ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अमीर आग़ा कज़लबाश उर्दू का बेहतरीन शायर
01-Feb-2019 02:55 PM 746     

मेरी एक फास्ट फ्रेंड हुआ करती थी। गज़ब की सुन्दरी थी। वह रेडियो में नौकरी करती थी। जब मुझे रेडियो में कॉन्ट्रैक्ट पर काम मिला था, तभी इस सखी को भी कॉन्ट्रैक्ट पर काम मिला था। फिर यह वहाँ स्थायी हो गई और मैं उसी मंत्रालय के अन्य विभाग में स्थायी नौकरी पर चली गई। उसका और मेरा ऑफिस आसपास था। मेरी नौकरी उससे ऊँची थी लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति मेरी आर्थिक स्थिति से बेहतर थी क्योंकि उसका बैक ग्राउंड बेहतर थे। मुझे ज़रूरत पड़ने पर पैसे उधार दिया करती थी। मैं लंच नहीं ले जाती तो ज़िद करके अपना लंच मुझे खिलाती थी। मैं कई बार भगवान से यह दुआ माँगती थी कि उसे बहुत पैसा दो ताकि वह मुझे ज़रूरत पड़ने पर दे सके। एक दिन अचानक मुझे ख्याल आया था कि मैं भगवान से सीधे अपने लिए क्यों नहीं माँगती? तो मुझे लगता है कि कई बार हम सीधे अपने लिए भगवान से नहीं माँगते बल्कि वह जरिया मज़बूत करने की प्रार्थना करते हैं, जिस ज़रिये से हम सुखी होते हैं। जो लोग हमारा ख्याल रखते हैं, वे हमारी प्रार्थनाओं में होते हैं। इसका अर्थ तो यही हुआ कि अच्छे लोग अवश्य और हमेशा किसी न किसी की प्रार्थनाओं में होते होंगे? इसी सहेली के बहाने से मैं उर्दू के बेहतरीन शायर अमीर आग़ा कज़लबाश से आपका परिचय करा रही हूँ।
सखी का नाम यहाँ नहीं लिखना चाहती। उसका नाम मेरे नाम से मिलता-जुलता था, अतः मैं उसे यहाँ मणि लिख कर बात करूँगी। तो मणि मेरी अत्यन्त विश्वसनीय सखी थी, इतनी अपनी कि मैं अगर दिन को रात कह दूँ तो वह सच में उसे रात बनाने पर तुल जाए। मेरे भीतर कई तरह की हीन ग्रन्थियाँ थीं जिन्हें दूर करने में उसका बड़ा हाथ रहा। मेरे बेटे की हमउम्र उसकी एक बेटी थी। हमारा कुछ भी एक-दूसरे से छुपा हुआ नहीं था।
वह रेडियो में थी तो रेडियो में भाँति-भाँति के कलाकारों का नियमित आना जाना था जिनके अनुबंध वही तैयार किया करती थी। वहीं उसकी मुलाकात अमीर आग़ा कज़लबाश से हुई। एक दिन उसने मुझसे कहा, अमीर बहुत खूबसूरत है, शायर है, उससे सात-आठ साल छोटा है, वह उससे दोस्ती करना चाहती है। पर अगर अमीर ने मना कर दिया तो...? वह अमीर के बारे में और कुछ नहीं जानती थी। बस उस पर बुरी तरह आसक्त थी। उसकी आसक्ति ने उसे इस कदर विह्वल किया कि उसने एक दिन अमीर से कह दिया, "मैं आपसे दोस्ती करना चाहती हूँ।" अमीर मुस्कुरा दिया और दोनों की दोस्ती शुरू हो गई।
उसने इस दोस्ती को सेलेब्रेट करने के लिए एक दिन अपने घर में पार्टी रखी। नहीं, वह अकेली नहीं रहती थी, भाई के परिवार के साथ रहती थी। बस, वह अपने शायर दोस्त से सबको मिलवाना चाहती थी। मुझे वहाँ सुबह से पहुँचना था, उसकी मदद करने के लिए। वह सारा खाना खुद बनाना चाहती थी, अपने हाथों से। हालाँकि उसे खाना बनाने की आदत नहीं थी। उसने कभी बनाया नहीं था। पता नहीं, उसे खाना बनाना आता भी था या नहीं, पर उसने उस दिन मुझे और घर में सबको आश्चर्यचकित करते हुए मटन चाप बनाए, चिकन टिक्का बनाए, फिश कटलेट्स बनाए, स्वागत के लिए संतरे का फ्रेश जूस निकाला, अपने हाथ से और बाद में स्नैक्स के साथ के लिए ब्लैक लेबल मँगवाई। मज़े की बात यह कि वह शुद्ध शाकाहारी थी और शराब की पार्टियों में शामिल होने में उसकी कोई रुचि नहीं होती थी। सच मानिए तो वह इन मामलों में एक "शरीफ लड़की" थी। पर शायर दोस्त पर फ़िदा इतनी कि सचमुच मर मिटेगी। (यह उसने बाद में बताया कि उसने वह सारा खाना बनाने के लिए एक रेसिपी बुक खरीदी थी जिसकी मदद से वह ये सब बना पाई थी।)
फिर एक दिन मणि ने अपना फ्लैट खरीद लिया और अमीर उस फ्लैट में उसके साथ रहने लगा। यानि दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। मणि की बेटी तब तक पढ़ने अमेरिका जा चुकी थी। मणि और अमीर ने साथ मिल कर बड़े काम किए। मणि अमीर के लिए प्रोग्राम ऑर्गेनाइज किया करती थी। उन्होंने मुशायरे और संगीत के ढेरों प्रोग्राम ऑर्गेनाइज किए, जो अमीर को लोकप्रिय बनाने में सहायक तो हुए ही, उनके लिए पैसा कमाने का साधन भी बने।
