ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
घुटन सुबह का सूरज
01-Nov-2018 10:44 AM 138     

घुटन

जब भी दिल की घुटन और हालात
लिखना चाहूँ अलफाज़ साथ नहीं देते
हर एक बात पर लगती टोक पर
खामोश रहती हूँ, लब साथ नही देते।

वो उलझे-उलझे ताससुरात
हर घड़ी एक क़िस्से की सी शकल
मुझे अंदर ही, अंदर तोड़कर रख देते हैं
कुछ कहना भी चाहूँ अगर
हड़बड़ाहठ जिस्म को घेर लेती है
नाज़ुक हालात साथ नहीं देते।

अनरुकी-सी धाराएँ, बहती चली जाती हैं
ठहरकर अशक़ भी, आँखों का साथ नहीं देते
मैं ज़िंदा रहने की क्योंकर करूँ ख़वाहिशें
जब अपने ही अपनों को पास नहीं रखते
हर लहजे से महसूस होती तोहीन है
गये गुज़रे तो इतने भी हम नहीं हैं
फिर क्यों दिल में हमें जगह नहीं देते।

सच कहूँ तो मुझे ऐसे सिफर दिल में
जगह नहीं चाहिये
जिसमें जज़्बात नाम भर को भी नहीं रहते
मेरा वजूद क्या है, इस सोच में डूबी रहती हूँ
वजूद लिखना भी चाहूँ मगर
स्याही भी ख़त्म हो जाती
क़लम भी साथ नहीं देती।

 


सुबह का सूरज

हर सुबह का सूरज बनकर के एक आस
चला आता है मेरे घर के आसमाँ पर
तुम मिलोगे आज इस उम्मीद में
पूरा दिन निकल जाता है।

कुछ साँसें रुकी हुई पड़ी रहती हैं
मेरे घर के द्वार पर
कुछ गीली, कुछ सूखी साँसें
सूखी साँसों को उठाकर
मैं अन्दर ले आती हूँ
गीली साँसें इनकार कर देती है
मेरे हमराह होने से।

आस का सूरज आकर
समो लेगा उनका सारा गीलापन
तुम मिलोगे इस उम्मीद में
पड़ी रहती है मेरे द्वार पर
सारा दिन सूरज मेरे घर के
आसमाँ पर रहकर भी
उन गीली साँसों को सुखा नहीं पाता
साँसें हैं कि अपनी आस नहीं छोड़ती
पड़ी रहती हैं मेरे घर के द्वार पर।

शाम का मटमैला उजाला घिर आता है
अगली सुबह के सूरज के इन्तेज़ार में
तुम मिलोगे कल इसी उम्मीद में।

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