ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
तुलसीदास के पूर्व हिंदी साहित्य में रामायण परम्परा का उद्भव
01-Jan-2018 03:15 PM 3409     

कुछ लेखक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सबसे प्राचीन रामकथा हिंदी साहित्य जितनी ही प्राचीन है। इस बात के पक्ष में वे चंद या चंदबरदाई द्वारा रचित "पृथ्वीराज रासो" का हवाला देते हैं। राम-चरित की यह कथा काव्य के बृहत्तम संस्करण अथवा तथाकथित बृहत् रूपांतर, जो कि नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 1904 और 1914 में प्रकाशित किया गया है और विष्णु के दशावतारों के वर्णन में शामिल किया गया है, के अध्याय 2 (समय दो) का एक भाग है। प्रत्येक अवतार को समर्पित पंक्तियों की संख्या को देखने के बाद यह प्रतीत होता है कि इस काव्य के लेखक(कों) की कृष्ण, जिनका वर्णन 656 पंक्तियों में किया गया है, में विशेष रुचि थी। राम, जिन्हें 148 पंक्तियां समर्पित थीं, वे नरसिंह (155 पंक्तियां) के बाद तीसरे स्थान पर आते हैं। कथा का मुख्य भाग लंका पर युद्ध से जुड़ी घटनाओं को समर्पित है, जो स्वयं काव्य के पात्र से प्रभावित हुआ प्रतीत होता है। हालांकि, पृथ्वीराज रासो के विद्यमान मूलपाठ की प्रामाणिकता के विषय में बहुत संदेह और यह तथ्य कि केवल इसके एक ही संस्करण (अर्थात् बृहत रूपांतर) में राम-चरित की कथा है, को ध्यान में रखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि इस रूपांतर का विचार-विमर्श करने में अत्यंत सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
ईश्वरदास, जो कि अवधी में लिखी गई प्राचीनतम विद्यमान कृति ("सत्यवती कथा", 1501) के रचयिता माने जाते हैं, ने भी राम-कथा से सम्बन्धित दो कृतियों "भरत बिलाप/विलाप" और "अंगद पैज" (1502) की रचना की। इन दोनों कृतियों का उल्लेख नागरी प्रचारिणी सभा के हिंदी में हस्तलिखित ग्रंथों की खोज की रिपोर्टों में किया गया है। इनमें पहली कृति का उल्लेख सन् 1923-1925 की रिपोर्ट में किया गया है, जबकि सन् 1944-1946 की रिपोर्ट में दोनों का विवरण उनके संक्षिप्त उद्धरण के साथ दिया गया है। "भरत बिलाप", जिसका रचना-काल निश्चित नहीं है, का संपादन शिवगोपाल मिश्र द्वारा परवत्र्ती की कई पाण्डुलिपियों के आधार पर किया गया और 1958 में इसका प्रकाशन किया गया। इसके संपादक ने यह नोट कर लिया कि यद्यपि पाठ को देखते हुए इन सारी पाण्डुलिपियों में काफी समानता दिखाई देती है, साथ ही इन पाण्डुलिपियों से यह भी प्रकट होता है कि इनकी रचना विभिन्न कवियों द्वारा की गई है। उदाहरण के लिए, शिवगोपाल मिश्र द्वारा प्रयुक्त की गई प्राचीनतम पाण्डुलिपि (सन् 1759) से काव्य के रचयिता का नाम तुलसीदास प्रकट होता है; जो कि संभवत: इस पाठ की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए दिया गया है। हमारी रुचि की दूसरी कृति "अंगद पैज" है, जो अंशत: अपूर्ण अधूरी पाण्डुलिपियों, जिसमें से एक सन् 1733 की है, के आधार पर रामकुमारी और शिवगोपाल मिश्र के संपादन में सन् 1979 में प्रकाशित हुआ। कुछ विद्वानों का सुझाव है कि असल में दोनों काव्य, अपने विद्यमान रूप में, राम चरित की पूरी कथा पर आधारित किसी बृहत्तर कृति के अंश हो सकते हैं। नि:संदेह यह एक दिलचस्प अनुमान है, परन्तु यह भी सच है कि इन दोनों रचनाओं का आज तक गहन परीक्षण और आलोचनात्मक संपादन नहीं हुआ है। इसलिए उपलब्ध प्रकाशित संस्करणों को केवल अनंतिम माना जा सकता है।
