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तुम निरखो, हम नाट्य करें...
01-Dec-2016 12:00 AM 3029     

भारत की नाट्य परम्परा पूरे संसार में अपने विशिष्ट रंग प्रयोजनों के लिये विख्यात है। भारत के रंगमंच की जड़ें आदिम और पौराणिक समय से ही बहुत गहरी होती आयी हैं। पिछले दो ढाई हजार सालों में इनमें अनेक परिवर्तन भी हुए हैं। वाल्मीकि रामायण से लेकर महाभारत, हरिवंश पुराण और भागवत आदि में रंगकर्म की कुछ न कुछ चर्चा मिलती ही है। संस्कृत नाटकों की एक बड़ी परम्परा संसार के सामने उपलब्ध है।
भारत में रंगकर्म की केन्द्रीयता का आभास इसी बात से मिलता है कि यहां नाट्य शास्त्र लिखा गया और भरत मुनि का यह नाट्य शास्त्र पांचवां वेद कहलाया। इसके बारे में कहा गया कि इसमें सम्पूर्ण त्रैलोक्य के भावों का अनुकरण है। यह नाट्य शास्त्र दुर्जनों को संयमित करने और विनीत जनों के सद्गुणों को उभारने का काम भी करता है। यह कायरों में साहस उत्पन्न करने वाला, वीरों को उत्साह से भरने वाला, अज्ञानियों को बोध कराने वाला और ज्ञानवानों को गरिमा प्रदान करने वाला है। यह ऐश्वर्य वानों के लिये विलास है, दुखियों को दुख सहने की शक्ति है और उद्दिग्न चित्त वालों को धीरज प्रदान करने वाला है। यह नाट्य ऐसा है जो हर तरह के मनुष्यों को धीरज, क्रीड़ा और सुख देता है। सम्भवतः संसार के किसी देश में नाटक और रंगमंच की इतनी व्यापक कल्पना नहीं की गई है।
हिंदी में नाटक की विशिष्ट पहचान भारतेंदु हरिश्चंद्र से शुरू होती है। यह एक ऐसी पहचान है जिसमें पश्चिमी आधुनिकता और पारम्परिक भारतीय रंग दृष्टि का समन्वय है। भारतेंदु एक ऐसे महान व्यक्तित्व के रूप में जाने गये हैं कि वे केवल नाटक मडंली के संचालक भर नहीं थे, वे खुद नाटककार और अभिनेता थे। उनकी कोशिशें बहुत ज्यादा सफल नहीं हुईं, क्योंकि उन्हें जीवन कम मिला। उनके चले जाने के बाद हिंदी के रंगकर्म पर पारसी थियेटर की कंपनियों ने अपना कब्जा जमा लिया और एक सस्ता मनोरंजन चल पड़ा। दूसरे विश्व युद्ध के आसपास बंबई की पृथ्वी थियेटर कंपनी ने पारसी शैली में देशभक्ति और सामाजिक विषयों पर हिंदी नाटक शुरू किये। प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की यह मंडली 1960 के आसपास बंद हो गई। आधी बीसवीं शताब्दी गुजर जाने के बाद जब भारत स्वाधीन हुआ तब उसके रंगकर्म में नया परिवर्तन भी आने लगा। हिंदी के रंगकर्म में शेक्सपियर, सोफोक्लीज, यूरीपिटीज, इप्सन, चेखब, टॉाल्सटाय, गोर्की, कामू, बेख्त आदि दूसरे देशों के नाटककार शामिल होने लगे। इनके नाटकों के अच्छे अनुवाद किये गये और नाटक में श्रेष्ठ सृजनात्मक तत्वों को पूरब-पश्चिम का भेद किये बिना अपनाया गया।
