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नौ दशक का सुरीला सफर
01-Feb-2019 02:31 PM 2170     

आज से 92 साल पहले भारत में मुंबई से रेडियो प्रसारण की पहली स्वर लहरी गूंजी थी। प्रसारण की इस मोहक और ऐतिहासिक यात्र में रेडियो ने सफलता के कई आयाम तय किए हैं। भारत में रेडियो प्रसारण का नाम "आकाशवाणी" विश्व भर में विशिष्ट है। इसकी "परिचय धुन" भी अनूठी है जिसके साथ कई आकाशवाणी केंद्रों पर सभा का आरंभ होता है। हालांकि अब आकाशवाणी के बहुत सारे केंद्र अपना प्रसारण 24 घंटे करते हैं इसलिए वहां आकाशवाणी की संकेत ध्वनि सुनने को नहीं मिल पाती। "विविध भारती" का प्रसारण भी 24 घंटे है इसलिए वहां भी यह संकेत धुन अब नहीं बजती। इस नायाब धुन को 1936 में "इंडियन ब्रॉडकाÏस्टग कंपनी" के संगीत विभाग के अधिकारी वॉल्टर कॉफमैन ने कंपोज किया था।
आकाशवाणी के अनूठे नाम की भी दिलचस्प कहानी है। 1924 के आसपास कुछ रेडियो क्लबों ने प्रसारण आरंभ किया था, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के चलते वे ज्यादा समय तक चल नहीं सके। इसके बाद 23 जुलाई 1927 को मुंबई में "इंडियन ब्रॉडकाÏस्टग कंपनी" ने अपनी रेडियो प्रसारण सेवा शुरू की। 26 अगस्त 1927 को कोलकाता में भी नियमित प्रसारण शुरू हो गया। रेडियो प्रसारण का उद्घाटन करते हुए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने कहा था कि भारतवासियों के लिए यह प्रसारण एक वरदान साबित होगा, लेकिन 1930 तक आते-आते इंडियन ब्रॉडकाÏस्टग कंपनी दिवालिया हो गई। फिर एक अप्रैल 1930 को ब्रिटिश सरकार ने "इंडियन स्टेट ब्रॉडकाÏस्टग सर्विस" का गठन किया।
मजे की बात यह है कि तब रेडियो श्रम मंत्रालय के तहत रखा गया। इसी दौर में कई रियासतों में रेडियो स्टेशन खोले गए जिनमें मैसूर रियासत के 30 वॉट के ट्रांसमीटर से डॉ. एमवी गोपालस्वामी ने रेडियो प्रसारण शुरू किया और उसे नाम दिया- आकाशवाणी। 1936 से सरकारी रेडियो प्रसारण को आकाशवाणी के नाम से ही जाना जाने लगा। रेडियो के तीन लक्ष्य थे- सूचना, शिक्षा और मनोरंजन और सामने थी भारत की भौगोलिक भिन्नता और कठिनाइयों की चुनौती। 1930 से 1936 के बीच मुंबई और कोलकाता जैसे केंद्रों से हर रोज दो समाचार बुलेटिन प्रसारित किए जाते थे। उन दिनों खबरें किसी एजेंसी से नहीं ली जाती थीं, बल्कि समाचार वाचक उस दिन के समाचार पत्रों के मुख्य समाचार पढ़ दिया करते थे। 1935 में केंद्रीय समाचार संगठन की स्थापना के बाद समाचार बुलेटिनों का सुनियोजित ढंग से विकास हुआ।
1951 में रेडियो के विकास को पंचवर्षीय योजना में शामिल कर लिया गया। इसके बाद से आकाशवाणी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने समाज के हर तबके को अपने परिवार में शामिल किया। आकाशवाणी की लोकप्रियता का एक नया इतिहास तब रचा गया जब 3 अक्टूबर 1957 को "विविध भारती सेवा" आरंभ हुई। देखते ही देखते विविध भारती के फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रम घर-घर में गूंजने लगे। फिल्मी कलाकारों से मुलाकात, फौजी भाइयों के लिए "जयमाला", "हवा महल" के नाटक और अन्य अनेक कार्यक्रम जन-जीवन का हिस्सा बन गए। 1967 में विविध भारती से प्रायोजित कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। फिर तो रेडियो की लोकप्रियता शिखर पर पहुंच गई। अमीन सायानी की बिनाका गीतमाला आज भी हमारी यादों का हिस्सा है।
23 जुलाई 1969 को मनुष्य ने चंद्रमा पर कदम रखा और उसी दिन आकाशवाणी दिल्ली से आरंभ हुआ "युववाणी"। आकाशवाणी के अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान में शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत की अनमोल विरासत को संजोना और लोकप्रिय बनाना भी शामिल है। अनेक महत्वपूर्ण संगीतकार, शास्त्रीय संगीत के विद्वान, साहित्यकार और पत्रकार आकाशवाणी से जुड़े रहे हैं। आज भी आकाशवाणी के संग्रहालय में उनकी अनमोल रिकार्डिंग मौजूद है। महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, निराला, बच्चन जी, रमानाथ अवस्थी आदि की अनमोल रचनाएं आकाशवाणी की लाइब्रेरी में मौजूद हैं। अब वे सीडी की शक्ल में भी उपलब्ध हैं। इसमें वह रामचरित मानस गान भी शामिल है जो आपकी सुबहों का हिस्सा होता था।
