ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी की चुनौतियों का सच
01-Jun-2019 12:37 AM 399     

आजकल देश में हिंदी का सन्दर्भ अचानक राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय हो गया है। जो
भी सेमिनार होते हैं वे सभी अंतर्राष्ट्रीय होने लगे हैं। यह अलग बात है कि वे
कितने अंतर्राष्ट्रीय होते हैं और कितने एकांगी और स्थानीय, इस सच को उसमें
शामिल होने वाले प्रतिभागी और आयोजक ही समझ सकते हैं।

विगत दिनों अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, अमरीका के उन्नीसवें द्विवार्षिक अधिवेशन के सिलसिले में न्यूजर्सी और इसी सन्दर्भ में प्रकारांतर से न्यूयार्क, ओहायो आदि इलाकों में जाना हुआ। इस प्रसंग के बहाने अमरीका का यात्रा विवरण प्रस्तुत करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। वैसे भी आजकल संचार साधनों और विशेषकर इंटरनेट के कारण दुनिया घर में ही आ गई है। आभासीरूप में उसका कहीं भी आनंद लिया जा सकता और खुद को एक उत्साही व जिज्ञासु घुमक्कड़ के रूप में आसानी से पाठकों के मस्तिष्क में टाँका जा सकता है।
यह अधिवेशन तीन दिन का था। जिनमें पहला दिन 10 मई 2019 उद्घाटन, स्थानीय कवियों का कवि सम्मेलन और भारत से पधारी अनुराधा दुबे द्वारा धर्मवीर भारती की काव्य कृति "कनुप्रिया" पर आधारित नृत्य नाटिका की प्रस्तुति एवं स्थानीय कलाकारों की नृत्य-संगीत की प्रस्तुतियां थीं। दूसरे दिन 11 मई 2019 को रात को भारत से पधारे तीन कवियों का कवि सम्मेलन और उससे पहले भारत से ही पधारीं जिला खान की सूफी काव्य की सांगीतिक प्रस्तुति थी। तीसरा 12 मई का दिन संस्था के आतंरिक विचार-विमर्श को समर्पित था। स्वाभाविक है स्वागत, धन्यवाद और स्मृति चिह्न वितरण ऐसे कार्यक्रमों के आवश्यक कर्मकांड होते ही हैं। सो वे भी हुए। हाँ, इस बीच 11 मई को पूर्वाह्न में विभिन्न देशों और स्थानों से आमंत्रित विद्वानों के अभिभाषणों का एक सत्र था जिसका बीज-विचार था- हिंदी की वैश्विक चुनौतियां। इसमें नार्वे से सुरेश शुक्ल, कनाडा से राकेश तिवारी और सरन घई, अमरीका से व्यवसाय से अभियंता लेकिन हिंदी-संस्कृत भाषा को समर्पित डॉ. मधुसूदन झवेरी और कवयित्री और हिंदी शिक्षिका नीलू गुप्ता तथा भारत से डॉ. प्रेम भरद्वाज ने भाग लिया। इस सत्र के सञ्चालन और समन्वय का उत्तरदायित्त्व मुझे दिया गया।
सुरेश शुक्ल ने विदेश (नार्वे) में द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी और नीलू गुप्ता ने, विशेष रूप से अमरीका में, विदेश में हिंदी अध्यापन के बारे में अपने विचार रखे। इस विषय पर शिक्षण पद्धति और पाठ्यक्रम की चर्चा भी हो सकती थी लेकिन समयाभाव के कारण ऐसा नहीं हो सका। इस दिशा में ठोस कार्य करने के लिए यह नितांत आवश्यक है। राकेश तिवारी जिन्होंने कनाडा से "हिंदी टाइम्स मीडिया" नामक एक हिंदी मासिक का प्रकाशन शुरू किया है, ने कनाडा में हिंदी मीडिया की चुनौतियों की चर्चा की। सरन घई ने हिंदी सेवी संस्थाओं के मनोविज्ञान को एक आलेख के रूप रेखांकित किया। वैसे इसके साथ वे नई दुनिया (कनाडा और संयुक्त राज्य अमरीका) की हिंदी सेवी संस्थाओं का नामोल्लेख और गतिविधियों का परिचय दे सकते थे। कोई बात नहीं, फिर कभी। डॉ. झवेरी ने अपने प्रिय विषय "पारिभाषिक शब्दों के विकास" के बारे में बात की। यदि वे पारिभाषिक शब्दों के निर्माण की प्रक्रिया के बारे में सोदाहरण बात कर पाते तो और भी अच्छा होता लेकिन कुछ तो समयाभाव रहा और कुछ मधु जी की अस्वस्थता।
इन सब बातों और अधिवेशन के प्रसंग में मेरी मान्यता है कि आज के समय में किसी भी भाषा और संस्कृति के समक्ष कोई बड़ी चुनौतियां नहीं हैं। भूतकाल में अग्रीमेंट के तहत भारत से फीजी, मारीशस ले जाए गए निरीह लोगों के सामने अवश्य अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा की बड़ी चुनौती थी जिसे उन्होंने विपरीत और दमनकारी परिस्थितियों में भी स्वीकारा और विजेता होकर निकले। इसके पीछे उनके साहित्य, भाषा और संस्कृति का बल था। उनके लिए रोजगार और उन्नति के लिए कोई विदेशी भाषा सीखने की चुनौती नहीं थी। उनका अथक श्रम ही उनकी शक्ति थी। उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं थी बल्कि वे अपने को ले जाने वालों की ज़रूरत थे, उनके लिए अपरिहार्य थे। उनके लिए अपनी अस्मिता की रक्षा करने की चुनौती थी और सत्ता की ओर से कोई संबल नहीं था।