सूरदास रचित प्रसिद्ध "सूरसागर", जिसका सूत्रपात साधारणत: तुलसीदास के पूर्व अथवा उनके समकालीन हुआ था, में रामकथा का एक और हिंदी में प्रभावशाली ढंग से कहा गया रूपांतर है जो कि एक बृहत्तर रचना का एक भाग है। न केवल हिंदी साहित्य, वरन् उत्तर भारत के धार्मिक जीवन में इसकी महत्ता को ध्यान में रखते हुए यह भाषांतर हमारा विशेष ध्यान आकर्षित करता है।
"सूरसागर" में रामकथा :
“सूरसागर", न केवल भक्तिकाल में रचित सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है, बल्कि सामान्य रूप से यह हिंदी साहित्य की भी एक महत्वपूर्ण कृति है। इस कृति की प्रशंसा कृष्ण को समर्पित पद्य की शानदार उपलब्धियों में से एक के रूप में की जाती है। हालांकि सबसे पहले तो यह कृष्ण के सत्कर्मों को महिमामंडित करती है और इसमें रामकथा का आनन्ददायक प्रस्तुतीकरण भी किया गया है।
हालांकि, जब हम सूरसागर की बात करते हैं, तब यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण हो जाता है कि आज पर्यंत इसके इतिहास ने गहन चर्चा को उकसाया ही है।
संचरित्र स्रोतों से उद्भूत परम्परा विशेषकर गोकुलनाथ (1551-1640) द्वारा रचित ग्रंथ "चौरासी वैष्णव की वार्ता" इस बात को बल प्रदान करती है कि सूरदास का जन्म सन् 1478 में दिल्ली के निकट सिरी नाम ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह भी कहा जाता है कि वे जन्मांध थे, परन्तु उपहार में मिली उस अंतर्दृष्टि को धन्यवाद, जिसके कारण वे कृष्ण के देवत्व के सभी रूपों को महसूस कर पाए। युवावस्था के प्रारंभ में, सूरदास पुष्टिमार्गी संप्रदाय के संस्थापक वल्लभ (1479-1531) के संपर्क में आए और उनके शिष्य बन गए। उन्होंने अपनी बाकी की ज़िंदगी कृष्ण को समर्पित पदों को लिखने और गाने में व्यतीत की। यह परम्परा भी हमें यह बताती है कि सूरदास की मृत्यु सन् 1582 में हुई थी।
सूरदास के पदों की व्यापक लोकप्रियता ने अवश्य ही उनके आख्यान के उत्थान को प्रभावित किया, जो कि समय के साथ बढ़ता गया और मौखिक संचरण द्वारा वल्लभी संप्रदाय परम्परा में और इसके बिना रूपांतरित होता गया। इस विकास के साथ-साथ, सूरदास के नाम के साथ अर्थात् उनके काव्यात्मक हस्ताक्षर (भनीता या चाप) के साथ पदों की संख्या भी बढ़ी। उन दूसरे कवियों और संकलनकर्ताओं को धन्यवाद, जिन्होंने उनके नाम से कई पदों की रचना की। अंतत:, ये पद भागवत पुराण के अनुसरण में गढ़े और संगृहीत किए गए। इस पूरी कार्यविधि का नतीजा हमें नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित विद्यमान मानक सूरसागर में दिखाई देता है, परम्परा द्वारा सूरदास द्वारा रचित माने गए 1,25,000 पदों में से लगभग 5000 पद (यथार्थत: 4927 पद) समाविष्ट हैं। समकालीन अध्येताओं के इसमें कोई संदेह नहीं है कि सूरसागर को ऐसे संग्रह के रूप में देखा जाना चाहिए, जो "सूरदास परम्परा" का प्रतिनिधित्व करता है, न कि संपूर्ण संग्रह के रूप में, जो कि एक ऐतिहासिक व्यक्ति जो सूरदास थे, द्वारा रचित माना जा सकता है। इसके अलावा, जहां तक विद्यमान ग्रंथ की प्रामाणिकता का प्रश्न है, वो इस तथ्य से आगे और जटिल हो जाता है कि अब तक सूरसागर का कोई संपूर्ण आलोचनात्मक भाषांतर उपलब्ध नहीं है।
