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त्रिलोक-परम्परा : एक दृष्टिकोण
01-Sep-2017 11:03 AM 2418     

अथर्ववेद, श्रीमद्भागवत तथा पुराण में त्रिलोक-परम्परा यानि कि तीन विश्व यथा भूलोक, पाताल और देवलोक की व्यापक रूप से चर्चा हुयी है। गायत्री महामंत्र की तीन व्याहृतियों भू: (पार्थिव जगत), भुव: (प्राणमय जगत) एवं स्व: (मनोमय जगत) में इस त्रिक के विस्तार में व्याप्त अखिल विश्व को अक्षरों के संक्षिप्त संकेतों में समेटने का भी प्रयास किया गया है। इस लेख का अभिप्राय आधुनिक विज्ञान की आयामी (dimensional) मान्यताओं के प्रकाश में परखकर इन लोकों (मत्र्य-लोक, आत्मा-लोक तथा ब्रह्म-लोक) को समझने का प्रयास करना है।
साधारण शब्दों में अगर कहें तो संसार, भूलोक या मत्र्य-लोक (gross plane) में पुरुष (individual soul) एवं प्रकृति (nonbeing) के सहयोग से उपजी सृष्टि निवास करती है जिसका हर जड़-चेतन रूप जन्म-मरण-जन्म के चक्र में सतत बँधकर चलता रहता है। यहाँ संसार या भूलोक का अर्थ पृथ्वी के अर्थ से हटकर है। इसका मतलब उस विश्व से है जिसका विस्तार परमाणु-खण्डों के सूक्ष्मतर अन्तरिक्ष से लेकर ब्रम्हाण्ड (universe) के अनन्त छोरों तक फैला हुआ है। इसमें अणु-परमाणु तथा उनसे भी सूक्ष्म जगत के साथ-साथ ग्रह, नक्षत्र, निहारिका, आकाश-गंगा या उनके समूह आदि सभी दृश्य-अदृश्य अखिल विश्व आते है; इस विशाल वर्ग में हमारी पृथ्वी की स्थिति धूल के एक कण की तरह है। इस निबन्ध में, ऐसे संसार को हम मत्र्य-लोक कहेंगे क्योंकि अन्य समानार्थी शब्दों यथा संसार अथवा भू-लोक का एक अंतर्निहित अर्थ है। आज का विज्ञान गणितीय सूत्रों को आधार बनाकर एवं प्रायोगिक परीक्षणों द्वारा इस मत्र्य-लोक के स्वरूप तथा आकार को कुछ-कुछ जानता और पहचानता है। न्यूटन, आइन्स्टाईन, तथा "स्ट्रिन्ग-थियरी" ने इसे अपने-अपने ढंग से समझाया है और इसका विवरण हम आगे के पैराग्राफ़ों में देंगे।
भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आत्मा (जीवात्मा) का निवास-स्थल पाताल या मध्य-लोक (subtle पिछले अनेक-जन्मों के अनुभवों का एक पिटारा प्रदान करती हैं और उसने उसी कोष का उपयोग किया। आत्मा-लोक में समय (time), माईकल न्यूटन के अनुसार, भूत, वर्तमान तथा भविष्य की एक-रूप (homogeneous) इकाई में है; यह न तो रैखिक (linear - Western philosophy) है और न ही वृत्ताकार (circular  -
Eastern pholosophy) है; तथा पुनर्जन्म के वक्त आत्मा "कार्यों के लिए कारण और प्रभाव के नियम" (law of cause and effect) का पालन करता है ।
देवलोक (ऊध्र्व लोक - ड़ठ्ठद्वद्मठ्ठथ् द्रथ्ठ्ठदड्ढ) की अवधारणा - जहाँ ब्रह्म अथवा परमात्मा का निवास है - एक ऐसी दुनिया को बताता है जहाँ स्तिथ-प्रज्ञता है, चिर-शान्ति है, और जहाँ "स्पेस-टाईम" की सभी इकाईयाँ अस्तित्व-रहित हैं या उनका अभाव है। ईश-उपनिषद् ब्रह्म को "तदेजति तन्नैजति तद् दूर तद्वन्तिके, तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:" (It moves and it moves not; It is far and It is near; It is within all this and It is also outside all this) कहा है। उपनिषदीय मान्यताओं के अनुसार जीवात्मा तथा प्रकृति सभी ब्रह्म से अनुप्राणित, प्रेरित और शक्तिमान होकर कार्यक्षम होते हैं। परमात्मा (ईश्वर), जीवात्मा तथा शरीर का सम्बन्ध सरल ढ़ंग से समझाते हुये मुण्डक-उपनिषद् कहता है - "Two birds, companions (who are) always united, cling to the self-same tree. Of these two, the one (attached) eats the fruits of the tree and the other (free) looks on without eating." यहाँ ईश्वर और जीवात्मा दो समान-धर्मी पक्षियों की तरह हैं और पेड़ शरीर (प्रकृति) का प्रतीक है। इस तीसरे संसार को हम "ब्रह्म-लोक" कहेंगे क्योंकि पाताल की तरह द्युलोक अथवा ऊध्र्व लोक भी अपने रूढिगत अर्थ से ग्रस्त है और प्राय: हम इसे धरती के ऊपर आकाश की अनन्त ऊँचाईयों में कहीं स्थित मानते हैं।
