ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
तुम ही ज़रा पहल कर देखो
01-Jan-2019 01:36 PM 784     

जीवन में बहुत बार ऐसा होता है कि बात बहुत छोटी होती है लेकिन वह व्यक्ति की अकड़ और अहंकार से बहुत बड़ी हो जाती है। बहुत बार हमारे मन में यह बात आती है कि आगे बढ़कर शुरुआत करें लेकिन हम दूसरे पक्ष द्वारा पहल किए जाने का इंतज़ार करते रह जाते हैं और समय निकल जाता है। राजस्थानी की एक कहावत है- "ज्यूँ-ज्यूँ भीजे कामळी त्यूँ-त्यूँ भारी होय।" इसीलिए पाप मूल अभिमान कहा गया है। जब स्नेह, सद्इच्छा और सहजता हो तो रास्ता निकल ही आता है।
अब इस रोशनी में देश में राजभाषा नहीं बल्कि एक संपर्क भाषा की बात करें तो यह अपने हिसाब से पहले भी होता रहा है और अब भी हो रहा है। यह मानने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद यह काम नेकनीयती के अभाव में दुष्प्रभावित ही हुआ है।
स्वाधीनता से पहले धर्म-जाति, भाषा और प्रान्त से परे एकता की एक ललक थी जिसने सभी दीवारों को गिराना शुरू कर दिया था। हिंदीतर प्रान्तों में हिंदी प्रचार सभाओं की स्थापना हुई। विषम परिस्थितियों में जाकर हिंदी सेवियों ने काम किया। लोगों को भाषा ही नहीं दिलों से जोड़ने का काम किया। सहज रूप से हिंदी एक संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही थी। यदि गाँधी जी और उनके समान विचार वाले विद्वानों की बात मानकर देश की सभी भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि स्वीकार कर ली जाती तो सभी भाषाओं को जोड़ने वाला एक बहुत सशक्त पुल बन गया होता। लेकिन इतनी जल्दी अपने पुराने और स्वतंत्र इतिहास वाले भाषा-भाषियों के लिए अपनी लिपि को त्यागने की आशा करना सरल नहीं था।
जैसे ही स्वतंत्रता मिली तो अपने हिंदी प्रेम के छिछले उत्साह में लोगों ने अंग्रेजी के विरोध के साथ-साथ हिंदीतर भाषाओं को भी दरकिनार कर दिया। जैसे आजकल देशभक्ति के नए-नए संस्करण आ रहे हैं। उसी तरह साठ के दशक में हिंदी को एक छद्म देशभक्ति से जोड़ दिया गया। इससे हिंदीतर भाषी विशेषकर दक्षिण भारत के वे प्रान्त जिनकी भाषाएँ हिंदी से भी पुरानी हैं, जिनकी संस्कृति और सभ्यता किसी भी प्रकार उत्तर-पश्चिम भारत के हिंदीभाषी क्षेत्रों से कमतर नहीं है, बचाव की मुद्रा में आ गए। उनकी अस्मिता का चौकन्ना होना स्वाभाविक था। ऐसे में दो बिल्लियों और बन्दर वाली कहानी सच हो गई। "न तेरी, न मेरी" के चक्कर में अंग्रेजी ने उस खाली जगह को भर दिया।
स्वाधीनता पूर्व विद्वानों और राष्ट्रीय नेताओं ने लोगों को एक लक्ष्यता, राष्ट्रीयता और संवाद के जरिए निकट लाने का काम बखूबी शुरू कर दिया था। लेखकों और अनुवादकों ने भारतीय भाषाओं में परस्पर अनुवाद का काम भी शुरू कर दिया था। सरस्वती के यशस्वी संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी का मानना था कि हिंदी में जितना अधिक और विविध लेखन होगा उतना ही लोग हिंदी के प्रति आकर्षित होंगे। आज गूगल की तरह हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक सामग्री उपलब्ध होनी चाहिए जिसके लिए लोग उन साइटों पर जाएं और आपसी अपरिचय समाप्त हो। अब भी सभी भाषाओं में अधिकाधिक पारस्परिक अनुवाद होना चाहिए जिससे वैचारिक निकटता आए।
