ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जीवन संघर्ष की गाथा
01-Mar-2019 03:27 PM 759     

उसके जीवन में दो जीवन रहते हैं, एक विवाह से पहले का और एक विवाह के
बाद का। बहुत मुश्किल होता है कि वह विवाह के बाद इन दोनों धाराओं में एक
साथ रहकर जी सके। नए को अपनाने में पुराना बहुत कुछ छूट जाता है।

उपन्यास "बंद मुट्ठी" पूर्ण जागरुकता के साथ लेखकीय दायित्व का निर्वाह करते हुए रचा गया एक ऐसा भावनात्मक उपन्यास है जिसमें एक पूरा परिवार अपनी समूची हँसी, खुशी और दुःख-तकलीफ सबके साथ में पाठक के समक्ष उपस्थित रहता है। डॉ. हंसा दीप का यह पहला उपन्यास है लेकिन पठनीयता और भाषा की सजगता के स्तर पर यह कहीं से भी कमजोर नहीं है। पाठक जब इस उपन्यास को पढ़ता है तो एक सहज प्रवाह के साथ बहता चला जाता है। कहानी लेखन से उपन्यास तक के सफर की एक पूरी रचनात्मक परिपक्वता इस पुस्तक के माध्यम से सामने आई है।
उपन्यास की नायिका तान्या है और उसके अतीत में चलता हुआ यह उपन्यास एक जीवंत संस्मरण की तरह आगे बढ़ता रहता है। भारत से बाहर जाकर जब कोई परिवार वहाँ पर रहने लगता है तो पाश्चात्य संस्कृति में रहते हुए, उसके भीतर वर्षों से बैठे हुए पारंपरिक संस्कार, कई सारी वर्जनाओं को भी उसके भीतर स्थापित कर देते हैं और फिर उन संस्कारों से अलग हटकर नई पीढ़ी जब अपने किसी निर्णय पर आगे बढ़ जाती है तो माँ-बाप के भीतर बैठा संस्कारी स्वभाव उस परंपरा से हटकर लिए गए निर्णय को स्वीकार नहीं कर पाता है। यह एक अंतद्र्वंद्व तान्या के जीवन में कई सारे बदलाव लाकर रख देता है। प्रत्येक संतान अपने परिवार की निर्धारित सीमा रेखाओं को जानती है और जब वह उससे हटकर कई निर्णय लेती है तो उसके भीतर बैठा हुआ डर, परिवार को निर्णय बताने से दूर रखकर, उसे परिवार से ही दूर कर देता है। दरअसल उसके जीवन में दो जीवन रहते हैं, एक विवाह से पहले का और एक विवाह के बाद का। बहुत मुश्किल होता है कि वह विवाह के बाद इन दोनों धाराओं में एक साथ रहकर जी सके। नए को अपनाने में पुराना बहुत कुछ या तो छूट जाता है या फिर छोड़ना पड़ता है।
सिंगापुर में तान्या का जीवन पूर्ण संस्कारी जीवन है जिसमें वह अपनी प्रत्येक बात के लिए या तो अपनी "राजी दी" पर निर्भर है या फिर मम्मी, पापा पर। अपने आप वह कुछ नहीं करती। उपन्यास के प्रारंभ में तान्या का पूरा बचपन है- चहकता हुआ, एक अनूठे खिलंदड़ेपन के साथ। इस सारे बचपन का विलक्षण तरीके से चित्रण किया गया है। यहाँ की भाषा बिल्कुल अलग है, चट्टान और पत्थर से टकराती हुई उड़ती उछलती नदी की तरह।
और फिर तैयारी रहने लगती है तान्या के नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में जाने की। पापा की चाहत यही थी कि उनकी बेटी एक बेहतरीन शिक्षण संस्थान में अपना कॅरियर बनाए। इसीलिए जब यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में तान्या का चयन हो जाता है तब पापा का सीना गर्व से फूल जाता है। माँ का भावुक प्रेम आँसू बहाने लगता है लेकिन पापा तान्या के जीवन को सफल बनाने में लगे हैं।
तान्या के जीवन के परिवर्तन की रूपरेखा यहीं से बनती है। यहीं से तान्या उपन्यास की नायिका के रूप में पाठक के सामने आकर खड़ी रहती है। उपन्यास का ताना-बाना ऐसा बुना गया है कि राजी दी और पापा-मम्मी से प्रारंभ होकर जो कथा आगे बढ़ती है वह सहजता के साथ तान्या के जीवन में पाठक को लाकर खड़ा कर देती है। यहाँ से कथा धीरे-धीरे एक धीर गंभीर नदी में परिवर्तित होने लगती है।