सूरसागर में, अपने विद्यमान मानक स्वरूप अर्थात् नागरी प्रचारिणी सभा के संस्करण में भागवत पुराण का अनुसरण करने वाले बारह ग्रंथ जिन्हें स्कंध कहा जाता है, समाविष्ट हैं। वे पदों की संख्या के आधार पर आकार में महत्वपूर्ण रूप से भिन्न हैं। पाँचवें ग्रंथ में जहाँ पदों की संख्या चार है, वहीं सबसे बड़े ग्रंथ में 4309 पद हैं। यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि पहले से नौवें ग्रंथ तथा ग्यारहवें और बारहवें ग्रंथ में कुल मिलाकर भिन्न-भिन्न आकार के पदों की संख्या सिर्फ 618 है, जिनसे संपूर्ण सूरसागर का लगभग छठवाँ हिस्सा बनता है। सबसे बड़ा स्कंध, जो कि सर्वाधिक लोकप्रिय भी है, कृष्ण को समर्पित है और सामान्यत: यह कृष्णायन के नाम से जाना जाता है।
यह तथ्य कि रामकथा को भी सूरसागर में स्थान प्राप्त हुआ है, भागवत पुराण से उद्भूत परम्परा का पालन करता है, जिसमें विष्णु के दशावतारों, जिनमें कृष्ण को सर्वाधिक विशिष्ट माना गया है, का वर्णन किया गया है। इस प्रकार, इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता है कि सूरदास के इष्टदेव कृष्ण थे। कृष्ण यहाँ पूर्णावतार के रूप में अपनी विभिन्न दैवी लीलाएँ करते हुए चित्रित किए गए हैं। इस लीला के मूलतत्वों एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण मूलतत्व एक रूप और नामरूप अर्जित करना है। जिसका यहाँ मुख्य आशय कृष्ण के अवतार से है, परन्तु साथ ही वे हरि, विष्णु, राम और बाकी सब भी हैं वे सृष्टि के मुख्य कारक हैं (उदाहरणार्थ, 1.2-4)। इस प्रकार, वास्तव में राम और कृष्ण एक ही ईश्वर के दो नाम हैं और कई अवतरण इस प्रकार के मनोभावों को प्रमाणित करते हैं।
सूरसागर की रामायण से लगभग पूरा नौवाँ ग्रंथ निर्मित है, जिसके कुल 174 पदों में से 157 पद रामायण को समर्पित हैं (9.15-172)। मूल कथा वास्तव में वाल्मिकी का अनुसरण करती है, परन्तु समृद्ध रामायण परम्परा का, विशेषकर पुराणों और संस्कृत की कथाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव भी देखने को मिलता है। इससे कुछ प्रसंगों का विलोपन भी हुआ है। ऐसे प्रसंग हैं - जैसे सीता का निर्वासन सातवें ग्रंथ में समाविष्ट किया गया है, क्योंकि यह दयालु ईश्वर की भक्ति परिकल्पना के सादृश्य नहीं है। इसीलिए सूरसागर राम के अयोध्या आगमन और उनके राज्याभिषेक के विवरण के साथ समाप्त होती है। नौवें ग्रंथ में वर्णित इस विस्तृत कथा के अलावा, हमें कथा के अन्य बड़े और छोटे संदर्भ भी देखने को मिलते हैं, उदाहरणार्थ, 1.3, 4, 11, 13, 18, 35, 43, 59, 61, 90, 92, 176 या 7.2। रामकथा से संबंधित ऐसे प्रसंगों में से एक सर्वाधिक मनभावन प्रसंग वह है, जिसमें यशोदा बालक कृष्ण को सुलाने के लिए थपकियाँ दे रही हैं और उन्हें राम के सत्कर्मों की कथा सुना रही हैं (10.198-199)। जैसे ही वे कहती हैं कि रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है, बालक कृष्ण जाग जाता है और अपने पैरों से छलाँग लगाकर चिल्लाता है, "धनुष, मेरा धनुष, लक्ष्मण! मुझे मेरा धनुष दो!", इससे न केवल राम और कृष्ण के सत्कर्मों की समरूपता बल्कि उन दोनों की स्वयं की भी समरूपता का आसानी से परीक्षण हो जाता है। यह सुनकर माँ यशोदा बालक कृष्ण के सामने विस्मय से खड़ी रह जाती हैं।
