रखैल बन चुकी थी। उस पर हुए अनाचार और अत्याचार के लिए सारी दुनिया ने उसे सजा सुना दी थी। उसे वैश्या का दर्ज़ा दे दिया गया था। अब तो शायद भुरा ने भी इसी सब को अपनी नियति मान स्वीकार कर लिया था। मोहर सिंह किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़ गया और कुछ ही महीनों में उसने अपनी अच्छी-ख़ासी राजनैतिक पहुँच बना ली, अच्छा ख़ासा दब-दबा हो गया था उसका। कानपुरवाली अब खुशहाल थी उसके तीनों निकम्मे बेटों को धंधे-पानी से लगवा दिया गया था। एक दिन पता चला कि मोहर सिंह रजिस्टर्ड नेता बनने के लिए कोई निकाय चुनाव लड़ रहा था तभी ख़बर उड़ी कि भुरा पेट से है। जाने कैसे मोहर सिंह बड़ी आसानी से उससे शादी करने को राजी हो गया। सभी बड़े खुश थे अब अठारह साल की भुरा को हमेशा-हमेशा के लिए उसके बयालीस साला बलात्कारी के हाथों के सुपुर्द कर दिया गया था। उसकी आत्मा के ख़ूनी के नाम का सिन्दूर अब उसकी मांग में था। पर किसी ने बताया है कि उज्जवला अब खुश थी। पर क्या सच में?

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