ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
त्रिशंकु
01-Nov-2016 12:00 AM 3606     

विदेश में बसे भारतवंशियों के लिए रह रहकर एक ही शब्द ज़हन में आकर टकराता है; और वह है - त्रिशंकु। त्रिशंकु महाराज सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। महान मुनि श्री विश्वामित्र  ने उन्हें पहुँचा भी दिया। (पता नहीं ये महान ऋषि-मुनि अपनी अथक प्रयत्नों से अर्जित ऊर्जा को इन व्यर्थ के कामों में क्यों बर्बाद करते थे। दुर्वासा ऋषि को ही देख लीजिये -- जब देखो तब क्रोध में आपा खोकर बस श्राप दे गुज़रते थे और फिर ठंडे दिमाग़ से सोच कर उस श्राप की ठ्ठदद्यड्ढ-ड्डदृद्यड्ढ (श्राप-विनाशक उपाय) ढूंढते फिरते। खैर हमें क्या। हम तो त्रिशंकु की बात कर रहे थे-- बस ज़रा सा भटक गए।) भैये जब विश्वामित्र मेनका को देख कर भटक सकते हैं तो हमारे जैसे मामूली बशर की क्या बिसात। हाँ तो हम कह रहे थे कि राजा साहब पहुँच गए स्वर्ग सशरीर। परन्तु वहाँ बैठे थे स्वर्गाधिपति इंद्र। ऐसे कैसे कोई पाकिस्तानियों की मानिंद सीमा का अतिक्रमण कर देव भूमि में प्रवेश कर पायेगा! उन्होंने एक लात-प्रहार किया और महाराजा को  नीचे धकेल दिया। अब धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से तो सभी परिचित हैं। सो राजा जी गिरे औंधे मुँह। पर भैया ऐसे कैसे गिर जाते? अहम् की विकर्षण शक्ति भी कम ताक़तवर नहीं। मान्यवर मुनि का अहम् आड़े आया और उन्होंने तुरन्त ब्रेक लगा दिया। अब राजा साहब ण्दृध्ड्ढद्धड़द्धठ्ठढद्य की भांति जल और वायु के मध्य विचरण करते रह गये। दो अपार महाशक्तियों के बीच की रस्साकसी में बेचारे त्रिशंकु अटक गये। इंद्र ऊपर आने ना दें और मुनि नीचे गिरने ना दें। भैया "मेरा बीच गले में अटका है दम, ना इधर के रहे, ना उधर के रहे।" साहबान! बहुत सारे मुहावरे दौड़े चले आ रहे हैं हमारे मन में -- "इधर कुआँ, उधर खाई", "बुरे फँसे", "डड्ढद्यध्र्ड्ढड्ढद क़्ड्ढध्त्थ् ठ्ठदड्ड ड्डड्ढड्ढद्र द्मड्ढठ्ठ" वगैहरा।
जाने दो साहब, यह सब धर्म-पुराण की बातें हैं जो हम और आप जैसे लोगों को सबक सिखाने के लिये गढ़ी गयीं हैं। भला क्या बिना मरे भी किसी ने स्वर्ग देखा है? इसीलिए जिहादी बम विस्फोट करके जन्नत नशीन हो जाते हैं - बहत्तर हूरों का आनंद लेने के लिए। अब उन्हें जन्नत नसीब होती है या जहन्नुम अल्लाह ही जाने; लेकिन उम्मीद पर दुनिया क़ायम है।
ओहो! हम फिर भटक गये। चलो वापस ट्रैक पर आते हैं तो साहबान,  कद्रदान, मेहरबान, मुद्दा ये है की हमारे बालक वृन्द भी गरीब, फटेहाल, दलिद्दर भारतवर्ष को छोड़कर दूसरी दुनिया (ढ़द्धड्ढड्ढदड्ढद्ध द्रठ्ठद्मद्यद्वद्धड्ढ), जहाँ कोई कमी नहीं, की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। इस सपनों की नगरी के लिये कितने ही पापड़ क्यों ना बेलने पड़ें --- हमारे जवान "क़दम बढाये जा ना डर" की पॉलिसी पर अमल करते हुये डड्ढढ़, डदृद्धद्धदृध्र्, द्मद्यड्ढठ्ठथ् कुछ भी कर के विदेश यात्रा का इंतज़ाम कर ही लेते हैं।
