ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सच से आज मुलाकात हो गई
01-Jan-2019 02:03 PM 845     

धूमिल, कांतिहीन स्वरूप देखकर
मैंने पूछ ही लिया
यह कैसा रूप बनाया है?
दर्शन भी दुर्लभ हो लिए हैं अब तो
सच ने कहा, इस युग ने ही यह स्वरूप दिया है
झूठ ग्रहण बनकर मुझे आधा या
कभी पूरा ही निगल जाता है
मैंने तर्क किया,
अभी भी सच लिखने वाले पत्रकार दीखते हैं
सच ने कहा, सच लिखकर छप जाये और
अगर छप भी जाये तो कितने लोग पढ़ पाते हैं?
मेरा कांतिवान रूप
बहुत कम लोगों तक ही पहुँच पाता है
मैंने फिर तर्क किया,
रिश्तों में सच जीते हैं हम अभी भी
सास-बहू, भाई-बहन, चाचा-भतीजी, जीजा-साली
कितने ही रिश्ते अभी भी हमारी
सभ्यता का हिस्सा बने हुए हैं
सच ने कहा,
सच है पर इन रिश्तों में कब दरारें पड़ जाती हैं
और रिश्तों में खोखलापन आ जाता है
रिश्तेदारों को पता नहीं लगता और
सच का दम निकल जाता है
सास के हाथ की थपकी में
बहू को स्वार्थ दीखता है
बहन की गरीबी भाई की अमीर
शान-शौकतभरी जिंदगी पर धब्बा बन जाती है
तो भाई-बहन से नजरें चुरा लेता है

भतीजी का रूप कब चाचा का इमान डोलकर
भतीजी का दामन दागदार कर जाती है
खुद सच को भी पता नहीं चलता और
रिश्तों का सच
रिश्तों के झूठ में दफ़न हो जाता है
मैंने आखिरी तर्क दिया
रिश्तों में एक रिश्ता है
जो सच जितना ही पाक है
नेक है निस्वार्थ प्रेम से भरा हैै
सच हैरान सा देख रहा है जानने की
उत्सुकता से उत्साहित हो गया है
मैंने कहा, माँ और बच्चों के रिश्तों में
निस्वार्थ प्रेम है, सच्चाई है ऐसा पवित्र प्रेम जिससे
भगवान को भी ईष्र्या हो जाये
सच का स्वरूप निखर गया वह फिर से
कांतिवान, निर्मल, निश्छल और उज्ज्वल हो गया।

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