तान्या अब अपना एक जीवन शुरू कर देती है जिसमें तीन बेडरूम के एक अपार्टमेंट में जसविंदर कौर उर्फ जस्सी, बीना और शुची की कंपनी में उसका कॉलेज का जीवन शुरू होता है। यहीं पर वह आत्मनिर्भर बनती है। कॉलेज के जीवन का बड़ा रोचक विवरण यहाँ पर दिया गया है। कथा की अन्य धाराओं को भी साथ में धीरे-धीरे विस्तारित किया गया है। मसलन दी की शादी और रूममेट के जीवन संदर्भ का जिक्र, जो उपन्यास को पूर्णता प्रदान करता है।
यहीं पर तान्या के जीवन में सैम का प्रवेश होता है। यहाँ पर सैम और तान्या के मध्य पनपने वाले प्रेम को हंसाजी ने पूरा विस्तार देकर उसे सहज ग्राह्य बना दिया है। पोलैंड और सिंगापुर वासी सैम और तान्या अंततः साथ में जीवन जीने का तय तो कर लेते हैं लेकिन यहाँ पर तान्या की माता-पिता को लेकर चिंता सहजता से सामने आती है। वे टूट जाएँगे, बिखर जाएँगेे का विचार तो मन में आता है लेकिन प्रेम भारी पड़ता है और स्काइप पर तान्या सैम को माता-पिता से मिलवाकर अपना निर्णय उन्हें बता देती है। पापा का क्रोध और माँ के आँसू भी उसका निर्णय बदल नहीं पाते। सैम का परिवार तान्या को स्वीकार लेता है।
जीवन के इन सारे परिवर्तन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण बड़े ही विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत किया गया है। तान्या चिंतित है। माँ और पापा के नहीं मानने का जो दुःख तान्या को है उसे एक सजग भाषा के साथ सारे तंतुओं को बुनते हुए प्रस्तुत किया गया है।
इसके बाद सैम और तान्या का जीवन उनकी जीवनशैली, सुख-दुःख का वर्णन करते हुए कथा का नया पैंच सामने आता है। जब तान्या माँ नहीं बन पाती। तान्या का दुःख यहाँ पर बहुत बड़ा है। ऐसे वक्त में उसे मम्मी-पापा और राजी दी की जरूरत महसूस होती है लेकिन उसके पास यह धैर्य धरने के सिवा कोई चारा नहीं होता कि समय सब घाव को भर देगा। सारे विकल्प को आजमाने के बाद अंततः बच्चा गोद लेने का तय होता है और फिर चीन से एक बच्ची को गोद ले लिया जाता है। यहाँ तक के सारे अंतरसंघर्ष और घटनाओं, परिस्थितियों को दिया गया पूरा विस्तार पाठक को एक प्रेक्षागृह में लाकर खड़ा कर देता है जहाँ से उसे यह पूरी कथा एक नाटक की तरह दिखाई देती है।
रिया को गोद लेने से लेकर उसके 16 वर्ष की होने तक के सफर में उनके भीतर का एक डर कि रिया को सच बताना होगा, सदैव उनके भीतर बना रहता। अंततः जीवन के सारे कड़वे, खट्टे, मीठे अनुभवों को खंगालती तान्या, सैम के साथ रिया को यह सच बताती है और रिया पापा-मम्मी के गाल पर चुम्मी देकर उनके डर को धराशायी कर देती है। बंद मुट्ठी को खोलकर जीवन की नई लकीरों को देखते सैम और तान्या के आँसू सारा अकथ कह जाते हैं।
एक फिल्म की तरह पाठक की आँखों के सामने चलता हुआ यह उपन्यास पाठक की आँखों को भी नम कर देता है।
मानव मन के भीतर बहती हुई बहुत सारी धाराओं को अलग-अलग समय में अपने तरीके से खोजकर पाठकों के समक्ष लाना और मानव के मन के भीतरी रहस्यों की जाँच पड़ताल करते हुए पाठकों के समक्ष उन्हें सहज प्रभावी भाषा के साथ परोस देना डॉ. हंसा दीप की कलम की सफलता है। यह संस्मरण जैसा उपन्यास कहीं-कहीं पर आत्म कथात्मक जैसा भी लगने लगता है लेकिन यह भी सत्य है कि निजी जीवन के कई सारे चरित्र लेखक की कथा में आते ही हैं और जीवन का प्रभाव ही रचना को रचता है। प्रत्येक पात्र को उसकी पूरी संभावनाओं के साथ खोजकर प्रस्तुत किया गया है। देश, काल और स्थितियों का विश्वसनीय विवरण उपन्यास की प्रामाणिकता को स्थापित करता है।
मुझे तो ऐसा लगा है कि तान्या ने हंसाजी के भीतर की माँ को पकड़कर यह उपन्यास उनसे लिखवा दिया है। बंद मुट्ठी को खोलकर हाथ की लकीरों में सुखों को खोजता यह उपन्यास जीवन संघर्ष की गाथा है जिसके सफल लेखन के लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं।

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