बाप कर्ज़ लेकर या प्रोविडेंट फंड से पैसा निकाल कर टिकट का बंदोबस्त कर देता है और स्वर्ग पहुँचकर साहबज़ादे येन, केन, प्रकारेण रोटी पानी का जुगाड़ कर लेते हैं। जूठे बर्तन धोना, जूता पॉलिश करना झाड़ू लगाना -- काम की कोई कमी नहीं है। काम मिल जाये तो पैसा मिल ही जाता है। यह बात और है कि स्वदेश में ऐसे काम करने से उनकी इज़्ज़त-हतक हो जाती है। यहां तो लोग पढ़ लिख कर "ये साला मैं तो साहब बन गया" की घोषणा कर देते हैं। वही लोग साहबों के देश में जाकर "ब्लडी इंडियन" बनने में कोई खराबी नहीं समझते। जाने दो भैये! हमारी यह बातें कम पढ़े-लिखे वर्ग पर लागू  होती हैं; क्योंकि इतना भी गया गुज़रा नहीं है हमारा देश। अरे यार, भारतीय स्कॉलर्स ने तो पूरे अमरीका को बंगलोर दिया (एठ्ठदढ़ठ्ठथ्दृद्धड्ढड्ड)। भारत के डॉक्टर, इंजीनियर पूरे विश्व  में  सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। तो फिर समस्या क्या है? शिकायत किस बात से है? समस्या यह है, माँई-बाप कि विदेश जाने वाले भारतवंशी एक द्यत्थ्र्ड्ढ-द्मथ्दृद्य में फंस जाते हैं। यानि जिस वक़्त ये देश को  छोड़ जाते हैं तब से लेकर आने वाले वर्षों में वे यह भूल जाते हैं कि समय की धारा का असर उनके स्वदेश पर भी हुआ है। जब वे वापस आते हैं तो ङत्द्र ज्ठ्ठद ज़्त्दत्त्थ्ड्ढ की तरह हर बदलाव को एक अजूबे की तरह देखते हैं। काफी समय लगता है उन्हें इस ड़द्वथ्द्यद्वद्धठ्ठथ् द्मण्दृड़त्त् से उबरने में। भारत की लड़कियाँ जीन्स और स्कर्ट पहन कर डेट पर जाने लगीं हैं- यह तथ्य उनके गले से नहीं उतरता। विदेश में रह कर भी अपनी लड़कियों को तो वे शुद्ध भारतीय ढंग से नज़र बन्द करके रखते हैं। डेट पर जाना, वैलेंटाइन डे मनाना तो पश्चिमी सभ्यता है, भारत की बेटी ऐसा कैसे कर सकती है (पश्चिम में रह कर भी)? भारत में लड़कियाँ अपना जीवन साथी स्वयं चुन रही हैं। लेकिन कनाडा तथा न्यूयॉर्क वासियों के बेटों के लिये आज भी रिश्ता भारत में ढूँढा जा रहा है- भारतीय नारी - सुकुमारी की तलाश जो है।
सच कहें तो भारत में रह कर हमने और हमारे बच्चों ने जो सीखा वह तो सीखा ही मगर टीवी और कम्प्यूटर से भी बहुत कुछ सीखा है। भारतवंशी विदेश में रह कर भी पुराने विचारों का बोझा (डठ्ठढ़ढ़ठ्ठढ़ड्ढ) छोड़ नहीं पाये। एक डर, बैताल की तरह, हमेशा इनकी पीठ पर सवार रहता है कि कट्टर भारतीयता को छोड़ कर कहीं वे डार से बिछड़े पत्ते की तरह आश्रयहीन ना हो जाएँ। अपनी जड़ों को पकड़े