btn_subscribeCC_LG.gif
उनके बोल
01-Jun-2019 01:14 AM 1524     

वे लोग गाँव में घर की दूसरी मंजिल की छत पर चढ़ आये थे। इन लोगों में से किसी ने भी अपने जीवन में, भानु के घर की दहलीज के भीतर, कभी कदम नहीं रखा था। फिर भी सभी बड़े आधिकारिक भाव से अपना अपना पक्ष रख रहे थे। गली में सहज रूप से चुप्पी भी सहमी-सहमी सी महसूस हो रही थी।
सभी अपने अपने तर्क दे रहे थे। समाज की व्यवस्था को साधने की जिम्मेदारी उन्हीं की मुट्ठी में थी। उनसे बड़ा गाँव की चारदीवारी में कोई नहीं है। उनके तर्कों को चुनौती देना सामाजिक बहिष्कार की पटरी पर बैठा सकता है।
इन सब पग्गड़धारियों के बीच, सतरह बरस का भानु अपनी बात को, सलीके से पंचों के सामने रख रहा था। हर बार किसी पग्गड़धारी की पंचनामे की बात सामने आती या फिर कोई जीता जागता पंचनामे का कमरतोड़ उदाहरण सामने आता। पंचनामे को फिर-फिर लपेटकर कहने वालों व उनकी हाँ में हाँ मिलाने वालों की गम्भीरता हर बार चौगुनी होती जा रही थी। इस बात में इतना दम लग रहा था कि शायद शेर की दहाड़ में भी इतना दम न हो। यह एक ऐसी बहस चल रही थी, जिसमें सभी विजेता थे, केवल भानु को छोड़कर।
कुछ लोग मुँडेर पर जम चुके थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे ये मुँडेर पर जमे लोग, दशकों से, इन मुँडेरों से चिरकाल से परिचित हैं। यहाँ से उठकर जाने की भी कोई जल्दी नहीं है। जायेंगे तो अपनी बात मनवा कर ही।
मुँडेर पर बैठे दो एक मनचले तो पनिहारिन के सिर पर दोघड़ को देख, पानी से भरे मटकों से अपनी तुलना कर, विधुर-पीड़ा से कराह रहे थे। दोघड़ नवविवाहित के सिर तक उसकी छाती को छूते हुए कैसे ऊपर पहुँची होगी - यही एक ख्याल, उनकी देह में दामिनी की चमक को उनके चेहरों तक पहुँचा गया।
गली से गुजर रही महिला के सिर पर, दूध की बाल्टी को देख, दूधवाली का पूरा दूध पी जाने की मनचलों की चिचोरियाँ अपनी भी अपने चर्म पर थी।
एक व्यक्ति जो कि गाँव का नहीं था, एक आसमानी रंग का अन्तरदेशीय-पत्र हाथ में लिए था। बाद में पता चला कि वह मलखान की घरवाली का भाई है। यह आसमानी रंग का लिफाफा, एक से दूसरे हाथ, घूम रहा था। मजेदार बात यह थी कि हर कोई उसे पढ़ता और अगले, पढ़ने की रुचि रखने वाले को, थमा देता था - बिना एक भी अक्षर का उच्चारण किये।
भानु इस लिफाफे के, एक से दूसरे हाथ बदलते परिदृश्य को और इस लिफाफे के पाठक के चेहरे पर आते जाते भावों को बड़ी उत्सुकता के साथ, नजरें गड़ाकर देखता रहा। जब तक कि वह आसमानी रंग का कागज उसी अनजान व्यक्ति के हाथ में वापिस आ, तुड़मुड़कर उसके कुर्ते की सामने वाली जेब में, सिमट गया।
-------
भानु अपने गाँव से, कुछ घर जरूरत की खरीद के लिए शहर जाने के लिए बस अड्डे पर आ गया। बस अड्डे पर उसकी मुलाकात सुभान से "जयराम जी की" के साथ हुई।
शहर जाने के लिए बस आयी जो कि मलखान की थी।
मलखान ने देखकर, सुभान को बोनट पर बिठाया।
फिर बस के अगले दरवाजे के साथ बाँयें, लम्बी सीट पर, भानु के लिए, सवारियों से सिकुड़कर जगह बनाने के लिए आदेशात्मक निवेदन किया।
सब सवारियों ने क्षण भर में भानु के बैठने के लिए जगह बना दी।
भानू जब किराया देने लगा तो मलखान ने दस रुपये के नोट को मुस्कुराते हुए वापिस भानू की कमीज की जेब में दफन कर दिया।
बसें चलती थी उसकी। नाटा कद, बड़ा ढ़बली गोल पेट, उसका गोल चेहरा, उभरी मूँछें और ओठों के तले से उठती जबरदस्त मुस्कान। यह थी व्यक्तित्व की विशेषता मलखान की।
हाँ, मुटापे के कारण उसकी आँखों पर इतनी चर्बी चढ़ी हुई थी कि जब वह उदास होता तब भी आँखों पर मुस्कुराहट बराबर बनी रहती। मलखान के व्यक्तित्व का यह पहलू ठीक वैसे ही था जैसे किसी महिला का खसम दाँतला हो तो पत्नी को उसके हँसने का पता चले न रोने का!