इसके विपरीत अफ्रीका से गुलाम बनाकर अमरीका ले जाए गए काले गुलामों से उनके नाम, धर्म और भाषा एक धूर्त योजना के तहत एक झटके में ही छीन लिए गए थे। इस वैचारिक रिक्तता के कारण आज भी वे वैचारिक और सांस्कृतिक अधरझूल में हैं क्योंकि गोरे अमरीका ने आज भी उन्हें दिल से नहीं अपनाया है और भाषा, धर्म और संस्कृति के अभाव में उनका अपना कुछ नहीं रह गया है।
अब इन सन्दर्भों में हम पश्चिम में, विशेषरूप से अमरीका (नई दुनिया) में बसे भारत मूल के हिंदी भाषी लोगों की चौथी पीढ़ी की बात करें। जहां तक मैं समझ पाया हूँ, इस वर्ग के लोगों की संख्या पर्याप्त हैं। अमरीका उनका चुना हुआ देश है जिसे उन्होंने बड़ी तपस्या और मेहनत से हासिल किया है। उनकी उपलब्धि हिंदी और भारतीय संस्कृति नहीं बल्कि अमरीका है। अवसरों का देश अमरीका। जिसके लिए उन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति में से समय निकाला है।
भारत में हिंदी के अतिरिक्त अन्य भाषाभाषियों को अपना प्रान्त छोड़ने पर भारत में ही एक अल्पसंख्यकता का अनुभव होता है और उसके चलते वे अपनी भाषा और रीति-रिवाजों के प्रति सतर्क हो जाते हैं। इसीलिए वे सायास अपने संस्कृति और संवाद के लिए मिलन-स्थल बनाते हैं। पहले अमरीका में कम संख्या में होने के कारण यहाँ के हिंदी भाषी लोगों में मिलने और संवाद करने की एक ललक थी जो अब संख्या बढ़ने के कारण कम हो गई है। वह अन्य कम संख्या वाले भारतीयों में अब ही बरकरार है।
यहाँ मैं जिस बात की ओर संकेत करना चाहता हूँ वह यह है कि पर्याप्त संख्या होने पर यहाँ सरकार की ओर से विद्यालयों में हिंदी शिक्षण की निःशुल्क या नितांत कम शुल्क में व्यवस्था है। जिसका लाभ यहाँ के हिंदी भाषी लोगों को उठाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि सभी अपने-अपने क्षेत्र में हिंदी भाषी विद्यार्थियों की संख्या का सर्वे करवाएं और सब मिलकर हिंदी शिक्षण की सरकारी व्यवस्था का लाभ उठाएं, जैसे कि कनाडा में पंजाबी भाषी उठा रहे हैं।
भारत में हिंदी या अपनी मातृभाषा से दूर होने का भय नहीं लगता क्योंकि कैरियर के लिए अंग्रेजी के प्रयत्न करके बनाए गए कृत्रिम परिवेश के बावजूद मातृभाषा की खुशबू अनुभव होती ही रहती है। यहाँ वह अभाव हो तो जाता है लेकिन कैरियर की धुन और लालच में वह अनुभव नहीं होता। विदेशों में कई पीढ़ियों तक रहने के बावजूद आज भी दुनिया में व्यक्ति की पहचान उसके मूल देश से ही की जाती है और उस पहचान को एशियन अमरीकन, ब्लेक अमरीकन आदि के रूप अलग से जिंदा रखा जाता है। इसलिए हमें अपने देश की संस्कृति, भाषा और जीवन मूल्यों से जुड़े रहना बहुत ज़रूरी है। हमारा आदि और अंत वही है। इसके लिए सबसे सरल तरीका है अपने घर में अपना परिवेश बचाकर और बनाकर रखा जाए। जैसे कि आज़ादी से पहले ज्ञान के लिए अंग्रेजी सीखने वाले लोगों ने उसे अपने जीवन और चिंतन की भाषा नहीं बनाया। अंग्रेजी उनके ज्ञान और रोजगार की भाषा तक ही सीमित रही। ऐसे में अंग्रेजी कभी भी हिंदी या भारतीय भाषाओं के समक्ष चुनौती नहीं बन सकी। लेकिन आज वह विदेश में ही नहीं भारत में भी चुनौती प्रस्तुत कर रही है।
इस मनः स्थिति और परिस्थिति को समझने के लिए लगभग सारा जीवन लन्दन में बिताने वाले बंगाली विद्वान नीरद चौधरी का उदाहरण पर्याप्त है। वे अंग्रेजी सभ्यता, खान-पान, पहनावे के बड़े प्रशंसक थे और भारतीयता की बहुत आलोचना किया करते थे, लेकिन अपनी वसीयत में लिखा कि उन्हें बंगाली वेशभूषा में दफनाया जाए।

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