ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
फिर एक तूफ़ान
01-Jan-2018 05:16 PM 1519     

बरसों बरसों पहले
जब मैं आप्रवासी नहीं था

बड़े उजले भेस में
आई थी एक काली आँधी
उखाड़ती अनगिन पनपते पौधे
और वटवृक्ष भी
उजाड़ती कितने ही गाँव, शहर

धीरे-धीरे फिर रोपे गए
नए पौधे
इस आस के साथ
कि वे एक दिन वृक्ष होंगे

ईंट-ईंट करके
बसाई गईं नई बस्तियाँ


और अब फिर बरसों बाद
जब मैं आप्रवासी हूँ
अब भी
एक नए, लेकिन
वैसे ही उजले भेस में
आ घिरा है
एक अँधा तूफ़ान

जैसे आँधी चली गई
जाएगा तूफ़ान भी

लेकिन काल
घोषित आपात का हो
या धर्म के नाम पर फैलाई गई मूर्छा का
सत्ता के खेल में
हमेशा शिकार होंगी
फलने-फूलने की राह तकती
नन्ही कोंपलें?
वृक्ष बनने की आस लिए
नए पौधे?
और खंडहरों में से उभरती
नई बस्तियां?

 

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