हालाँकि, राम के प्रति सूर का मनोभाव अनूठी भक्ति का है अर्थात् यह समर्पण से भरा हुआ है, उनके राम की जब तुलसीदास के राम से तुलना की जाए तो वे ज्यादा सांसारिक और ज्यादा मानवीय हैं। इसमें न तो उनके देवत्व और न ही उनकी वीरता और उदार प्रकृति का बार-बार स्मरण कराया जाता है। काव्यकार की राम के अंत:करण, उनकी अपनी प्रिय सीता के प्रति कोमल भावनाओं, सीता से वियोग के बाद उनके कष्ट और उनकी आशंका कि क्या वे सीता को रावण की कैद से सकुशल वापस ला पाएंगे, आदि में ज्यादा दिलचस्पी है। इसका एक मनोरम वृत्तांत रामविलाप (9.62-4) का उस समय का है जब राम को यह ज्ञात होता है कि सीता अदृश्य हो गई हैं। ऐसी परिस्थिति में उनका व्यवहार उन दूसरे पुरुषों जैसा ही चित्रित किया गया है, जैसा दूसरे मनुष्य उस परिस्थिति में करते। वे अपनी प्रियतमा की तलाश के लिए काफी व्यग्र हैं। सीता के प्रति अपने प्रेम में राम इतने व्याकुल हैं कि वे बाकी सब कुछ भूल गए हैं। यहाँ तक कि अपने दैवीय सर्वशक्ति सम्पन्नता को भी। (सूरदास प्रभु प्रिय-प्रेम-बसा, निज महिमा बिसारी; 9.63)। ऐसा प्रतीत होता है कि सूर की रामकथा का यह गुण और उसका भावप्रधान चरित्र उनके काव्य के इतिहास से सीधे तौर पर संबद्ध होना चाहिए, जो महाकाव्य कथा की परम्परा से नहीं वरन् भक्तिपरक गीतों की काव्यात्मक परम्परा से उत्पन्न हुआ है।
जहां तक रामकथा के संयोजनात्मक और शैलीगत महत्व का संबंध है, सूरसागर में वर्णित राम के जीवन की कथा समकक्ष नहीं है और इसके उद्भव को देखते हुए यह हमें चौंका देने वाला लगता भी नहीं है। उदाहरण के लिए, पात्रों का एक से अधिक बार प्रस्तुतीकरण और जिन परिस्थितियों में वे कार्य कर रहे हैं उनका इतना संक्षिप्त विवरण कि उसमें और गहरी पहुँच का अभाव है। काफी हद तक वाई. च्वेतकोव इस बात को लेकर सही थे कि सूरदास घटनाओं का काव्यात्मक वर्णन करने में, उज्ज्वल कलात्मक चरित्रों की रचना करने में ज्यादा समय नहीं देते हैं। वे अपने हृदय के सबसे प्रिय लक्ष्य अर्थात् कृष्ण के जीवन के प्रस्तुतीकरण तक पहुँचने की जल्दी में हैं। हालाँकि, इसका मतलब यह भी नहीं है कि सूरदास के वर्णन (द्यड्ढथ्थ्त्दढ़) में ऐसे अंश नहीं मिलेंगे जो निर्विवाद रूप से शैलीगत महत्व के आधार पर विशिष्ट न हों। इसके विपरीत, इनमें से कई पद नाटकीय लचक के आधार पर विशिष्ट हैं, जो विभिन्न चरित्रों की मानसिक गहराई को प्रकट करते हैं तथा जीवन्त और बड़ी ही भावनात्मक भाषा में लिखे गए हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं, जैसे- रावण के सीता को सम्बोधित करते हुए कहे गए वे शब्द, जब वह सीता को अपनी चौदह हजार सेविकाओं के साथ अपनी पटरानी बनाने और अपने राज्य में उसकी सहभागिता के लिए तैयार हो जाता है (रावण-वचन सीता-प्रति; 9.79); हनुमान की सीता से भेंट (हनुमान-सीता-मिलन; 9.83-95); मंदोदरी की रावण से सीता को वापस राम को सौंपने संबंधी याचना (रावण-मंदोदरी-संवाद; 9.114-19) या समुद्र पर बाँध के निर्माण के पहले अपनी सेना को समुद्र पार करने की अनुमति देने के लिए राम द्वारा समुद्र को मनाने का प्रसंग (राम-सागर-संवाद; 9.121-3)।