भौतिक वैज्ञानिक न्यूटन ने, वर्ष 1687 में, सर्वप्रथम मत्र्य-लोक के आकार को चार आयामों (4-dimensions) से परिभाषित कर इसके स्वरूप को समझाने का प्रयास किया। इनमें तीन लम्बाई, चौड़ाई, और ऊँचाई प्रसार-दिशा या दिक् (space) सूचक हैं तथा एक काल या समय (time) का प्रतीक है। अगर हम समुद्र तल से पहाड़ की चोटी पर जायें तो यह स्थान परिवर्तन प्रसार-दिशा सूचक इकाईयों में दर्शाया जा सकता है। उसी तरह, घर में चुपचाप बैठे, सुबह से शाम के बदलाव का बोध समय की इकाई देता है। आम-जन इन इकाईयों में विविधता अथवा इनकी स्थिरता आसानी से समझ और देख सकते है। न्यूटन ने दिक् सूचक आयामों का विस्तार सारे ब्रह्माण्ड में एक-सा माना। इसका अर्थ यह हुआ कि अणु-परमाणु तथा उनसे भी सूक्ष्मतर वस्तुओं के आकाशों के साथ-साथ ग्रह, नक्षत्र, निहारिका, आकाश-गंगा, आदि सभी दृश्य-अदृश्य विशालतम जगत में इस आकाशीय तत्व (अर्थात् चार-आयामों) का विस्तार अटल और अपरिवर्तनशील है। न्यूटन का यह सिद्धान्त भौतिक शास्त्र के अनेक नियमों को (जिन्हें हम बहुधा प्रयोग करते हैं) समझने के लिये आज भी अति-आवश्यक है; यद्यपि, आइन्स्टाईन ने अपने मत के प्रतिपादन में इस मान्यता को नकार कर एक लचीलेे स्पेस-टाईम का सिद्धान्त दिया है। साधारण शब्दों में कहें तो न्यूटन का अटल-अंतरिक्ष-संबंधी नियम जगत को एक दृढ़ ़गलीचे-सा बतलाता है, जबकि आइन्स्टाईन इस गलीचे में लचीलेपन के कारण सिकुड़न भी है की बात समझाते हैं। दिक्-सूचक आयामों की झुकी-मुड़ी लड़ियों से बने आइन्स्टाईन के ब्रह्माण्ड की अवधारणा से लम्बी दूरियों को, विशेषत: आकाश-गंगाओं के अन्दर और उनके पार की संरचना, समझने में नयी दिशा मिली तथा ब्रह्माण्ड-विज्ञान में "ब्लैक-होल" तथा "डार्क-इनर्जी" जैसे नये अध्यायों का आरम्भ हुआ। आइन्स्टाईन ने यह भी बतलाया कि "स्पेस" और "टाईम" दोनों ही सापेक्ष तथा अ-स्वतन्त्र हैं; इनका लचीलापन इसलिये है कि प्रकाश की गति स्थिर बनी रहे; अत: वही अनपेक्ष या परम हुआ। अर्थात् प्रकाश की गति वह है जिसमें ठहराव-सी गति है ।
विगत कुछ वर्षों में, गणितीय सूत्रों पर आधारित "स्ट्रिन्ग-थियरी" की विचारधारा ने "स्पेस" के एक और रूप को उद्घाटित किया। यहाँ हम M-Theory (जो स्ट्रिन्ग-थियरी का अधिक मान्य अंग है ) का उदाहरण लेंगे। साधारण भाषा में, इस सिद्धान्त के अनुसार आइन्स्टाईन का "स्पेस-टाईम" रूपी "गलीचा" लपेटा या मोड़ा भी जा सकता है। ऐसा करते हुये यह चार-आयामी वाला ब्रह्माण्ड ग्यारह-आयामी वाले आकार में ढ़ल जाता है। M-Theory द्वारा प्रतिपादित सम्पूर्ण-अन्तरिक्ष के इस ग्यारह-आयामी दिक्-काल में दो चार-आयामी दिक्काल हैं और इन्हें मिलाकर रखने वाली एक तीन-आयामी सतह (surface) है। इस तरह चार, चार, तथा तीन आयामों को मिलाकर सम्पूर्ण-अन्तरिक्ष के कुल ग्यारह-आयाम बनते हैं। इस लेख में, मैं पहले चार-आयामी संसार को जिसे न्यूटन तथा आइन्स्टाईन ने समझाया था और बाद में जो M-Theory का भी एक हिस्सा बना, मत्र्य-लोक कहूँगा। इसका "स्पेस-टाईम" व्यवहार वैज्ञानिक तथ्यों तथा प्रायोगिक परीक्षणों