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ये आकाशवाणी है...
01-Feb-2019 02:13 PM 2286     

सुना है कि पिछले बत्तीस सालों से संध्याकाल छह बजे से प्रातःकाल छह बजे तक चलाया जा रहा ऑल इंडिया रेडियो का कार्यक्रम अब बंद किया जा रहा है। इस रेडियो चैनल पर उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में भी जो नाटक, कविता और वार्ताओं के रोचक कार्यक्रम प्रसारित किये जाते रहे, वे इस दृष्टि से तैयार किये जाते थे कि दिनभर काम करते थके हारे किसान, सीमा पर मुस्तैद सैनिक, मजदूर और छात्र इन कार्यक्रमों से जुड़कर राहत की साँस ले सकें। आकाशवाणी के कवि सम्मेलन, शास्त्रीय संगीत की सभाएं और मुशायरे, वर्षों से श्रोताओं के बीच लोकप्रिय रहे हैं। आकाशवाणी के रेडियो नाटक का तो क्या कहना, ऑल इंडिया रेडियो ने वर्षों अनेक नाटकों के माध्यम से भाषा को अभिनीत किया है। इन नाटकों को सुनकर ऐसा लगता था कि जैसे सब कुछ आँखों के सामने घट रहा है, जबकि वह सिर्फ कानों से सुना जा रहा है। यहां यह बात भी गौर करने की है कि वर्षों से ऑल इंडिया रेडियो ने हिंदी भाषा की शुद्धता और उसके उच्चारण का भी बहुत ख्याल रखा है। जो लोग नियमित समाचार सुनते रहे हैं उन्हें अशोक वाजपेयी, देवकी नंदन पाण्डे और इंदु वाही जैसे समाचार वाचकों की आवाज़ की अभी भी याद होगी। भले ही ऑल इंडिया रेडियो पर न सही, रेडियो के माध्यम से अमीन सयानी की आवाज को कौन भूल सकता है। रेडियो पर हॉकी मैच की कमेंट्री इस तरह होती रही है कि सुनने वाला श्रोता यह महसूस कर पाता था कि वह खुद ही मैच खेल रहा है। कुल मिलाकर कहने का मतलब यह कि वाणी में वह शक्ति है जो दृश्य उपस्थित कर सकती है। रेडियो ने देश के जीवन में यही काम किया है।
आज टेलीविजन चैनलों पर सचित्र आकर्षण बहुत बढ़ गया है, पर अगर सचमुच देखा जाये तो वहाँ प्रभावकारी आवाज़ अब बहुत कम सुनाई पड़ती है। शोर इतना है कि उसमें शब्द ढूंढे नहीं मिलते और स्क्रीन की सतह पर इतने चित्र तैरते हैं कि उनमें सच की गहराई का पता नहीं चलता। हमें इस बात पर विचार करना चाहिये कि दुनिया दर्शनीय होने के भुलावे में कहीं शब्दहीन और अर्थहीन तो नहीं होती जा रही है। क्योंकि दृश्य लुभाता है और शब्द अपने अर्थ के साथ जीवन की गहराई में उतरता है। शब्द हमारी आत्मा का हिस्सा है और चित्र मन की सतह पर तैरकर अक्सर लोप हो जाया करते हैं।
हमारे देश में धरोहर को दीर्घकाल तक बचाये रखने का हुनर किसी को नहीं आता। लोग पूर्वजों के पीतल के बर्तन कबाड़ियों को बेचकर उसके बदले में स्टील के बर्तन खरीद लेते हैं। ऑल इंडिया रेडियो ने इस देश की बहुत सारी मूल्यवान आवाज़ों को बचाया है। अगर हम उसकी रात्रकालीन शास्त्रीय सभाओं को याद करें तो भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी, पंडित कुमार गंधर्व, पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर जैसे अनेक महान संगीतकारों की आवाज़ें आकाशवाणी के संग्रहालय में मौजूद हैं जिन्हें बार-बार सुना जा सकता है। पता नहीं अब वे किस आर्काइब सेंटर में धूल खाने लगेंगी और दुर्भाग्य से ऐसा न हो कि ये आवाज़ें सदा के लिये हमसे दूर चली जायें। हमें आज भी आश्चर्य होता है कि इलाहाबाद आकाशवाणी के पास हिंदी के महान आधुनिक कवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की आवाज़ नहीं है। अब हम कभी नहीं जान पायेंगे कि निराला अपनी महान कविता - राम की शक्ति पूजा, संध्या सुंदरी, वन बेला, जुहू की कली और सरोज स्मृति का पाठ किस तरह करते थे। यह ठीक है कि पहले भी आकाशवाणी ने अपने आर्काइब से अनेक संगीतकारों के संगीत की रिकार्डिंग्स को सीडी के रूप में जारी किया था जिसमें मल्लिकार्जुन मंसूर, एमएस सुब्बलक्ष्मी आदि संगीतकार शामिल थे, पर आज तक कवियों की रिकार्डिंग्स पर कोई सीडी जारी की गई हो इसका पता नहीं चलता, जबकि उसके संग्रह में सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, रामधारीसिंह दिनकर आदि अनेक कवियों के कविता पाठ अभी भी सुरक्षित होंगे।