आकाशवाणी की "ध्वनि तरंगें" सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी गूंजती हैं। आजादी के बाद पंडित नेहरू ने अपना जो प्रसिद्ध भाषण "नियति से साक्षात्कार" संसद में दिया था उसे जनता ने आकाशवाणी के माध्यम से ही सुना था। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रेडियो के जरिये अपनी "मन की बात" लोगों तक पहुंचाते हैं। आज रेडियो देश की लगभग 98 प्रतिशत आबादी की पहुंच में है। 21वीं सदी के तकनीकी युग में आकाशवाणी ने जब अपनी शक्ल बदली तो लोकल फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन यानी एफएम केन्द्रों का विस्तार हुआ। इससे कार्यक्रमों की तकनीकी गुणवत्ता भी बढ़ी। आज अनेक प्राइवेट एफएम चैनल श्रोताओं का मनोरंजन करते हुए रेडियो की परंपरा को समृद्ध कर रहे हैं।
आज भारत का प्रसारण तंत्र 420 रेडियो स्टेशनों वाला विश्व के अग्रिम पंक्ति के रेडियो प्रसारण संगठनों में से एक है। क्या रेडियो मात्र ध्वनि तरंग नहीं है। इसका चरित्र प्रदर्शित होता है "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" से, जिसका अनुसरण शब्द, संगीत, सन्नाटा, ध्वनि प्रभावों के उचित मिश्रण से किया जाता है। पिछले नौ दशकों के दौरान भारतीय रेडियो प्रसारण तंत्र ने अपने को एक इंटरैक्टिव, सूचनात्मक और मनोरंजक मीडिया के रूप में खुद को आमजनों के बीच स्थापित किया है।
ऑल इंडिया रेडियो देशभर में कुल 23 भाषाओं और 146 बोलियों में अपनी बात कहता है। अपनी विदेश प्रसारण सेवा में यह 11 भारतीय भाषाओं और 16 विदेशी भाषाओं में 100 देशों तक अपनी पहुंच रखता है। आज विचारणीय बिंदु यह है कि इस निधि का सदुपयोग किस प्रकार किया जाए ताकि राष्ट्र विकास के पथ पर तेजी से अग्रसर हो सके। रेडियो के स्वरूप में परिवर्तन और संशोधन सदा भारत ही नही दुनिया भर में होते रहे हैं। कहां वह बड़े वॉल्व वाला ड्राइंगरूम में रखा रहने वाला मर्फी (बड़ा साइज का रेडियो) का स्थिर रेडियो, जो बाद में सॉलिड स्टेट हो गया और फिर चलता-फिरता दो बैट्री से चलने वाला एक ट्रांजिस्टर रेडियो बनकर हम सबके सामने आया। ट्रंक के भार से किताब के वजन तक पहुंचने में रेडियो का अपना एक लंबा समय और अनुभव लगा है। कंधे पर लटकने वाले ट्रांजिस्टर को कान में लगा कर इअर फोन से सुनते युवा इस संस्कृति के वाहक हैं। आज मोबाइल फोन के माध्यम से रेडियो अब हरेक व्यक्ति की जेब में पहुंच गया है और इंटरनेट और एप्स के जरिए रेडियो ने विश्व भर में अपनी पहुंच बना ली है, जो पहले केवल सीमित क्षेत्र तक होता था।
विश्व के सभी विकासशील राष्ट्रों की तीन-चौथाई ग्रामीण जनता अपने-अपने क्षेत्रों में निवास करती है, जहां निरक्षरता, अज्ञानता, निर्धनता, बेरोजगारी, तरह-तरह की बीमारियों से ग्रसित रोगियों की संख्या अधिक है। ऐसे में रेडियो और परिवर्तन के मध्य उस संबंध नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ग्रामीण जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि और पशुपालन संबंधी सूचना को जनमानस तक खासकर दूर-दराज के इलाकों में बैठे लोगों को उन्हीं की बोली या भाषा में पहुंचाने की शक्ति केवल रेडियो में है, जिसके माध्यम से समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थकि और राजनीतिक विकास संभव हो सकता है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में शिक्षा और सूचना के माध्यम के रूप में रेडियो की उपयोगिता और महत्ता को नहीं आंका जा सकता। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आल इंडिया रेडियो यानि आकाशवाणी में अपने प्रसारण के माध्यम से देश की जनता में राष्ट्र, संस्कृति, अपनी गौरवशाली परंपरा और विकासात्मक गतिविधियों के प्रति चेतना उपजाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिकाने की अपार क्षमता है।
ग्रामीण क्षेत्रो में रेडियो समुदायों (कम्यूनिटी रेडियो) को उनके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण को प्रभावित करने वाले एक संवाद और निर्णय में लोगों को हिस्सेदारी की शक्ति प्रदान करता है। यह एक व्यापक, सुलभ, किफायती और लोकप्रिय संचार का माध्यम है जो सामाजिक जागरूकता बढ़ाने, स्थानीय समुदायों में एकजुटता के लिए प्रेरित करता है। रेडियो की अपनी अनूठी विशेषता है। इसकी पहुंच ड्राइंग रूम या बेडरूम तक सीमित नहीं है, बल्कि रसोईघर, कार, स्टडी टेबल, खेत, बस, ट्रक, ढाबे, स्कूल, पंचायत और युवाओं की जेब तक सूचना, शिक्षा, मनोरंजन, प्रेरणा और मार्गदर्शन पहुंचाने का सबसे सस्ता, सरल और तीव्र माध्यम है।

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