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि सूर और उनकी परम्परा भगवान कृष्ण को समर्पित थी, इस बात में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि राम को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया। हालाँकि, यह दिलचस्प प्रतीत होता है कि रामकथा को यहाँ स्थान मिला और उसका महत्व इस तथ्य से कुछ फीका नहीं पड़ा है कि भागवत पुराण की परम्परा के साथ अनुपालन की आवश्यकता के नहीं होने के बाद भी संभवत: यह हो गया। इसके परिणामस्वरूप, अब हमारे पास उस शैली को प्रकट करता हुआ अभिलेख है, जिसमें ईश्वर को महसूस किया जा सकता है, एक शैली जो यद्यपि कृष्ण के भक्तों में सर्वाधिक प्रचलित नहीं थी, फिर भी आने वाले समय में वह कभी भी अपसर्जित नहीं की गई। आज की सूरदास परम्परा इसकी गवाह है। सूरसागर के समकालीन भाषांतरों में संकलित पदों से, जो वैष्णव प्रार्थना सभाओं के दौरान और घर पर, एकांत में, गाए और कहे जाते हैं, उस ईश्वर की एक छवि उभरकर सामने आती है, जिसके कई नाम हैं और राम भी उनमें से एक हैं, जिनकी छवि उनके सच्चे सेवक सूर द्वारा सृजित की गई है।
विष्णुदास और उनकी रामायण :
काव्यकार का जीवन और उनकी कृतियाँ पन्द्रहवीं शताब्दी में विष्णुदास द्वारा हिंदी में रचित रामायण कथा अब तक की सबसे प्राचीन और स्वतंत्र रामकथा है।
विष्णुदास का नाम पहली बार हिंदी साहित्य पर पश्चिमी स्रोतों से लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा वर्ष पहले, महाभारत से प्रेरित लेखक के रूप में, सामने आया था। इसके लिए गार्सिन द टैसी को धन्यवाद। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक क्रेस्टोमैथी हिंदी एट हिंदूई (1849) में विष्णुदास के कलियुग पर आधारित पाठ के कुछ अंश समाविष्ट किए, जो युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के महाभारत प्रसंग से अनुकूलित थे। इसके बाद विष्णुदास के नाम का उल्लेख काफी समय बाद नागरी प्रचारिणी सभा के 1906-8 के प्रतिवेदनों में दिखा, जहाँ उनका नाम दो कृतियों महाभारतकथा और स्वर्गारोहण से संबद्ध किया गया। बाद के प्रतिवेदनों (1941-3) में भी उनका नाम अन्य पाण्डुलिपियों से संबद्ध किया गया, जिनमें भास वाल्मिकी रामायण भी है। विष्णुदास का उल्लेख मिश्र बंधुओं द्वारा रचित कृति मिश्रबंधु विनोद में भी मिलता है, जो कि पारम्परिक रूप से भारतीयों द्वारा हिंदी साहित्य के इतिहास की पहली कृति मानी जाती है।
उन कृतियों, जिन्हें विष्णुदास द्वारा रचित माना जाता है, से यह ज्ञात होता है कि वे गोपाचलगढ़ (आधुनिक ग्वालियर) में रहते थे और तोमर राजवंश के राजा डोंगरसिंह के राजकवि थे। उनके जीवनकाल के बारे में कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया है, परन्तु उनके काव्य पर तिथियां अंकित हैं- महाभारत का भाषांतर 1435 में रचा गया और रामायण का 1442 में।