पर आधारित है। यह सापेक्षता के सिद्धांत को मानता है और इसका वर्णन ऊपर किया जा चुका है। दूसरा चार-आयामी संसार आत्मा-लोक की तरह है जहाँ "स्पेस-टाईम" का अस्तित्व तो है पर इसका आचार या व्यवहार हमारी धारणाओं से हटकर है। मनोवैज्ञानिक माईकल न्यूटन के ग्राहकों ने भी इसके स्वरूप को कभी वक्र, कभी समझ के परे, तो कभी इस प्रश्न के उत्तर में अपनी ख़ामोशी से दी है। हाँ, उन सभी ने एक बात अवश्य स्वीकार की। वह यह कि मत्र्य-लोक से आत्मा-लोक की यात्रा उन्हें एक सूराख के ज़रिये प्रकाश-जैसी चमकदार वस्तु के आकर्षण या खिंचाव में करनी पड़ती है। तीन-आयामों वाला तीसरा लोक "ब्रह्म-लोक" की तरह है। यहाँ "टाईम" की भूत, वर्तमान, तथा भविष्य की इकाई का अभाव है और "स्पेस" की इकाईयाँ निरपेक्ष भाव से एकरूप होकर मुण्डक-उपनिषद् के कथनानुसार आत्मा तथा प्रकृति (अथवा मत्र्य-लोक और आत्मा-लोक) के बीच कड़ी का काम करती हैं। यह सच है कि आत्मा-लोक तथा ब्रह्म-लोक की सही पहचान के लिये अवचेतन मन में ही झाँकना होगा। यह गणित के सूत्रों सहायता से कभी भी हल नहीं होगा। उपनिषदों में यह बात बार-बार समझायी गयी है कि हमारे अन्दर, मस्तिष्क की गहरी परतों में, सम्म्पूर्ण ब्रह्माण्ड का रहस्य छुपा हुआ है। गणेश और कार्तिकेय की वह कथा जिसमें गणेश अपने माता-पिता की परिक्रमा कर (अर्थात् अपने अन्दर जाकर) समष्टि को जानने के प्रयास में विजयी बनते हैं जबकि कार्तिकेय ब्रह्माण्ड भ्रमण करने के बाद भी इसके ओर-छोर का पता नहीं लगा पाते और हार का सामना करते हैं - उपनिषदीय प्रसंग की सार्थकता का एक सुन्दर उदाहरण है।
M-Theory ने भी संभावनाओं के अनेक द्वार खोले हैं। इसने न केवल "अनेक" अन्तरिक्ष (multiverse) की सम्भाव्यता की बात उठाई, बल्कि ‘ध्र्दृद्धथ्र् ण्दृथ्ड्ढ यानि ऐसे सूराखों की भी चर्चा की जिनके माध्यम से इन ब्रह्माण्डों के बीच क्षणों में यात्रा के लिये सुगम रास्ते का सुझाव मिलता है। ध्यान दें, एक मुड़े हुये गलीचेे में दो दूर के किनारे इतने पास-पास हो जाते हैं कि परस्पर मिले हुये दिखायी पड़ते हैं - worm hole उसी अवधारणा का सूराखी रूप है। मत्र्य-लोक से आत्मा-लोक की यात्रा में, मनोवैज्ञानिक माईकल न्यूटन के ग्राहकों से, किसी तरह के सूराख होने का वर्णन मिलता है। पुराणों में भी, सूराख तो नहीं, पर संक्षिप्त-पथों का जिक्र हुआ है। उदाहरणार्थ, गरुण पुराण इस रास्ते का वर्णन अतिश्योक्तिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
विझान की परम्परा में परिकल्पनाओं को प्रयोग द्वारा सत्यापित अथवा परख करने के बाद बाद ही स्वीकार किया जाता है। इस दृष्टि से M-Theory को "अनुमान" ही कहा जा सकता है। लेकिन, यह भी सच है कि यह गणित के सहयोग से प्रतिपादित सिद्धान्त है। अगर लघु से विशाल तथा विशालतम अन्तरिक्ष की तरफ कदम बढ़ायें तो पहले न्यूटन द्वारा इंगित, फिर आइन्स्टाईन द्वारा चिह्नित और अन्तत: M-Theory द्वारा प्रतिपादित आकाशों के गुण-धर्म परिलक्षित होंगे। करीब दो सौ वर्षों तक न्यूटन का "स्पेस" सर्वमान्य रहा और आज भी इसकी उपयोगिता कमतर नहीं है। आइन्स्टाईन ने इसमें गणितीय आधारों को लेकर बदलाव सुझाये थे, जो अब तकनीकी विकास के बाद प्रयोगों की परख द्वारा सत्यापित हो रहे हैं। भविष्य में शायद वह दिन आये जब अनेक अन्तरिक्ष (multiverse) तथा worm hole जैसे सूराखों का उसी तरह सत्यापन हो पाये जैसे आज "ब्लैक-होल" एवं "डार्क-इनर्जी" की स्थापना होती है ।

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