यह वह दौर था जब देश में शंभुमित्र, हबीब तनवीर, इब्राहिम अल्काजी, श्यामानंद जालान, उत्पल दत्त, सत्यदेव दुबे और व.बा. कारंत जैसे निर्देशक भारतीय रंग पटल पर सामने आये। इसके समानांतर मराठी का रंगकर्म तो चल ही रहा था। हिंदी में धर्मवीर भारती के "अंधायुग" और मोहन राकेश के "आधे-अधूरे" और "आषाढ़ का एक दिन" को भारतीय नाट्य साहित्य को लंबे समय के बाद फिर से नयी गरिमा प्रदान की। हबीब तनवीर जैसे निर्देशक ने अपने रंगकर्म में देशी मुहावरे को खोजा और छत्तीसगढ़ी नाचा आदि का सहारा लिया। व.बा. कारंत जैसे रंगकर्मी जो दक्षिण से आकर हिंदी में नये रंगकर्म और नये हिंदी संगीत की रचना कर रहे थे उन्होंने बर्तोल्त बेख़्त जैसे नाटककार के नाटक को मध्यप्रदेश की बुंदेली बोली में फिट्ज बेनेबिट्ज के सहयोग से रचा। छत्तीसगढ़ी बोली में संस्कृत का नाटक मृच्छकटिक हबीब तनवीर जैसे नाटककारों ने अमर कर दिया। इस तरह हिंदी का रंगमंच उसकी बोलियों का रंगमंच भी बनता रहा।
यह संयोग ही है कि आधुनिक हिंदी में बहुत कम लोगों ने नाटक लिखे हैं। लेकिन हिंदी के नये रंगकर्मी हिंदी के श्रेष्ठ लेखकों की अनेक महत्वपूर्ण कहानियों के हिंदी नाट्य रूपांतर के माध्यम से नये नये नाटकों का सृजन करते रहे हैं। वे जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय के लिखे नाटक तो खेलते ही हैं, वे निर्मल वर्मा, अमरकांत, शेखर जोशी, काशीनाथ सिंह और कृष्ण बल्देव वेद आदि कथाकारों का नाट्य रूपांतर भी करते रहते हैं। आज भी यह आशाजनक है कि हिंदी का रंगमंच उसकी खड़ी बोली के साथ-साथ अपनी लोक बोलियों को साथ लेकर चल रहा है।
नाटक की भाषा में ही कहें तो दुनिया एक रंगमंच है और उसमें रहने वाले वासी, प्रवासी और अप्रवासी सभी इस रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं। इस खुले भूमंडलीकरण की दुनिया में इन सब वासियों का यहां-वहां आना-जाना एक नाटक की तरह ही लगता है। सब अपनी अपनी रंग भूमि में अपना-अपना रूप धरे अपनी नाट्य लीला रचते ही रहते हैं। अगर कोई कहना चाहे कि जीवन सबसे पहले क्या है तो अनुभव में यही आता है कि नाटक है। हमारे प्रवासी-अप्रवासी भारतीय दूर देशों में रहते हुए कविता, कहानी और संगीत से अक्सर जुड़े रहते हैं पर भारतीय नाटकों से शायद उनका उतना गहरा संबंध नहीं बन पाता है। कभी कोई मंडली भारत से उनके देशों में जाती होगी। हो सकता है उन्होंने हबीब तनवीर का "चरणदास चोर" देख लिया हो या धर्मवीर भारती का "अंधा युग" देख लिया हो, पर वे भारत की विपुल नाट्य परम्परा से अक्सर ही वंचित रहते आये हों। इस संदर्भ में उनसे उम्मीद की जा सकती है कि वे ऐसे नाटकों की स्क्रिप्ट जो छपे हुए प्रारूप में उपलब्ध है, उसे पढ़ें और रंगमंच पर अपने देश का नाटक खेल सकें। इस तरह वे अपने देश की लोकधर्मी परम्परा से कुछ अधिक निकटता भी महसूस कर सकेंगे। क्योंकि नाटक में ही यह शक्ति है कि वह निकट लाने में एक बहुत बड़े समाज को कामयाब कर देता है।

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