स्टुअर्ट मैक्गेगोर यह उल्लेख करते हैं कि पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध का ग्वालियर पूर्व ब्रजभाषा, जो तोमरों के दरबार में कार्यालयीन प्रयोजनों के लिए ब्रज साक्ष्य के शिलालेखों के तौर पर प्रयुक्त हुई है, में कृष्ण और राम पर आधारित वर्णनात्मक काव्य का गवाह है। इस प्रकार, यद्यपि हम विष्णुदास के पहले भी कतिपय ब्रजभाषा परम्परा के बारे में बात कर सकते हैं, फिर भी उन्हें "हिंदी की ब्रजभाषा परम्परा का एक अग्रणी प्रतिष्ठापक" माना जाना चाहिए। यह भी कहा जाता है कि वे ब्रजभाषा का प्रयोग करने वाले पहले काव्यकार थे, जिसे कि 17वीं शताब्दी तक "भारत की संपूर्ण साहित्यिक भाषा" होने का गौरव प्राप्त हुआ। यहां यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि बिलकुल उसी समय ग्वालियर में विष्णुदास ने राम की पारम्परिक कथा का आख्यान करने में ब्रजभाषा का प्रयोग किया था। यह भी संभव है कि एक नई साहित्यिक अभिव्यक्ति के साधन के रूप में ब्रजभाषा का अभिग्रहण, किसी हद तक, मुस्लिमों के विस्तार के कारण बदली हुई एक नई सामाजिक-राजनैतिक परिस्थिति की प्रतिक्रिया था। यह भाषा अपभ्रंश की अब तक की सबसे प्रबल परम्परा के पतन की भी साक्षी है, अर्थात् यहां एक मध्य भारतीय-आर्यन भाषा और ब्रजभाषा का बढ़ता सामथ्र्य, अर्थात् एक नई भारतीय-आर्यन भाषा। फिर भी, यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बलभद्र तिवारी, विष्णुदास की भाषा को बुंदेली मानते हैं जो कि प्रमुखत: ब्रज मिश्रित है, परन्तु साथ ही उसमें बड़ी संख्या में संस्कृत तत्सम साथ ही साथ एक प्रत्यक्ष फारसी-अरबी शब्दकोश भी है, जिसे उन्होंने उर्दू के काव्यदोषयुक्त अभिधान से अंकित किया है।
विष्णुदास की रामायण सन् 1972 में प्रकाशित हुई। उसका पाठ 1863 में विरचित और सागर विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के संग्रह से प्राप्त एक पाण्डुलिपि पर आधारित है। इस संस्करण को बहुत सावधानी से देखा जाना चाहिए, न केवल इसलिए कि यह एक बाद की पाण्डुलिपि पर आधारित है, बल्कि इसलिए भी कि इसका पाठ, जिसकी वर्तमान स्थिति निश्चित रूप से इसके संपादक की असामयिक मृत्यु के कारण नि:संदेह ही प्रभावित हुई होगी, बिंदुयुक्त रेखाओं अथवा प्रश्नचिह्नों के साथ अस्पष्ट अंशों से भरा पड़ा है। उन पर किसी भी प्रकार से न तो कोई टीका आदि की गई है और न ही उनकी व्याख्या की गई है; एक समुपयुक्त प्रस्तावना का जिसमें कुछ तथ्यों अर्थात् क्या संपादक ने इन खंडों को आगे विश्लेषण के लिए आधा-अधूरा छोड़ा अथवा वे खंड पाण्डुलिपि में ही अव्यक्त हैं, के बारे में कुछ भी सुस्पष्ट रूप से कहा गया हो, अभाव भी इस ग्रंथ में है। इसके अलावा, इस भाषांतर के खंड, हरिहर निवास द्विवेदी द्वारा विष्णुदास की महाभारत के अपने भाषांतर में समाविष्ट किए गए भास वाल्मिकी रामायण के खंडों से व्यापक रूप से भिन्न हैं। इन सब कारणों से, ऐसा सही प्रतीत होता है कि लोकनाथ द्विवेदी के भाषांतर को प्रावधिक मानकर ही पेश आना चाहिए।
