ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
तू मेरी पीठ खुजायेगा मैं तेरी पीठ खुजाऊँगा
01-Oct-2016 12:00 AM 3564     

यह बात सही है कि हिंदी में अच्छे लेखकों की कमी नहीं, कमी है तो पाठकों की। दरअस्ल पाठकों की कमी का एक कारण ख़ुद लेखक ही हैं। लेखकों के कई खेमें हैं, खेमों में बंटे होने से लेखक अपने खेमे के लेखक की रचना ही पढ़ना पसंद करता है और इस शेर को साकार रूप दे रहा है -
तू मुझसे राहत पायेगा मैं तुझसे राहत पाऊँगा
तू मेरी पीठ खुजायेगा मैं तेरी पीठ खुजाऊँगा
कई नए अच्छे लेखक इसके शिकार हो रहे हैं। जब वरिष्ठ लेखक ही नए लेखक की अच्छी रचना को हाशिये में डाल देता है तो उसको पढ़ने की पाठक की रुचि कहाँ रहती है?
मेरा एक मित्र है। वह कहानीकार है, अच्छी कहानियाँ लिखता है लेकिन वरिष्ठ कहानीकारों और आलोचकों में उसकी साख अब तक नहीं बन पायी है। बेचारा निराश है। निराश भला क्यों न हो? एक वर्ष पहले उसने एक प्रकाशक को पच्चीस हज़ार रुपये देकर अपनी चुनिंदा दस कहानियाँ का संग्रह छपवाया था। थोड़ी-थोड़ी जान-पहचान वाले उसके कुछेक "वरिष्ठ" लेखक और आलोचक थे। हर एक को उसने बड़े शौक से अपने कहानी संग्रह की एक-एक प्रति भेजी थी। समीक्षार्थ कई पत्रिकाओं के सम्पादकों को भी प्रतियाँ भेजना वो नहीं भूला था। डाक खर्च बहुत हो गया था।
दो महीने बीत गए लेकिन किसी वरिष्ठ कहानीकार और आलोचक का पुस्तक-प्राप्ति का छोटा सा टुकड़ा भी नहीं मिला उसको। निराशा की स्थिति में उसने हर एक को फोन किया। सबने उसके कहानी संग्रह को पढ़ न सकने का कोई न कोई बहाना किया। किसी ने कहा - "मैं अत्यधिक व्यस्त हूँ, व्यस्तता दूर होते ही पढ़ूँगा।" किसी ने कहा - "मैं बिस्तर पर बीमार पड़ा हूँ, स्वस्थ होते ही पढ़ूँगा।"
हालांकि उसने एक सप्ताह पहले ही एक गोष्ठी में कहानी पाठ किया था। किसी ने साफ़-साफ़ ही कह दिया था - "मैं केवल चर्चित कहानी ही पढ़ता हूँ।" किसी एक पत्रिका ने भी उसके कहानी संग्रह की अच्छी या बुरी समीक्षा नहीं छापी। एक-दो पत्रिकाओं में उसने विज्ञापन भी दिया था लेकिन पुस्तक की आठ-दस प्रतियाँ ही बिक पायीं। आजकल फुरसत में वो अपनी कहानी ख़ुद ही पढ़ता है। कुछ दिन पहले मैंने उससे पूछा - "किसकी कहानी पढ़ रहे हो?
"अपनी कहानी पढ़ रहा हूँ।"
"अपनी कहानी क्यों?"
"और कोई पढ़ने वाला नहीं है।"
भारत में मेरे मित्र जैसे असंख्य लेखक हैं जिन पर शायद ही कोई वरिष्ठ लेखक, आलोचक या सम्पादक ध्यान देता है। हर साल सैकड़ों संग्रह और संकलन प्रकाशित होते हैं। उन पर ख़ूब धनराशि ख़र्च होती है। अधिकाँश संग्रह और संकलन दीमकों और कूड़ेदानों के हवाले हो जाते हैं।
मैंने मित्र को ढाढ़स दिया - "देखो, हिंदी साहित्य में तो अब चलती का नाम गाड़ी है। अच्छे-अच्छे साहित्यकारों को भुला दिया जाता है। अब तो कोई विश्वम्भर नाथ कौशिक, पंडित सुदर्शन, वृंदावन लाल वर्मा, इलाचंद्र जोशी, बेचन शर्मा उग्र, राजेंद्र अवस्थी को याद नहीं करता है। एकाध को छोड़कर किसी का स्मारक नहीं है। प्रायः सभी मठाधीशों ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी है। हाथी के दाँत खाने को और दिखाने को और। हिंदी के एक लेखक थे - गुरुदत्त। उन्होंने एक सौ अधिक उपन्यास लिखे थे, उनके प्रति आलोचकों के एक वर्ग की उपेक्षा सर्वविदित है। हिंदी के कथा लेखक शैलेश मटियानी के प्रति भी कइयों का अवहेलनापूर्ण रवैया सब जानते हैं।
हमारे समकालीन वरिष्ठ साहित्यकार एक-दूसरे के प्रति कितनी निष्ठा रखते हैं, यह बात किसी से छिपी हुयी नहीं है। इंगलैंड में कई वरिष्ठ साहित्यकारों का आना-जाना रहता है। उनके देखने वाले स्थलों की सूची में स्ट्रेट अपॉन एवोन में शेक्सपियर का घर अवश्य ही होता है। उनसे पूछो कि क्या कभी प्रेमचंद का स्मारक भी देखा है? जवाब हमेशा यही मिलता है- "देख लेंगे कभी।"
उनके हाथों में किसी न किसी विदेशी लेखक की पुस्तक अवश्य होती है। उस पुस्तक की प्रशंसा में वे ज़मीन-आसमान एक कर देते हैं। किसी हिंदी लेखक की पुस्तक की प्रशंसा में उनके मुँह एक शब्द भी नहीं निकलता है। उनसे पूछो- "क्या आपने रूपसिंह चंदेल का उपन्यास "गलियारे" या सूरज प्रकाश का उपन्यास "देश बिराना" पढ़ा है?" जवाब मिलता है - "अभी नहीं, फुरसत में पढ़ेंगे।" हज़ारों मील दूर इंग्लैंड के साहित्यकारों के स्मारक देखने और विदेशी पुस्तकें पढ़ने के लिए उन्हें फुरसत है, लेकिन हिंदी की ताजा पुस्तकों के प्रति उनकी उदासीनता को क्या जाये।

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