ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गंगा-जमनी तहज़ीब के कमजोर पक्ष
01-Apr-2018 02:35 AM 1571     

यह देश ईसा पूर्व से ही विदेशी आक्रमणों को झेलता रहा है और बार-बार अपने छोटे-बड़े शासकों की मूर्खता, फूट और स्वार्थ के कारण पददलित होता रहा है। कोई पाँच छह हजार वर्ष पहले घुमंतू आर्य आए और यहाँ की नदी घाटियों में बस गए और यहीं के हो गए। ईसा से तीन शताब्दी पहले यवन आए लेकिन चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ के कारण सफल नहीं हो सके और लौट गए। इसके बाद दूसरी तीसरी शताब्दी में शकों के हमले हुए। चौथी शताब्दी तक उनका देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में शासन भी रहा। बाद में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने उनके क्षत्रपों के अनेक क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिए। वे भी कालांतर में भाषा, पहनावे, नाम, रीति-रिवाज में पूरी तरह भारतीय ही हो गए।
पाँचवीं-छठी शताब्दी में हूण आए। स्कंदगुप्त, यशोवर्मन आदि ने उन्हें पराजित भी किया। उनमें से अधिकांश वापिस लौट कर अपने देश नहीं गए, बल्कि यहीं बस गए और कालांतर में हिन्दू हो गए।
इसके बाद गज़नी से महमूद आया जिसका मकसद केवल लूटपाट करना था। हालाँकि कुछ स्थानों पर कब्ज़ा भी किया लेकिन उसका ध्यान इस लूट से खुद अपने को और अपने देश को समृद्ध करना था। उसने मथुरा और सोमनाथ को लूटा। कुछ राजाओं ने उसे रोकने की कोशिश भी की लेकिन पंडितों का विश्वास था कि वे अपने मन्त्र-बल से शिव को जाग्रत करेंगे और शिव अपनी और सबकी रक्षा करेंगे लेकिन शिव न अपनी रक्षा कर सके, न मंदिर की और न ही अपनी प्रजा की। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने समय में मूर्ति पूजा की इस अति और मूर्खता का विरोध किया और आर्यसमाज की स्थापना की। वास्तव में तो बौद्ध, जैन, सिक्ख सभी संप्रदाय, जिन्हें भारत सरकार ने अब अल्पसंख्यक के नाम से धर्म का दर्ज़ा दे दिया है, मूर्तिपूजा नहीं करते और निरीश्वरवादी हैं। ये सब अपने समय के प्रगतिशील, मूर्तिपूजा को नकारने वाले, अद्वैतवादी दर्शन रहे हैं।
अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता के चक्कर में जयचंद से शत्रुता मोल ले ली। फलस्वरूप इस व्यक्तिगत शत्रुता का दुष्परिणाम देश को भुगतना पड़ा। जयचंद मोहम्मद गौरी को बुला लाया। पृथ्वीराज वीर था लेकिन अभिमानी और विलासी भी था। इसलिए मोहम्मद गौरी 1206 में दूसरी कोशिश में अपने मकसद में सफल हो गया। इस प्रकार इस देश में मोहम्मद गौरी द्वारा स्थापित इस्लाम के अनुयायी "गुलाम वंश" के शासन की नींव पड़ी। इसके बाद तो अगले साढ़े छह सौ वर्ष तक किसी न किसी रूप में इस्लाम को मानने वाले खिलजी, तुगलक, सैयद, लोधी और मुग़ल वंशों का शासन रहा।
कुछ आततायी आए और यहाँ काबिज़ हो गए। यह उनकी वीरता कम और यहाँ के शासकों की आपसी फूट, मूर्खता, कायरता और स्वार्थपरता अधिक थी। वे आततायी यहीं बस गए। यहीं की बोली-भाषा, खान-पान, कमोबेश पहनावा आदि भी इन्होंने अपना लिया। सामान्य जनता में आपसी भाईचारा बना रहा, एक गंगा-जमनी तहज़ीब भी विकसित हो गई। उस समय के मुस्लिम शासक अपने को यहीं का मानने लगे। वे लौट कर नहीं गए। यहीं जन्मे और यहीं दफन हो गए। आज उन्हें कोई अरब देश अपना नहीं मानता। उन्होंने पाकिस्तान जाने का विकल्प होने पर भी इसी देश को अपना माना। चूँकि विभिन्न इस्लामी वंश अपने साथ एक मुकम्मल और कट्टर धर्म लेकर आए थे इसलिए वे उस तरह इस देश में नहीं मिल सके जैसे शक-हूण आदि। योरोपीय लोग तो खैर अपने देश चले ही गए। यहाँ के जिन लोगों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया वे योरप के गोरे नहीं