रहने की ज़िद ने उन्हें अपनी शाखाओं और पत्तों का विकास करने से सदा रोका। ऐसा हुआ है अपनी ज़मीन से अलग होने के कारण। च्र्द्धठ्ठदद्मद्रथ्ठ्ठदद्यठ्ठद्यत्दृद कई बार माफिक नहीं आता। हाँ ज़रूरत है डठ्ठथ्ठ्ठदड़ड्ढ की। आधुनिकता हो या पारंपरिकता, हमें दृध्ड्ढद्धडदृठ्ठद्धड्ड नहीं जाना चाहिये। समय के साथ चलने का नाम ही विकास है। आसमानों में उड़ना बहुत अच्छा है मगर लौटकर तो अपनी डाल - अपने नीड में ही है। वातावरण के अनुसार नीड़ के बदले हुये रंग रूप को भी स्वीकारना होगा ताकि ज़ोर का झटका ज़रा धीरे से लगे और ड़द्वथ्द्यद्वद्धठ्ठथ् द्मदृड़त्त् ज़्यादा मायूस ना करे।
छक्क् (छदत्ढदृद्धथ्र् क्त्ध्त्थ् क्दृड्डड्ढ)
हंगामा है क्यों बरसा क़ानून की बातों पे
हो जाते हैं शामिल हम भी इनकी  जमातों में
जी हाँ त्ढ न्र्दृद्व ड़ठ्ठदददृद्य ढत्ढ़ण्द्य  द्यण्ड्ढथ्र्, त्र्दृत्द द्यण्ड्ढथ्र्. कहने का मतलब यह है भैया कि हम कट्टरवादी मौलवियों से जीत नहीं सकते। अरे यार तुम सोये हुये को तो जगा सकते हो लेकिन सोने का नाटक करने वालों को कैसे जगा सकते हो? जो लोग मानना ही नहीं चाहते कि उनकी औरतें दुखी हैं- परेशान हैं उन्हें कोई कैसे समझाये? तो साहब मारो गोली छदत्ढदृद्धथ्र् क्त्ध्त्थ् क्दृड्डड्ढ (छक्क्) को। नहीं चाहिये हमें कानून में बदलाव। ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है शेख साहब! हमने कानून बदलने  की  ज़िद छोड़ी है, औरतों को इंसाफ दिलाने की नहीं। वह तो चाहिये ही। लड़ाई लड़ाई माफ़ करो बंदापरवर और औरतों को भी "झटपट तीन तलाक़" का हक़ दे दो। अरे बाबा इसमें मर्दों  का ही फायदा है। एक तो उनकी बीबियाँ उनसे परेशान होकर उनका खून (मर्डर) नहीं करेंगी (आदमियों को इसी वजह से तीन तलाक़ की सुविधा दी गयी है ना)। मर्द जहन्नुम नशीन होने से बच जायेंगे और ख़ातूने खून करने के इलज़ाम में फांसी चढ़ने  बच जाएँगी। वैसे भी औरतों का गुस्सा जग ज़ाहिर है। शेक्सपियर ने भी फ़रमाया है "क्तड्ढथ्थ् ण्ठ्ठद्यण् ददृ ढद्वद्धन्र् ठ्ठद्म ठ्ठ ध्र्दृथ्र्ठ्ठद द्मद्रद्वद्धदड्ढड्ड". उनकी दुर्गा और काली नाम भी सभी ने सुना है। बस भाई समझदार को इशारा काफी।
हमारी दूसरी मांग भी एकदम जायज़ है-- मौलाना साहब औरतों को भी एक से ज़्यादा शौहर रखने की इजाज़त होनी चाहिये। इससे वे अपनी ऐसी-वैसी इच्छाओं को पूरा करने के लिये घर से बाहर नहीं जाएँगी और घर की इज़्ज़त घर ही में रहेगी। देखो ना मियाँ बीबी दोनों खुश और मज़हब भी साबित सालिम - त्दद्यठ्ठड़द्य है ना सबका साथ, सबका विकास और सबका भला। यूँ भी एक पति घर का काम करे, दूसरा खूबसूरत सा बंदा बाहर पार्टियों में ले जाये, तीसरा प्यार करे और चौथा पैसे कमा के लाये -- आहा और क्या चाहिए जीने के लिये!