यदि हम चाहते हैं कि हिंदीतर भाषाभाषी हिंदी सीखें तो हमें उनकी भाषा सीखनी होगी। वे हिंदी क्यों सीखें? क्या राष्ट्रीय एकता के नाम वे ही मेहनत करें? क्या इसलिए कि हिंदी भाषी दिल्ली देश की राजधानी है, हिंदीभाषी राज्यों की लोकसभा में सीटें प्रधानमंत्री तय करती हैं। यदि हिंदी भाषा मात्र से नौकरियाँ तय होती हैं तो सबको अपनी मातृभाषा में नौकरियाँ चाहिएँ। नौकरी को योग्यता से जोड़िये, भाषा से नहीं।
हिंदी के विकास के नाम पर सरकार से सहायता प्राप्त बहुत से उपक्रम चल रहे हैं लेकिन उनका हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में सहज विकसित और स्वीकार्य बनाने के प्रयासों पर कोई ध्यान नहीं है। कालेजों में अध्यापन के लिए पीएचडी की अनिवार्यता कर देने से नितांत घटिया और खानापूर्ति वाले शोध हो रहे हैं। ठेके पर लिखवाए जा रहे हैं। यदि कोई अध्येता "प्रेमचंद के साहित्य में पादप-सम्पदा" या "प्रेमचंद के पात्रों का जातीय वर्गीकरण" जैसे बकवास विषय पर शोध करे तो उसका क्या लाभ हो सकता है। साहित्य को पाठकों से लिए छोड़ देना चाहिए। वे उसका मूल्यांकन करें। किसी भी भाषा में अप्रकाशित श्रेष्ठ साहित्य का संग्रह, प्रमाणीकरण और प्रकाशन निश्चित रूप से शोध परक काम होता है। प्रकाश में आ चुके प्राचीन साहित्य की प्रामाणिकता पर शोध हो सकता है। प्राध्यापक पद की दौड़ से परे और पूर्व में जो काम हुए हैं वे वास्तव में शोधपरक काम थे। हजारी बाबू ने "कबीर" लिखा था, शोध प्रबंध के लिए नहीं किन्तु उस पर उन्हें डी.लिट्. की उपाधि मिली।
इसी तरह से अकादमियों में पुरस्कार और पदों की जो राजनीति चलती है उससे भी हिंदी का कोई भला नहीं होता है बल्कि बिना बात की जोड़-तोड़ को बढ़ावा मिलता है। रचनाकारों में एक प्रकार गर्हित प्रतियोगिता चल पड़ती है। पुस्तकों की किसी भी प्रकार की केंद्रीकृत खरीद भी नहीं होनी चाहिए। इससे भी प्रकाशन की गुणवत्ता की बजाय सौदेबाजी का एक धंधा चल निकलता है। तथाकथित बड़े-बड़े सेमीनारों में भी कोई सार्थक काम होने की बजाय एक ही बात को विभिन्न वक्ता चुभलाते रहते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि संबंधित काम का स्पष्ट विभाजन करके बिन्दुवार लोगों को दिया जाए। उसके बाद उस पर यदि आवश्यक हो तो विचार किया जाना चाहिए।
विश्व हिंदी सम्मेलनों का भी कोई औचित्य नज़र नहीं आता। यह एक प्रकार से जनता के पैसे से कुछ जुगाडू लोगों का मुफ्त पर्यटन का कार्यक्रम हो गया है। पहले यह तो समझा जाए कि जिस देश में हिंदी सम्मलेन किया जा रहा है वहाँ हिंदी का क्या स्वरूप है और उनकी आवश्यकता के अनुरूप आप उनकी क्या मदद कर सकते हैं। यदि नहीं तो उन्हें अपने भरोसे, अपनी जैसी भी हिंदी है, उसे विकसित करने दिया जाए। फीजी की जिस भाषा को हिंदी कह रहे हैं उसे भारत के हिंदी भाषी नहीं समझ सकते। बंधुआ प्रवासी भारतीय मजदूरों ने अपने-अपने देश में जो हिंदी विकसित की है उसे एक अलग भाषा मानकर अपनी ज़मीन के हिसाब से विकसित होने दीजिए। आप उन्हें जो हिंदी देना चाहते हैं या देते हैं, उन्हें उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह सच है कि प्रवासी भारतीयों की तीसरी पीढ़ी में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएँ लगभग समाप्त हो चुकी हैं। हिंदी को लेकर जो नॉस्टेल्जिया है वह तीन-चार दशकों पूर्व विदेशों में जा बसे लोगों में है। वे भी कोई गंभीर साहित्य नहीं पढ़ते। उनकी