भीड़ भरी बस में कण्डक्टरी करते समय वह बस के बीचोंबीच लगे लोहे के खम्भों पर झूल जाता था जैसे कोई सर्कस की सीढ़ियाँ हों। उसके एक पहुँचे में नकदी व टिकिट का हरा थैला लटकता। दूसरे हाथ से लोहे के पाइप को पकड़ शरीर को साधता। रास्ता बनाने के लिए मुस्कान तीसरे हाथ का काम करती। यही मलखान के चेहरे पर झूलती मुस्कान, सवारी से किराया माँगने की जरूरत को पूरा कर देती। इसी सबके बीच सीटी भी होठों बीच लटकी रहती। बड़े पेट से सवारियों की देह में बल डालता। स्वयं आश्वस्त रह हमेशा की तरह बस की लम्बाई की भीड़ को, किराया लेने के लिए, अगला स्टैण्ड आने से पहले नाप देता।
वह पाँचवीं पास नहीं था। उसको ठीक से पता था कि धन की ठण्डी आग में कितना दम है। वह बड़े बड़ों को ठण्डा कर देती है - आयकर अधिकारियों को भी।
उसके बच्चे पढ़ने में कतई ठस थे परन्तु परीक्षा में कभी भी फेल नहीं होते थे। मलखान की भैंस का दूध निकलते ही सबसे पहले स्कूल के मास्टर के कमरे में पहुँच जाता था। मास्टर जी जब भी अपने गाँव आते जाते तो वे बस से यात्रा करते। यह ध्यान रखते थे कि मलखान की बस कितने बजे आयेगी। जिससे बस किराया भी नहीं लगेगा। बैठने को सीट भी मिलेगी चाहे बस सवारियों से ठसाठस ही क्यों न भरी हो।
शादी-ब्याह के मौसम में, खचाखच सवारियों से भरी बस व बस की छत पर भी जब पैर रखने की जगह न हो तो ऐसी स्थिति में जब आरटीओ का सिपाही बस सड़क के किनारे रुकवा ले। मलखान ऐसी स्थिति में भी, टिकट बुक के नीचे नोटों का गड्डी लगा, आरटीओ को सलटाना मलखान अच्छी तरह जानता था। ताकि बस की यात्रा जारी रहे।
सुभान भी मनचला मित्र था मलखान का।
"है देशी का जुगाड़?" मित्र ने इशारे में पूछा।
मलखान ने मित्र की ओर देख, मूँछों के पर हाथ लगा, आँख मारकर देशी के जुगाड़ की, व्यवस्था की पक्की कर दी।
बस चल पड़ी। सवारियों को निगलती उगलती बस हर पाँच सात मिनट बाद रुक रुककर आगे बढ़ रही थी।
जैसे ही बस अन्तिम पड़ाव पर शहर पहुँची। सुभान ने भानू को बस में ही बैठे रहने का इशारा किया।
भानू को लगा कि बस बाजार के आसपास जाकर खड़ी होगी।
कुछ मिनट में भीड़भाड़ को चीरती बस एक लम्बी दीवार के साथ सटा कर लगा दी गयी। तीन घण्टे बाद बस को वापसी इसी रूट पर करनी थी।