मुझे नहीं ध्यान कि मैंने कभी उनकी लड़ाई या बहस देखी हो। अमीर को केवल दो शौक थे, शायरी करना और शराब पीना। इन दोनों से मणि को कोई ऐतराज़ नहीं था। वैसे भी मणि का ज़्यादा वक़्त ऑफिस में गुज़रता था और अमीर का अपने दोस्तों के साथ घर में। इस रिश्ते की एक खूबी यह थी कि इन्होंने खुलेआम साथ रहते हुए भी कभी अपने को पति-पत्नी नहीं कहा। हमेशा दोस्त के रूप में सबके सामने आए। इनकी राह में कोई रोड़ा भी नहीं अटका जैसे सब सहज स्वीकार्य हो।
उनके घर और कभी-कभी मेरे घर में भी उर्दूवालों का जमघट लगा रहता था। एक वरिष्ठ शायर रिफ़अत सरोश, जो दिल्ली रेडियो मे प्रोड्यूसर थे, की आत्मकथा की पुस्तक "पत्ता पत्ता, बूटा बूटा" मैंने प्रकाशित की थी। इस सब में एक बात मेरे लिए ख़ास यह रही कि बहुत सालों बाद एक बार रिफ़अत सरोश की पत्नी ने मुझसे कहा था कि मैं जो हर समय अपने बिज़नेस में लगी रहती हूँ, अपने ग्रैंड किड्स के साथ बहुत कम वक़्त बिताती हूँ तो उन्हें मेरे संस्कार नहीं मिलेंगे। उसके बाद मैं इस ओर एलर्ट हुई थी और मैंने सोचा था कि हमें जो भी मिलता है, उसका कुछ न कुछ योगदान हमारे जीवन में होता है।
मेरे दिल्ली से बाहर चले जाने पर मेरा दिल्ली में कोई आवास नहीं था। बीच-बीच में जब मैं दिल्ली आती तो अपने पिता के घर रहने की बजाय मणि के घर रहना ज़्यादा पसंद करती थी। वह भी मुझे मेरे पिता के घर से खींच कर अपने घर ले जाती थी।
अमीर को मेरा नाम सही से लेना नहीं आता था। वह मुझे मेनका कहता था। मैंने उसे बहुत बार समझाया था, "बोलो म णि का", वह बोलता, "मे न का"। अमीर की मेरे साथ भी खूब बनती थी, क्योंकि वह और मैं, दोनों ही ताश खेलने के शौक़ीन थे। कभी-कभी वह मुझे फोन करता, "मेनका, घर में बैठी क्या कर रही हो? आ जाओ, ताश खेलते हैं।" मैं आने के लिए "हाँ" कर देती तो कहता, "देखो, खाली हाथ मत आना, कुछ टिक्के-शिक्के लेकर आना।"
अमीर पहला ऐसा बन्दा था जिसे मैंने कभी किसी के साथ फ्लर्ट करते नहीं देखा। उसका ध्यान किसी औरत के औरत होने में नहीं होता था। मणि के अतिरिक्त उसकी कभी कोई और गर्ल फ्रेंड नहीं देखी गई। वह धोखेबाज़ नहीं था। मैंने उसे कभी कोई हलकी बात या हरकत करते भी नहीं देखा, किसी के भी साथ। सैकड़ों गैदरिंग्स में उन दोनों के साथ रही हूँ, हर जगह दोनों को शालीन पाया। जैसे एक-दूसरे को पाकर दोनों संतुष्ट हो गए थे।
कुछ साल पहले अमीर का देहांत हुआ, ज़्यादा शराब पीना उसकी मौत का कारण बना। यानि अमीर की मृत्यु तक यह लिव-इन रिलेशनशिप कामयाबी से चलता रहा। अमीर की मौत की खबर मणि ने मुझे दी थी, कि अमीर की मौत उसके घर में नहीं हुई, वह कहीं बाहर अपने रिश्तेदार के घर गया हुआ था और मणि अमेरिका में बस गई अपनी बेटी के पास गई हुई थी।
अब मुझे मणि की कोई खबर नहीं है। शायद वह अमेरिका में ही बस गई है, लेकिन उसके दिल्ली के फ्लैट की लैंडलाइन फोन की घंटी अब भी बजती है पर उसका मोबाइल फोन नहीं मिलता।
अमीर के कुछ शेर सुनिए....
वो सिरफिरी हवा थी, सम्भलना पड़ा मुझे
मैं आखिरी चराग था, जलना पड़ा मुझे.
तुमसे मुमकिन हो तो बालों में सजा लो मुझको
शाख से टूटने वाला हूँ, सम्भालो मुझको.
समझा हैं मेरे क़त्ल को दुनिया ने ख़ुदकुशी
खामोश कर दिए गए कातिल शनास लोग.
हमारे देखते-देखते अमीर की कई उर्दू किताबें छपीं, एक देवनागरी लिपि में भी छपी थी, "शिकायतें मेरी"। अमीर ने "प्रेम रोग" और "राम तेरी गंगा मैली" फिल्मों के गीत लिखे।
कौन कहता है कि लिव-इन रिलेशनशिप नहीं निभते? वह भी हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के के बीच। लगभग तीस साल यह रिश्ता निभा। क्या खूब निभा।

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