ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी की चुनौतियों का अद्र्ध-सत्य
01-Sep-2019 06:26 PM 720     

शायद दुनिया में पलायन के लिए मज़बूर किए जाने वाले लोगों में संख्या के हिसाब से यहूदी सबसे ऊपर हैं और इसी तरह जिनके समूल विनाश के लिए जघन्यतम तरीके अपनाए गए वे भी यहूदी ही थे। हिटलर द्वारा उन पर किए गए अत्याचार अभूतपूर्व हैं जिसके लिए आज भी जर्मनी को शर्मिंदा होना पड़ता है। ऐसे ही अत्याचारों के मारे यहूदी जाने-जाने कहाँ-कहाँ विषम परिस्थितियों में दुनिया में दर-ब-दर भटकते रहे हैं। अब जब 1948 में यहूदियों का देश इज़राइल बना तो उन्हें एक पहचान मिली है। इसके अतिरिक्त इससे पहले भी दुनिया में जहाँ भी यहूदी रहे उन्होंने नए देश की भाषा को सीखते हुए भी अपनी भाषा हिब्रू को अपने कर्मकांडों में जीवित रखा। क्या यहूदियों से बड़ी कोई चुनौती किसी के लिए हो सकती है? इसके बावजूद नोबल पुरस्कार पाने वालों में लगभग 23 प्रतिशत यहूदी ही हैं। अमरीका का बैंकिंग उद्योग यहूदियों के कब्ज़े में है। राष्ट्र बनते ही उन्होंने अपनी मृत मानी जा चुकी भाषा को पुनर्जीवित किया।
500 साल पहले अमरीका के बनने से पहले से भी अफ्रीका के लोगों को गुलाम बनाकर योरप में बेचा जाता था। अमरीका बनने के बाद जब तक भाप या पेट्रोल से चलने वाली मशीनों का आविष्कार नहीं हुआ था तब अमरीका के गोरे स्वामियों को उस विशाल भूभाग का दोहन करने के लिए सस्ते मानव-श्रम की ज़रूरत पड़ी तो अफ्रीका के काले लोगों की तो आफत आ गई। लाखों की संख्या में काले स्त्री-पुरुष-बच्चे पशु-तुल्य जीवन बिताने के लिए गोरे अमरीकी मालिकों को बेचे गए। गोरे मालिकों ने उन्हें पशु बनाने के लिए उनसे उनके नाम, भाषा, धर्म और परिवार सब छीन लिए। क्या इससे बड़ी कोई चुनौती हो सकती है? लेकिन उन्होंने अपने गीतों में अपनी अस्मिता को जीवित रखने का प्रयत्न किया। वे अपने संकट के समय अपनी बोली में समूह गीत गाकर अपने दर्द आपस में बाँटते थे। गोरे मालिक कहते थे कि हमें तलवार से ज्यादा इनके गीतों से डर लगता है।
सन् 1824 से 1911 के बीच लाखों भारतीयों विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के निरक्षर, गरीब और मेहनती किसानों को गन्ने और चावल की खेती करने के लिए मॉरीशस, फीजी, सूरीनाम, गुयाना, जमैका आदि देशों में ले जाया गया। इनका जीवन भी पशु से कम गया-गुज़रा नहीं था। यदि किसी को पता नहीं है तो उसे अभिमन्यु अनत का "लाल पसीना" उपन्यास पढ़ लेना चाहिए। ऐसे में इनकी अस्मिता की तो बात ही छोड़ दीजिए। क्या इनकी चुनौती किसी नरक से कम रही है? लेकिन इन्होंने मौखिक रूप से ही सही, अपनी भाषा और उसमें संवाद-क्षमता के बल पर अपने को बचाए रखा। सरकार की तरफ से किसी ऐसी व्यवस्था की तो कोई कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। आज हिंदी वहाँ की एक प्रमुख भाषा है और निरंतर साहित्य के माध्यम से अपनी अस्मिता और पहचान को बचाए हुए है।
इन उदाहरणों के बाद भारत का उदाहरण लें जहाँ हिंदी के निःशुल्क शिक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी सहायता, पुरस्कार उपलब्ध है। ऐसे में पता नहीं हम किस काल्पनिक चुनौती की चर्चा करते रहते हैं? रही बात वैश्विक चुनौती की तो स्वाधीनता के बाद जो भारतीय विदेशों में गए हैं वे सब उच्च शिक्षित, साधन संपन्न और सब तरह से समर्थ हैं। वे अपने नए देश में उच्च मध्यमवर्गीय लोग हैं। यदि वे चाहें तो अपने बच्चों के लिए किसी भी प्रकार के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था कर सकते हैं। और कर भी रहे हैं। वे हजारों डॉलर अपने बच्चों के नृत्य, संगीत, खेल और भ्रमण पर खर्च करते हैं लेकिन हिंदी के शिक्षण के लिए न तो उनके पास समय है और न ही इच्छा। इसलिए यदि कोई चुनौती है तो अपने आपसे। किसी भी समूह विशेष के बच्चों के लिए एक निश्चित संख्या होने पर उनकी मातृभाषा के शिक्षण के लिए सरकारी अनुदान द्वारा स्कूलों में व्यवस्था भी है। अब प्रवासी भारतीयों के बच्चों के लिए हिंदी के मार्ग में कौन-सी चुनौतियां आ रही हैं जिनसे पार पाना इतना दुश्वार हो रहा है कि हम दूर-दूर से आकर उस पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। यह कैसी आपद-विपदा है?