इस पार्किंग स्थल पर पेशाबखाने की बदबू असहनीय हो रही थी। सुभान ने भानू को नाक भींचे देखकर कहा - "बस की छत पर चलो।"
भानू ने नाक भींचे कहा - "मुझे बाजार जाना है, बस की छत पर बाजार थोड़ेई ना है।"
बस की छत पर ढ़क्कन खोलने व बन्द करने की - "चडड़ ड़ धड़ाम धू" आवाज़ आ रही थी।
"ये खलासी कब काम आयेगा!" सुभान का यह कथन स्वामित्व से आपूरित था।
तभी मलखान का घर्घराया स्वर सुनाई दिया - "ऊपर आ जा।"
बस की छत पर देशी का जुगाड़ परे देशी अँदाज में था।
जब तक भानू पेशाब की शंका से निपट बस की छत पर पहुँचा सुभान सड़े गले गद्दे पर आसन जमाये था। बस की छत पर से बाजार आ जा रहे रिक्शे, ताँगे वालों का नजारा देखते ही बन रहा था। पेशाब घर की बदबू से भी कुछ राहत मिली थी। कभी कभी हवा का झोंका दुर्गंध की बहार ले आता था।
मटमैली बोतल में शराब। अधधुले काँच के गिलास - जिन पर बरसों की खरोंचें अपने निर्दयतापूर्ण उपयोग की अलग ही कहानी कह रही थी। पुराने अखबार के पन्ने पर नमकीन का रखा पैकेट, खाने के लिए दावत दे रहा था।
मटमैली बोतल और उसके खुलने पर खट्टास से भरपूर गंध व पेशाबघर की सड़ान्ध की मिलीजुली पेशकश से भानु को उबकाई आ रही थी। उधर देशी शराब की मँहक और नमकीन का पैकेट खुलते देख सुभान के मुँह से मुस्कान व पानी एक साथ टपक रहे थे। उसने मलखान की बड़ाई करने में कोई कमी न छोड़ी थी।
भानु को तब ध्यान आया कि महीने भर पहले उसकी माँ उसे मलखान के घर लेकर गई थी। जहाँ पर उसकी पहचान एक भरे पूरे गात वाली महिला से करवाई थी। मलखान की घरवाली से।
उस समय वह महिला चूल्हे के सामने बैठी आटा गूँद रही थी।
भानु को देख, उसकी खुशी, उसकी आँखों में छलक आयी थी। वह उस भाव को चाहकर भी छिपा न सकी। उसने झटपट अपने आटे में सने हाथों को धो, आटे की परात को एक तरफ सरका दी थी। चाय का पतीला तवे की जगह चूल्हे पर तुरतफुरत चढ़ा दिया था।
-----
पिछले बार भानू जब शहर से गाँव आया तो उसे पता चला था कि उसकी कुड़माई हो गई है। उसकी अनुपस्थिति में सब घट गया। नाते में दादा लगने वाले, जिम्मेदार पड़ौसी ने, टीका रश्म का एक रुपया ले लिया था। इस तरह गाँव-चौपाल में यह रिश्ता तय हो गया था। इस रिश्ते को तोड़ना गाँव-चौपाल से दुश्मनी मौल लेना था।
उसको समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?