ड्रामेबाज़
भाई लोगों सिनेमा ने आकर बाइस्कोप तथा मदारी के तमाशे का बंटाधार तो कर ही दिया था लेकिन दूरदर्शन ने आकर तो रंगमंच को भी नेपथ्य में भेज दिया। लेकिन निराश होने की ज़रूरत नहीं है। कुछ महान कलाकार इस सांस्कृतिक परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। तालियाँ...। भारतीय राजनैतिक रंगमंच के द्यण्ड्ढद्मद्रत्ठ्ठद अर्थात मंजे हुये कलाकार हैं - ड्रामेबाज़ श्री पप्पू और गप्पू। दोनों में होड़ लगी रहती है कि "कौन कितना बड़ा मदारी है"। दोनों ही अपने विरोधी के बारे में अनर्गल भाषण देते रहते हैं। जब से देश का प्रधानमंत्री एक चायवाला बना है - और खूब बना है - बेचारे युवराज (कांग्रेस के उत्तराधिकारी) मान्यवर पप्पू से बर्दाश्त नहीं हो रहा है। वे भले ही वोट बटोरने के लिये दलितों के गुण गाएँ, आरक्षण की माँग करें; लेकिन एक नीचे तबके का आदमी एक राजकुमार को अपदस्त करके भारत का सिंहासन हथिया ले -- अपमान - घोर अपमान! तो मुहिम चला रखी है कि एक चायवाला कुछ सही नहीं कर सकता। ना तो वह सूट-बूट धारण कर सकता है (ये काम सिर्फ दादा नेहरू कर सकते थे), ना ही वह विदेश यात्रा पर जा सकता है (सिर्फ पप्पू जी 59 दिनों के लिये अंतध्र्यान हो सकते हैं)। इस चायवाले के एक मास्टर स्ट्रोक - सर्जिकल स्ट्राइक - से पप्पू लड़खड़ा गये और मुंह से बेसाख्ता "वाह" निकल गयी। चमचे हड़बड़ाए "प्रभु ये क्या किया - मोदी की तारीफ़? तौबा तौबा। साबुन से कुल्ला कीजिये।" फिर क्या था -- गलती सुधार (ड्डठ्ठथ्र्ठ्ठढ़ड्ढ ड़दृदद्यद्धदृथ्) आंदोलन जारी। "मोदी जवानों के खून की दलाली कर रहे हैं।" बालक राहुल खून की दलाली तो तुम्हारे दादाजान ने की थी। एक प्रधानमंत्री बनने के लिये हिंदुस्तान के दो टुकड़े करके। दो कश्मीर मसले को यूएनओ ले जाकर। खैर वो कहानी फिर कभी। साहबान राहुल तो अनपढ़ हैं मगर पढ़े-लिखे गंवार गप्पू जी का क्या किया जाय? अच्छे खासे एक बार मैदान छोड़ कर भाग गये थे कि बिल्ली के भागों छींका टूटा और लौट के बुद्धू घर को आये। दिल्ली वालों की मूर्खता और देश का दुर्भाग्य -- गप्पू जी फिर विराजमान हो गये दिल्ली के तख़्त पर और गद्दीनशीन होकर, देश की सुरक्षा को ताक पे रख कर सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांग रहे हैं। सबूत तो वे अपनी मूर्खता तथा अपनी गटर राजनीति का दे रहे हैं
दोस्तों! ना ही छींका बार-बार टूटता है, ना ही काठ की  हंडिया दोबारा चूल्हे पर चढ़ती है। वैसे भी (बकवादी) बकरों की माँ कब तक खैर मनाएगी। अगला चुनाव आने दो, पप्पू और गप्पू दोनों ही राजनीति के मंच से उतरकर नेपथ्य में चले जायेंगे। सद्भावना के साथ शब्बाखैर!

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