है। वे भी यहीं के जन्मे, पले, बढ़े भारतीय हैं। लेकिन धर्मों, विशेष रूप से हिन्दू और इस्लाम के कट्टर धार्मिक नेताओं ने अपने-अपने धर्म की आड़ में छुपे स्वार्थ के चलते सभी धर्मों के, विशेष रूप से इन दो बड़े धर्मों के सामान्य लोगों की एकता और समरसता को पसंद नहीं किया और न ही आज पसंद करते हैं। अन्दर-अन्दर एक-दूसरे के प्रति घृणा और कट्टरता भरते रहे हैं। जो आज भी बहुत से लोगों के मनों में घर किए हुए है और विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। इसी घृणा को दोनों धर्मों के नेता अपने स्वार्थों के लिए विभिन्न प्रकार से हवा देते रहते हैं। यह दुष्टता आजकल और भी स्पष्ट दिखाई देने लगी है।
हालाँकि योरप के देशों के शासन ने इस देश के प्रति बहुत प्यार और भक्ति नहीं दिखाई। इनमें सबसे अधिक और विस्तृत शासन ब्रिटेन का रहा। उन्होंने अपनी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ही सही; शिक्षा, यातायात, कानून, अर्थव्यवस्था का एक स्वरूप इस देश को दिया। योरप में नए ज्ञान-विज्ञान और वैचारिक स्वतंत्रता की जो हवा बह रही थी, वह भारत में भी आई। इसलिए जहाँ अंग्रेजों का आगमन पहले हुआ और जहाँ उनका प्रभाव अधिक रहा वहाँ-वहाँ नई शिक्षा और विचारधारा का प्रचार हुआ। हमें यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि वहाँ-वहाँ देश की आजादी की हवा भी पहले आई। देश के वे ही इलाके आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में अधिक विकसित हुए। जहाँ-जहाँ शिक्षा का प्रचार देर से हुआ या नहीं हुआ वे इलाके आज भी तुलनात्मक रूप से पिछड़े हुए हैं।
अधिकतर रियासतों में वहाँ के शासक पहले मुगलों के लिए और फिर अंग्रेजों के लिए टैक्स उगाहने वाले दलाल से अधिक कुछ नहीं थे। मुफ्तखोरी ने उन्हें अत्याचारी, दम्भी और लम्पट बना दिया। इन्होंने देश और प्रजा के लिए कोई जोखिम नहीं लिया, कोई साहस नहीं किया। वास्तव में ये शासक न तो दिल्ली के शासकों के प्रति वफादार थे और न ही अपनी प्रजा के प्रति। वे केवल ऊपर वालों को दिखाने के लिए नौटंकी करते थे। इसी तरह इनकी प्रजा भी इन्हें दिखाने के लिए नौटंकी करती थी।
वास्तव में देश और समाज में कहीं एकरसता और समरसता नहीं थी। जो भी, जब भी सत्ता में आता है, प्रजा उसी के प्रति निष्ठा दिखाने लगती। उसकी स्वतंत्र सोच का विकास आज तक नहीं हुआ। सभी शासक यही समझते हैं प्रजा उनका आदर करती है। लेकिन इस देश की प्रजा किसी के भरोसे नहीं है। देश-दुनिया, धर्म आदि से पहले वह अपनी रोजी-रोटी और स्वार्थ के बारे में सोचती है। वह विकसित देशों की प्रबुद्ध प्रजा की तरह नहीं है जो जीवन मूल्यों के लिए आंदोलित हो, संघर्ष करे। जहाँ तक चालाकी-चतुराई का प्रश्न है तो यह दुनिया की सबसे ज्यादा चालाक और चतुर जनता है। इसे अमरीका में फायदा लेने के लिए चोटी कटाकर जयकिशन से जैक्सन बनने में देर नहीं लगती। और यहाँ वही जनता तिलक, छोटी, कशीदे वाली टोपी और विशेष प्रकार की दाढ़ी में सारे मूल्यों, धर्म और नैतिकता को ढोती रहती है और उन्हीं को जीवन मूल्यों की तरह स्थापित करना चाहती है।
ऊपर से शांत, सभ्य लेकिन अन्दर से किसी भी धर्म में विश्वास न करने वाली, अपने मतलब के लिए राजनीति तक को उल्लू बनाने वाली यहाँ की यह प्रजा ही इस देश की गंगा-जमनी तहजीब के लिए असली खतरा है। और इसी मुँह देखी, ठकुर सुहाती की आड़ में देश के जनमानस में विभेद की अंदरूनी कुंठाएँ पनपती रहती हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि प्रकारांतर से विभेद की यही कुटिलता दुनिया के अन्य शासकों को भी सत्ता प्राप्ति के एक सरल विकल्प के रूप में दिखाई देने लगी है।

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