उस साँझ भानु की, अपने माँ-बाप से कहने की भी इच्छा हुई थी कि वह अभी नादान है। विवाहेत्तर जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम नहीं है। उसने अपनी माँ से, थोड़ा बहुत संकेतों में, कहने का प्रयास भी किया कि अभी मैं रिश्ते के लिए राजी नहीं हूँ।
"अब तू बड़ा हो गया। जब बच्चे सयाने हो जायें तो उनका रिश्ता कर लेना चाहिए।" माँ की जबान पर एक ही उत्तर था।
------
भानु की माँ भानमति इस जमावड़े को देख अलसाई हुई थी। ऐसा उसके जीवन में कभी नहीं घटा था कि पूरे गाँव की पंचायत घर की दुछत्ती पर चढ़ आयी हो। शादी ब्याह के समय जरूर समाज जुड़ता परन्तु इस साँझ के जुड़ाव का बोझिल माहौल न तो रुलाई आने दे रहा था और न ही होठों पर हँसी ! उसकी गर्दन घूँघट के तले, दाँतों में घूँघट का एक पल्लू दबोचे, धरती को ताक रही थी।
"बेटा तूने तो म्हारी गर्दन काट दी, तूने हमें समाज में जीवण लायक नहीं छोड्या।ट
"तू घर आयी लक्ष्मी को ठोकर मत मार।"
"ऊपर को मुँह करके थूके मत। ये थूक तुझ पर ही आकर गिरेगा।"
एक ही साँस में भानमति ने जीवन की सारी उठा पटक को बेटे के सिर पर डाल दिया।
उधर भानु का बापू, पंचायत का सामना, होने से ओछा महसूस कर रहा था। उसकी आँखें दीवारों को देख रही थी। वह आदमी अपनी सच्ची जबान के लिए गाँव में जाना जाता। आज उसकी सच्चाई की छवि पंचों के पैरों में थी। वह बार-बार अपनी नाक पौंछ रहा था।
"मैं तो सोचता था कि बेटा बड़ा होकर बाप का नाम करेगा पर इसने तो हमने जीते जी डूबो दिया।"
"चुल्लू भर पानी में नाक दे के डूब मर।"
बापू यह कहते हुए रोये नहीं परन्तु अन्तर से निकलती फफकियाँ दर्द को छिपा न सकी।
"कॉलेज में पढ़ण न भेज दियो अब या छोरो म्हारी थारी के मानेगो!" भख्तावर का मसखरा भरा ठहाका पड़ौस के घरों की दीवारों टकरा कर गूँजा और फिर मुँडेर पर बैठे कुछ लोगों की खिसियाहट की हँसी के साथ लुप्त हो गया।
"ओ आजा ईसबर आजा तेरी ही कमी थी।" मुँडेर पर कतार में बैठे लोगों में से किसी की चहकती आवाज भर्राई।
"के बात हो गयी। या हजूम कैसो?" ईसबर के सवाल से एकदम सन्नाटा सा छा गया।
पंच चेतु चौधरी भानू का कन्धा पकड़, बड़े याराना अँदाज से दूसरी छत पर ले गया। बच्ची के सुन्दर व सुशील होने की बात कह भानू को समझाने लगा।
"लड़की आठ पढ़ी है। साथ ही साथ, भैंस की गोबर बुहारी व खेत का सब काम सम्भाल लेती है। हम जमींदारों के ज्यादा पढ़ी लिखी का क्या काम!"