सुनने में यह भी आता है कि खर्चे को कम करने के लिये ऑल इंडिया रेडियो पर शाम से लेकर सुबह तक चलने वाले कार्यक्रमों को बंद किया जा रहा है। अगर हमारे देश के नेतागण अपनी आम सभाओं के मँहगे मंचों के खर्च में थोड़ी-सी भी कटौती कर दें तो उससे बचे हुए धन से आकाशवाणी के ये कार्यक्रम चलाये जा सकते हैं। सरकार के अनेक प्रतिष्ठानों की तुलना में आकाशवाणी कोई बहुत बड़ी संस्था नहीं है, फिर क्या कारण है कि उसके काम को बाधित किया जा रहा है। लगता है कि आज दुनिया में आवाज़ उठाने की जगहें कम हो रही हैं और शोर मचाने की जगहें बढ़ रही हैं। नये-नये रेस्त्रा, बॉर, कार्निवाल, मेले, अंग्रेजियत से भरे लिटरेरी फेस्टिबल, नेताओं की सभाएँ ये शोर मचाने की जगहें नहीं हैं तो और क्या हैं? आपस में बात करने के लिये कभी कॉफी हाउस में भी जगह मिल जाती थी, लेकिन अब वे भी शोर से भर गई हैं। पार्कों में भी जगह मिल जाती थी, पर अब वहां बैठने की जगह ही नहीं बची है। लेकिन रेडियो एक ऐसा साधन है कि भले ही कहीं जगह न मिले उसको हम अपने हाथ में लिये हुए कितने ही दूर तक पैदल चल सकते हैं और वो अपनी आवाज़ से हमारा साथ दे सकता है। इस चकाचौंध और शोर से भरी दुनिया में आवाज़ लगाने के लिये आज भी रेडियो की विश्वसनीयता कम नहीं हुई है।
हिंदी की सुप्रतिष्ठित लेखिका श्रीमती कृष्णा सोबती का 25 जनवरी 2019 को दिल्ली में निधन हो गया। वे 94 वर्ष की थीं। पिछले 70 वर्षों से वे हिंदी के परिदृश्य पर एक अप्रतिम लेखिका के रूप में स्थापित हुईं। उनकी भाषा हिंदी और पंजाबी के लोक व्यापार और जीवन के रस में पगी हुई थी। वह कोरी खड़ी बोली नहीं थी, उसकी लोकरंगी मिठास, कृष्णा जी के रचे पात्रों में घुली-मिली रहती थी। जो लोग भी कृष्णा सोबती की सोहबत में आये हैं वे उनके मुरीद हुए बिना नहीं रहे हैं।
बादलों के घेरे, तिन पहाड़, डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, सूरजमुखी अँधेरे के, ऐ लड़की आदि कृतियों तक का जो सफर कृष्णा जी ने तय किया वह उनके लेखन की गंभीरता और कलात्मकता को ही प्रकट करता है। यह उल्लेखनीय है कि अपनी विभिन्न कथाकृतियों और उपन्यासों के माध्यम से कृष्णा सोबती ने संस्कृति, संवेदना और भाषा शिल्प की दृष्टि से हिंदी साहित्य को बीसवीं सदी में एक नयी व्यापकता प्रदान की। उन्होंने बने बनाये साँचे-चौकटे अस्वीकार किये और अपनी रचना को एक नये रूपाकार में जन्म देने की भूमिका निभाई। कृष्णा जी मानती रहीं कि उनके लिये एक रचनाकार के रूप में उनकी रचना भी एक जीवित सच्चाई है।
कृष्णा जी एक लेखक होने के साथ-साथ अपने सामाजिक सरोकार को निभाने में भी कभी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, असहिष्णुता और राजनैतिक मतान्ध कट्टरता के प्रति भी यथासमय अपनी आवाज़ उठाने में कोई गुरेज नहीं किया। हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर उनका निर्भीक व्यक्तित्व सदा निर्विवाद रूप से आदरणीय रहा है।

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