btn_subscribeCC_LG.gif
चरवाहे के साथ शब्द हो जाते हैं दुर्निवार
01-Dec-2018 07:03 PM 1199     

चरवाहे के साथ

मैं नहीं समझता
राग-बन्दिशें-ख्याल, आरोह-अवरोह
फिर भी बहुत अच्छा लगता है
तुम्हारा गाना लय-अलय।

तुम्हारे स्वर आकुल
बार-बार झंकृत करते हैं मन
क्या होता है ऐसा कि
उदासी और उल्लास
गहन दुःख और अपरिमित आनंद
सबमें एक साथ जीने लगता हूँ
जीवन की सच्चाइयाँ।

स्वर लहरियों पर तैरते-तैरते
मुझे दिखने लगता है
प्रफुल्लित विश्व
तुम्हारे साथ गाते हुए।

इच्छा होती है
कंठ से गाने लगूँ तुम्हारे साथ!

 

शब्द हो जाते हैं दुर्निवार

शब्द हो जाते हैं दुर्निवार अचानक
तब प्रसव की अगाध पीड़ा में मैं
भोगता हूँ अथाह आनंद।

तब कन्धों पर लाठी टिकाए चरवाहा
हरे-भरे आम वृक्ष लाद
भारी-भरकम ट्रक दौड़ाता ड्राइवर
ठेला खींचता हम्माल
तान छेड़ता पंछी
बोर्ड पर लिखता शिक्षक और
सुगंध फैलाता फूल
जो भी आता है मेरे दृक्-पथ में
रच जाता है कविता
जैसे अग्नि रचती है अग्नि।

बहते हुए शब्दों को सारे तनुबल से
लिखने लगता हूँ श्वेत पत्र पर
बहुत कठिन है
नदी को कागज़ पर बाँधना।

शब्द हो जाते हैं दुर्निवार इतने
कि लोक-मोह से परिवेष्ठित मेरी देह से
निकल जाते हैं बाहर
भूल जाता हूँ मैं अपना लोक, अपनी देह
और कविता हो जाता हूँ।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^