भाषा और संस्कृति मंचीय चुटकलों वाली कविता तक ही सीमित है। वहाँ पढ़ने वाले बच्चे द्वितीय भाषा के रूप में भी वहीं की कोई भाषा लेना पसंद करते हैं। विदेशों में हिंदी या किसी भी भाषा का महत्त्व उसकी उपयोगिता को लेकर तय होता है। जब भारत शक्तिशाली बनेगा तो चीन की तरह उसकी भाषा का भी महत्त्व बढ़ जाएगा। यदि कोई विदेशी भी हिंदी सीखे तो किस लाभ-लोभ में। जब संस्कृत में अपनी तरह का एक श्रेष्ठ साहित्य या ज्ञान था तो बहुत से विदेशियों ने उसे सीखा।
भारत में अब मेकॉले नहीं है। अब शिक्षा की गुणवत्ता, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की दुर्गति का रोना बंद कर दिया जाना चाहिए। स्वाधीनता के सात दशकों बाद भी हिंदी सेवक और सरकारें मिलकर कुछ नहीं कर सकी हैं तो यह उनकी अक्षमता है।
यह सच है कि किसी भाषा में लिखे साहित्य के द्वारा उस देश-समाज के जीवन मूल्य सरलता से उसके निवासियों में संचरित हो जाते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि उसकी भाषा में निरंतर भाषा वैज्ञानिक तरीके से उम्र और पाठक के पास उपलब्ध शब्द सीमा में साहित्य विशेषकर एकांकी, कविता और रोचक कहानियां उपलब्ध होनी चाहिए।
मेरे पोते-पोतियाँ, शिष्यों के बच्चे किशोरावस्था में या युवावस्था में आ चुके हैं। जब हिंदी की बात चलती है तो वे कहते हैं कि मैं उन्हें इस आयु वर्ग के बच्चों के लिए उपयुक्त साहित्य सुझाऊँ। जब मैं उन्हें पंचतंत्र और प्रेमचंद के बारे में कहता हूँ तो वे पूछते हैं कि बदलते समय में नए परिवेश और पात्रों वाला और संबंधित आयु वर्ग की शब्दावली के अनुसार साहित्य हिंदी में क्यों नहीं है? अंग्रेजी में ऐसा साहित्य विपुल मात्रा में उपलब्ध है। इतने लेखकों, अकादमियों, अनुदानों के होते हुए हिंदी या भारतीय भाषाओं में वैसा साहित्य क्यों नहीं? क्या यह साहित्यकारों के लिए चुनौती नहीं है? अंग्रेजी जैसा बाल-साहित्य उपलब्ध हो तो आज भी भारतीय भाषाओं और हिंदी में पाठकों की कमी नहीं है। इसी प्रकार के साहित्य से हिंदी या किसी भी भाषा का विकास होता है। जब कोई भाषा आज के बच्चों में संचरित होगी तो अपने आप आगे-से आगे बढ़ती जाएगी। कहा जाता है किसी ज़माने में लोगों ने चंद्रकांता संतति पढ़ने के लिए हिंदी सीखी थी, लेकिन जब दुकानों में उचित माल नहीं होगा तो कुछ और बिकेगा। भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान का साहित्य नहीं होगा तो अंग्रेजी वाला ही चलेगा।
इस सन्दर्भ में एक बात और हो सकती है कि देश में स्कूली बच्चों के लिए भाषाओं की जो पुस्तकें छपी जाएं उनमें रीजनल इंजीनियरिंग कालेजों के प्रांतीय एक्सचेंज कार्यक्रम की तरह आधी रचनाएं प्रान्त के सन्दर्भ वाली और आधी शेष भारत की भाषाओं से अनूदित साहित्य की हों। भारत में अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तकों में शेक्सपीयर या चेखव की जगह प्रेमचंद या रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी में अनूदित रचनाएं क्यों न हों? नए संदर्भों में पंचतंत्र या हितोपदेश क्यों न रचे जाएं? डिस्नीलैंड के पात्रों की तरह भारतीय सन्दर्भ में नए पात्र रचने की लेखकीय क्षमता को क्या हो गया है? साहित्य क्यों चुटकलों और नेताओं के चालीसा लिखने में व्यस्त हो गया है? विचारें।

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