"फिर शहर के रास्ते, ससुराल भी रास्ते में ही है। एक पंथ दो काज।"
"ब्याह तो एकदिन करना ही है। जवानी हर दिन जीवन की देहरी पर नहीं ठहरती" - भख्तावर ने फिर मसखरा तोड़ा।
सीख की सब बातें, चेतु पंच ने, पंचायत की बहस का हिस्सा समझ, गोबरधन की तरफ नजरमार व एक धीमी मुस्कुराहट के साथ पंचायत की बिसात पर एक साथ उँडेल दी।
भानु को यह सब दबाव रास न आ रहा था। वह भी इसी गाँव में जन्मा, गाँव की मिट्टी से जुड़कर ही बड़ा हुआ था। उम्र के साथ थोड़ी समझ भी आ गयी थी। कुछ कहने के बजाय उसने, पंच परमेश्वर की, सुनना ही बुद्धिमानी समझा।
"देख अभी तेरी चढ़ती उम्र है बाद कोई नहीं पूछेगा।"
चेतु पंच अपनी बात को और वजन दे और अपनी बात जारी रखते हुए कहता चला गया।
"तेरी उम्र के साथियों को देख उनके घर तो आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँज रही हैं।"
"पर यदि समय पर नौकरी न मिली और कम उम्र में आँगन की किलकारियाँ कहीं मेरी जिजीविषा की चीख की परछाइयाँ न बन जायें - यह भी तो एक पहलु है।" भानु ने बड़ी सादगी के साथ अपना पक्ष रखना चाहा परन्तु उसने कुछ भी कहना अब और उचित न समझा।
इस बीच चेतु ने कहना जारी रखा - "बारात की खातिर तबज्जो भी बढ़िया होगी।"
"बात दान-दहेज की है। कोई भी बाप अपनी बेटी के ब्याह में कसर नहीं छोड़ता। ये तो मलखान का साला है। हमसे छानी नहीं, जाना पहचाना है।"
पड़ौस के घर से, लकड़ी की आग पर, चूल्हे पर सिकती रोटी की मँहक आ रही थी। किसी आँगन की रसोई से, हारे में कण्डे की धीमी आग पर रखी कढ़ावणी से, उबलते दूध की, कण्डे के धूँए में लिपटी खुशबू अपने आपको खुले आकाश को समर्पित कर रही थी।
"अभी तो मेरे जैसा सलाह ही दे सकें। यदि तूने इस रिश्ते को फेरा तो... फिर बाद में कोई रिश्ता भी आयेगा तो लोग तेरी चुगली करेंगे और तेरा रिश्ता नहीं होने देंगे। जिंदगी भर कँवारा ही रह जायेगा।"
"यदि मैं गृहस्थ जीवन निर्वाह की जिम्मेदारियों को निभाने की सामथ्र्य जुटा पाया तो मेरा विवाह हो जायेगा अन्यथा ना सही।" यह बात भानू के होठों तक आकर रह गई।
"ये समाज है। मुँह पर कुछ, पीठ पीछे कुछ और। तेरे माँ बाप का जीणा भी गाँव में हराम हो जावेगा।"
चेतु का यह धमकी भरा कथन बहुत देर तक भानु के दिमाग में वृताकार घूमता रहा तभी सरपंच के दखल ने भानू का ध्यान सरपंच ने अपनी ओर खींचा।
"थोड़ा धीरज धरो। छोरा तो अपणा ही है। पढ़ा लिखा है कुछ हमने इसकी मानणी पड़ेगी और कुछ, म्हारा छोरा म्हारी भी मानेगा।"
पंच चौधरी के बोल अभी कोबरा के फन की तरह पूरे दिमाग में छाये हुए थे और अब एक और प्रश्नों की बाढ़ सामने आती दिखाई दी।
"यह जिन्दगी भर का मामला है।"
"छौरे को एक दिन का टाइम दो।"
ऐसा कहकर सरपंच ने भानु को अपनी ओर खींच लिया और समझाने लगा।
-----
उसका सिर चकरा रहा था। वह अकेला किस किस से उलझेगा!
ढ़ेर सारे झँझट और अनगिनत प्रश्न भानु के मस्तिष्क में एक बवण्डर मचाये हुए थे। उसको समझ नहीं आ रहा था कि वह आखिर क्या करे। बहुत सारे प्रश्न मुँह बाये खड़े थे। काश! इनका कोई एक उत्तर हो सकता?
"स्वयं को समाज के लिए औरों की तरह झौंक दे या अकेला अपने कदमों को अलग दिशा में बढ़ाकर उदाहरण प्रस्तुत कर दे।"
यही एक बात भानू की आँखों के सामने पुनः पुनः लौटकर आ रही थी।
उस आँधी तूफान भरी साँझ के घटनाक्रम को लिए, किसी तरह भानू ने रात बितायी और अगली सुबह सात बजे की बस से पढ़ने के लिए, वापस शहर के लिए बस में सवार हो लिया। उसी शहर, जहाँ से दस दिन पहले भानू ने अपने न होनेवाले ससुर को चिट्ठी लिख दी थी कि वह स्वयं अभी ब्याह योग्य नहीं है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^