ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भविष्य की भाषा और भाषा का भविष्य
01-Feb-2019 02:44 PM 1654     

जो पराधीन है, जो विवश है, जो निष्प्राण है, जो मूक है या जिसे बोलने का अवसर नहीं है, उसका क्या भविष्य और क्या वर्तमान। "लायी हयात आए, कज़ा ले चली चले", वाली स्थिति है। बकरी का क्या भविष्य और मुर्गे क्या मुस्तकबिल? किसान का क्या भविष्य? उसे तो खेती करनी है, जो पैदा होगा उसे ऐसे ही औने-पौने दामों में बिकना है। ज्यादा संकट आया और ज्यादा संवेदना जागी तो इन्डोसल्फान है ही।
भाषा तो खैर, इस श्रेणी में भी नहीं है। उसकी कैसी चिंता? उसका तो जैसा, जितना प्रयोग किया जाएगा उसका वैसा ही स्वरूप हो जाएगा। वह अच्छा बुरा कुछ नहीं होता। वह तो पेड़, हवा-पानी की तरह निरपेक्ष है। प्रयोग होगा तो संवाद और अभिव्यक्ति के दौरान उसी में नई-नई व्यंजनाएँ उभरेंगी, नए-नए बिम्ब झलकेंगे। नहीं तो डिब्बे में बंद दवा की तरह उसके उपयोग की तारीख़ निकल जाएगी और वह अपना अर्थ और प्रभाव खो देगी।
दुनिया की हजारों-हजार बोलियाँ बोलने वाले रोटी की तलाश में अपने गाँव-ढाणियों को छोड़कर जाने कहाँ-कहाँ भटकते फिरे और उनके भाषा- रूप शहरों और कस्बों की लेन-देन और व्यापारी सभ्यता में बिला गए। आदिवासी इलाकों के भूमिहीन होकर दर-दर भटकते लोगों के जाने कितने भाषा-रूप, बिम्ब, व्यंजनाएँ, कथाएँ और गीत, प्रतीक और उपमाएँ शहर की भागमभाग की आँधी में उड़ गए।
शहर में रहने वाले पढ़े-लिखे और तथाकथित सभ्य-सुसंस्कृत और संपन्न लोगों के भी पेट इतने बड़े हो गए हैं तथा रोटी इतनी कम पड़ गई है कि उसका संतुलन बिंदु तलाशते-तलाशते कब दिन और जीवन बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। सुबह जल्दी उठकर कार्यालय में जाने और देर रात को घर लौटने वाला बड़ा अधिकारी भी अपने बच्चों और अन्य परिवार-जनों से निश्चिन्तता पूर्वक बतियाने का समय भी नहीं निकाल पाता। रात में उसे स्वप्न भी कंपनी की बेलेंशीट के ही आते हैं। बच्चों का हाल यह है कि वे सुबह-शाम, चाहे अपनी कार या फिर स्कूल की बस में बैठे ब्रेड चबाते-चबाते, घंटे-दो-घंटे का सफ़र करके, स्कूल में मात्र रटे-रटाए, छपे-छपाए शब्दों की जुगाली करते हैं। कुछ बड़े हुए तो भविष्य के लिए दो रोटी सुरक्षित करने के लिए स्कूल के बाद कोचिंग, कई-कई प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में बिना किसी से अपने मन की बात किए; बिना-धूप-हवा और चिड़ियाँ, खेत-पेड़-पौधे देखे; मात्र वाट्सअप मैसेज फॉरवर्ड करते-करते, यदि सौभाग्य से किसी दिन अपने पिता की तरह किसी कंपनी के सुबह से शाम तक खटने वाले पुर्जे बन गए तो जीवन सफल और सार्थक।
ऐसे में जब आदमी को अपनी दो रोटी सुरक्षित करने से ही फुर्सत नहीं मिलती तो कैसी भाषा और कैसा उसका भविष्य। भाषा आदर्श, संगति और कर्म से विकसित होती और निखरती है। इस प्रकार की मात्र रोटी के लिए भागती दुनिया में भाषा कहाँ है? जिसकी दुम में आग लगी हो वह "ठुमक चलत रामचन्द्र" या "तरणि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए" कब रचेगा और गाएगा। मैंने अपने एक व्यापारी टाइप मित्र को अपनी कुछ पुस्तकें दीं। कुछ दिनों बाद जब उससे पूछा तो बोला- भाई साहब, कैसी किताबें और कैसा पढ़ना? हाय-तौबा से फुर्सत मिले तो पढ़ें ना।