अंग्रेजों के समय में बिना किसी सरकारी सहायता और कैरियर के लालच के हमने हिंदी, अपनी मातृभाषा और अंग्रेजी सब सीख लीं। क्या हमारी वर्तमान पीढियां इतनी अक्षम हैं कि एक अतिरिक्त भाषा और वह भी अपनी भाषा सीखने का श्रम करने पर वह जीविका और ज्ञान के अन्य बड़े क्षेत्र में पिछड़ जाएंगी? मज़े की बात देखिए कि ऐसे में कुछ अभिभावक कैरियर के नाम पर चीनी जैसी एक बहुत मुश्किल भाषा सीखने के लिए बच्चों को झोंक देते हैं। मतलब हमारे बच्चों में क्षमता की कमी तो नहीं है।
अब रही बात हिंदी की संभावनाओं की तो वे अपार हैं क्योंकि इसके पास विरासत के रूप में दुनिया की सबसे बड़ी सभ्यताओं का इतिहास है। चिंतन की एक विविध और लम्बी परंपरा है। यदि हम अपनी संभावनाओं को तलाशते और मार्केटिंग करते (मार्केटिंग आज के सस्ते अर्थ में नहीं) तो बात कुछ और ही होती। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि को नोबल पुरस्कार की दौड़ में इसलिए शामिल किया जा सका कि उसका अंग्रेजी अनुवाद हुआ और प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकार डब्ल्यू.बी. यीट्स ने उसका प्राक्कथन लिखा था। प्रेमचंद निश्चित रूप से विश्व के महान कहानीकार और उपन्यासकार हैं लेकिन उन्हें अनूदित करके दुनिया के सामने नहीं रखा जा सका। इसी तरह महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बासु को भी हमारी मार्केटिंग ठीक से न कर पाने के कारण समय पर पेटेंट न ले पाने के कारण वह स्थान और मान्यता नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी। प्रेमचंद और बासु के बारे में हो सकता है हमारे देश का ब्रिटेन के अधीन होना एक प्रमुख कारण रहा हो लेकिन क्या आज भी हम मज़बूती से अपनी बात कह पा रहे हैं? भले ही हम एक बहुत बड़े मार्किट हैं लेकिन छवि के बारे में अब भी हमें बड़ी शक्तियों की मदद चाहिए जो हम उनका हजारों करोड़ का माल खरीद कर प्राप्त करते हैं।
हिंदी की सबसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित पत्रिका "सरस्वती" के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी का मानना था कि हमें हिंदी की शक्ति बढाने के लिए विभिन्न विषयों का अधिक से अधिक लेखन हिंदी में करना चाहिए। हिंदी ही श्रेष्ठ रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करना चाहिए और अन्य भाषाओं की श्रेष्ठ रचनाओं का हिंदी में अनुवाद करना चाहिए। बड़े विद्वान होते हुए भी उन्होंने सामान्य विषयों पर भी छोटी-छोटी पुस्तकें लिखीं। जापान में विश्व के किसी भी शोध पत्र का जापानी में अनुवाद एक सप्ताह में उपलब्ध हो जाता है। क्या हिंदी में हम ऐसी तत्परता का दावा कर सकते हैं?
हमने हिंदी को केवल कविता कहानी तक ही सीमित कर दिया है। उसे साहित्य की अन्य विधाओं में भी सक्रिय करना है। कहते हैं देवकीनंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यास को पढ़ने के लिए कई लोगों ने हिंदी सीखी। क्या हम हिंदी में ऐसा कुछ नया और रोचक दे सकते हैं? भले ही हम सिनेमा को फार्मूला टाइप होने और सस्ता मनोरंजन कह कर खारिज करना चाहें लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सिनेमा ने अपनी मनोरंजन शक्ति से हिंदी को दुनिया के एक बहुत बड़े वर्ग तक पहुंचाया है।
हिंदी की क्षमताओं और संभावनाओं को विकसित करने के लिए क्या हम उसके सीखने को और रोचक तथा वैज्ञानिक नहीं बना सकते? आज भी हम "अ" से "अनार" से शुरू करना चाहते हैं। आज भी हमारा शिक्षण "व्यासपीठ" पर बैठकर भाषण देने से आगे नहीं बढ़ पाया है। हमारे पास नेताओं और पार्टियों के अपने विज्ञापन के लिए हजारों करोड़ का बजट है, विश्व हिंदी सम्मलेन में सरकारी खर्चे से सेवकों विश्व भ्रमण करवाने के लिए पैसा है लेकिन हिंदी की शक्ति और क्षमता बढाने के लिए कुछ नहीं।
हमें खुद को ही अपनी भाषा की क्षमता पर विश्वास नहीं है। चीनी और जापानी भाषाएँ विस्तार पा रही हैं तो इसका कारण उन देशों की शिक्षा, ज्ञान, औद्योगिक उत्पादन क्षमता और शक्ति हैं। शक्तिशाली देश की भाषा भी शक्तिशाली हो जाती है। अंग्रेजी के पीछे उस भाषा की क्षमता ही नहीं बल्कि उससे अधिक ब्रिटेन की आर्थिक और सैनिक शक्ति भी रही है। तभी एक कहावत है- शक्तिशाली का तिनका भी लट्ठ होता है। सब तरह से देश शक्तिशाली बने तो वह बल उसकी भाषा में भी प्रतिबिंबित होगा। हिंदी की शक्ति तब बढ़ेगी जब उसमें ज्ञान और सूचना की सामग्री का विशाल भण्डार होगा। विभिन्न दिशाओं में उसका विस्तार होगा।
कहते हैं- फस्र्ट डिज़र्व देन डिजायर। शायद डिज़र्व करने के बाद बिना डिजायर के भी वह सब मिल जाएगा जिसकी हम अपेक्षा करते हैं। इसलिए हम जगद्गुरु होने की कुंठा और भारतीय भाषाओं के केवल गुणानुवाद से आगे चलकर ज्ञान, विज्ञान और आर्थिक प्रगति के लिए कठोर श्रम करें।

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