इस भाषांतर का अधिकतम पाठ पंद्रह-मोरा चौपाइयों में है, जो यदा-कदा दोहों और अन्य छंदों (संस्कृत श्लोक भी) के साथ बिखरा पड़ा है। इस कृति की शैली यह इंगित करती है कि इसकी रचना वाचिक प्रदर्शन को ध्यान में रखकर की गई थी।
मुख्य कथा वाल्मिकी की कथा के आधार पर रची गई प्रतीत होती है परन्तु इस कृति की संरचना गैर-पारम्परिक है। यह तीन पुस्तकों में विभक्त की गई है, जिनके शीर्षक हैं "बालकाण्ड, सुन्दरकाण्ड और उत्तरकाण्ड", जो कि हालांकि सप्त-पुस्तकीय पारम्परिक रूपांतर से उद्धृत किए गए हैं। इनमें से पहली पुस्तक इकतीस सर्गों में विभक्त है और हनुमान के लंका प्रस्थान तक की घटना के बारे में अर्थात् उन घटनाओं के बारे में जो पारम्परिक रूपांतर की पुस्तक 1 से 4 में समाविष्ट हैं, बताती है। लगभग प्रत्येक सर्ग अपने आप में संपूर्ण है और एक सूत्र के साथ समाप्त होता है। इसमें अधिकतर सर्ग का शीर्षक होता है जो प्रमुख उपाख्यान के बारे में बताता है। उदाहरणार्थ : जहां "रामायण की बाल्यावस्था वाली पुस्तक" के एक सर्ग का शीर्षक "श्रंगी के आगमन के बारे में दशरथ की मंत्री से मंत्रणा" है वहीं "रामायण की बाल्यावस्था वाली पुस्तक" के एक सर्ग का शीर्षक "तारा का विलाप" है। दूसरी पुस्तक, सुन्दरकाण्ड में, तेरह सर्ग हैं, जो कि मुख्य कथा की पारम्परिक रूपांतर की पुस्तक 5 तथा 6 में वर्णित घटनाओं को समाहित करते हैं। यह हनुमान के लंका अभियान से प्रारंभ होती है। इसमें बाद में युद्ध का विस्तृत विवरण (पांच सर्ग) और रावण के वध के साथ ही राम के अयोध्या आगमन और उनके राज्याभिषेक तक का विवरण दिया गया है। यह पुस्तक रामराज्य अर्थात् राम के न्यायपरायण शासन पर समाप्त होती है। अंतिम पुस्तक नौ सर्गों में विभक्त है और यह मुख्य कथा की अनुपूरक है। बाकी अन्य बातों के अलावा, इसमें राक्षसों की उत्पत्ति और विकास, अहिल्या की कथा, गर्भवती सीता के निर्वासन और तपस्यालीन शूद्र का राम द्वारा वध का वर्णन किया गया है। इस कृति की परिणति राम के न्यायसंगत शासन के चित्रण और उस आकाशवाणी, जो उन्हें यह बताती है कि उनके स्वर्गारोहण का समय हो गया है, के साथ होती है। फलत: राम अपना राज्य अपने पुत्रों, लव और कुश को सौंप देते हैं और स्वर्गारोहण के लिए तैयार होते हैं।
काव्य के प्रत्येक सर्ग का विस्तार अलग-अलग है और ऐसा प्रतीत होता है कि दिए गए प्रसंगों में से जो ज्यादा लोकप्रिय था, उसको ज्यादा ध्यान समर्पित किया गया। यहां सुन्दरकाण्ड, जिसमें कि मुख्यत: राम और रावण के बीच सीधे संघर्ष की कहानी है, सबसे बड़ी पुस्तक है और उसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान भी प्राप्त है। यह पूरे काव्य का एक-तिहाई से ज्यादा भाग है। यह इंगित करता है कि काव्यकार के लिए राम और रावण के बीच संघर्ष सबसे आकर्षक विषय था।
जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है कि विष्णुदास के लिए प्रेरणा का प्रमुख स्रोत वाल्मिकी रामायण की परम्परा थी। हालांकि, विष्णुदास ने इसे काफी मुक्त भाव से लिया और इसे कई स्थानों पर परिवर्तित भी किया, विशेषकर, जहां मूल कथा में लम्बी पौराणिक कहानियां, जिनका मूल कथा से कोई सीधा संबंध भी नहीं है, भरी पड़ी हैं। कुछ प्रसंगों को विलोपित अथवा संकुचित कर और अन्य कुछ घटनाओं को विस्तार देकर अथवा उनकी व्याख्या कर कथा के पुनर्लेखन का यह वैशिष्ट्य इसके सबसे अनूठे वैशिष्ट्यों में से एक वैसा ही है जैसी स्वयं रामायण परम्परा शताब्दी दर शताब्दी, लेखक दर लेखक साक्षी है। यही वह शैली है जिसके कारण इसका अस्तित्व है, निरंतर कही जाएगी और इसकी पुनव्र्याख्या की जाएगी। विष्णुदास ने कथा का पुनर्लेखन करते समय, परम्परा से जाहिर तौर पर वो सब ग्रहण किया जो उनके विचार से उन्हें ध्यान देने लायक प्रतीत हुआ। हालांकि, जैसा स्टुअर्ट मैक्ग्रेगोर ठीक ही मानते हैं : "यहां कोई संदेह नहीं है कि विष्णुदास का उद्देश्य वाल्मिकी रामायण की पुनव्र्याख्या के बजाय उसकी पुनर्रचना करना था।" और द्विवेदी के भाषांतर से यह प्रकट होता है कि विष्णुदास एक विशुद्ध कथावाचक थे, जो राम के नाम की प्रशंसा में उनके सत्कर्मों की कथा एक सादगीपूर्ण मनमोहक भाषा में अपने श्रोताओं को सुनाते थे। हालांकि, अन्य हिंदी लेखकों के बीच में उनके स्थान का आकलन करने का प्रयास करते समय किसी को भी स्टुअर्ट मैक्ग्रेगोर के शब्दों को दोहराना होगा कि "ब्रजभाषा में उनकी अभिव्यक्ति की क्षमताओं का महत्व उनकी कृतियों की साहित्यिक योग्यताओं से परे था।"
लंबे समय से, विष्णुदास के काव्य की हिंदी साहित्य के इतिहास पर महत्वपूर्ण स्रोतों द्वारा लगभग पूरी तरह से उपेक्षा की जा रही है। संभवत:, काफी हद तक यह नागरी प्रचारिणी सभा के प्रतिवेदनों में भास वाल्मिकी रामायण अर्थात् "हिंदी भाषा में वाल्मिकी रामायण" शीर्षक के द्वारा, जिसके अंतर्गत पद्य प्रकाशित हुआ था, प्रभावित हुआ था। इस प्रकार, शोधकर्ता इसे मूल कृति नहीं, सिर्फ एक अनुवाद मानते हैं, जो कि ध्यान देने लायक नहीं है। हालांकि, इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि यह कृति अध्येताओं के लिए कम से कम दो कारणों से ध्यान देने लायक तो है ही। पहला, चूंकि यह रामकथा हिंदी साहित्य में सबसे प्राचीन मौजूदा और व्यापक रामकथा है। दूसरा, इसके काव्यकार ने इसका इतनी सुरुचिपूर्ण और मनमोहक रीति में वर्णन किया है कि कुछ लोग इसे "रामकाव्यमाला की पहली मणि" मानते हैं। इन सब तर्कों को ध्यान में रखते हुए, इसमें कोई संदेह नहीं कि विष्णुदास के मूल पाठ का एक सही आलोचनात्मक संपादन किया जाना अत्यंत वांछनीय है।
पूर्ववर्ती चर्चा से, यह तो स्पष्ट होना चाहिए कि हिंदी साहित्य में रामायण परम्परा की शुरुआत वाल्मिकी से गहरे रूप से संबद्ध है। वाल्मिकी का काव्य पूर्ववर्ती हिंदी लेखकों जिनकी रामकथा में रुचि थी और जिनके लिए वे "मान्य मूल आदर्श" थे, के लिए प्रेरणा का मुख्य स्रोत था। संपूर्ण रामायण परम्परा में वाल्मिकी की भूमिका को देखते यह आश्चर्यजनक है भी नहीं। यह स्थिति थोड़े ही समय बाद तुलसीदास की रामचरितमानस में सन्निहित उत्कट रामभक्ति के आगमन के साथ ही बदल गई - जैसा कि फिलिप लुटजेनडॉर्फ बड़े ही समुचित रूप से देखते हैं और हिंदी भाषी लोगों के लिए एक आदर्श रामायण पाठ बन गई।

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