हम जीवन के जिस श्रेष्ठ रूप को याद करते और जिसके लिए बिसूरते हैं वह कृषि युग वाला जीवन था जब सब खेत में काम करते थे, जो पैदा होता उससे गुजारा चलाते और लड़ते-झगड़ते, बोलते-बतियाते, दीन-दुनिया की निंदा-स्तुति करते, मेलों-ठेलों में जाते, चौपाल-चबूतरे पर गप्पें लड़ाते थे। हर बात में रस लेते; भले ही वह किसी के दुःख से संबंधित हो या सुख से। मज़बूरी या बेकारी में ही सही लेकिन फुर्सत जो थी। भाषा और संस्कृतियाँ किसी एक वर्ग के श्रम या शोषण पर फलती-फूलती हैं अन्यथा यदि सब अपने-अपने भोजन और सुरक्षा आदि की व्यवस्था करेंगे तो किसी को भाषा-संवाद और आनंद के लिए फुर्सत ही नहीं मिलेगी जैसे सृष्टि के मानवेतर जीव।
जब आदमी के नौकर के रूप में काम करता है तो मालिक को अपने मुनाफे की फ़िक्र होती है। वह कर्मचारी को पेशाब करने तक की भी फुर्सत नहीं देना चाहता। यह उसे समय की बर्बादी और अपना घाटा लगता है।
अमरीका की सीमा से सटे मेक्सिको में अमरीकी उद्योगपतियों ने सस्ते श्रम और टैक्स नियमों आदि से बचने के लिए कारखाने लगा रखे हैं। उनमें बेहतर नियंत्रण की दृष्टि से महिलाओं को रखा जाता है। उन्हें पेशाब करने तक के लिए ढंग से समय नहीं दिया जाता है। सुख-दुःख की बात तो बहुत दूर की बात है। केरल में दुकानों में काम करने वाली महिलाओं को कोई ग्राहक न होने की स्थिति में भी बैठने की सुविधा न देने के विरुद्ध महिलाओं का प्रतिरोध कोई अधिक पुरानी बात नहीं है।
इसी आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि भविष्य की भाषा क्या होगी?
यही बात भविष्य की भाषा के लिए कही जा सकती है। संवाद की फुर्सत के बिना भाषा का सीमित और लक्षणा-व्यंजनाहीन होना तय है। व्यक्ति का जितना समय रोटी-रोजी में खर्च होगा उतनी ही उसकी भाषा एकांगी और अभिधामय होती जाएगी। जीवन की भाषा ही विविधतापूर्ण होती है। उसी में बिम्बों और व्यंजनाओं की गुंजाइश रहती है। रोबोटों और रोबोट की तरह मालिक या किसी कंपनी के लिए काम करने वाले तो एक पूर्व फीडित प्रोग्राम के अनुसार काम करते हैं। वहाँ मनुष्य और जीवन की भाषा कहाँ है?
मिलिट्री में काम के दौरान कैसी और कितने प्रकार के शब्दों वाली भाषा चाहिए? मात्र दस-बीस शब्दों वाली भाषा से काम चल जाता है। लेफ्ट टर्न, राइट टर्न, अबाउट टर्न, यस सर, नो सर, थैंक्यू, ब्लडी, बास्टर्ड, गेट आउट आदि पर्याप्त हैं।
आजकल के योरप-अमरीका या भारत के किसी बड़े स्टोर में जाइए और देखिए कि भाषा का कितना और कैसा उपयोग होता है? उपयोग होता भी है या नहीं। सामान ट्रॉली में डालिए, काउंटर पर स्केन कीजिए, एक ग्राम तक का कम्प्यूटर से हिसाब लगकर आ जाएगा, कार्ड से पेमेंट कीजिए, किसी तरह की कोई झिकझिक, संवाद कुछ नहीं, न दुआ-सलाम, न मोल-भाव। एकदम नीरस खरीददारी। आखिर मेला क्या केवल भीड़ और खरीददारी के लिए ही होता है? वह तो धक्के खाने के लिए भी होता है। जीवन के धक्कों के बिना कैसे संवाद-विवाद होगा? बिना संवाद-विवाद के भाषा का कैसा भविष्य?
भाषा के भविष्य का थोड़ा-सा अनुमान आजकल की मोबाइल-मैसेज की भाषा-वर्तनी और व्यंजना या फिर सबका साथ सबका विकास के लिए अपने-अपने स्मार्ट फोन में खोए, स्मार्ट दुनिया के स्मार्ट लोगों से भी लगाया जा सकता है।

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