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कन्यादान की परम्परा के आशय
01-Apr-2018 04:01 AM 2079     

भारतीय परम्परा में कन्यादान के संबंध में विचार- विमर्श करने से पूर्व कुछ प्रश्नों से सहज ही सामना होता है, मसलन - दान क्या है? और क्यों किया जाता है? दान करने के बाद उस वस्तु या प्राणी का दान करने वालों से क्या संबंध रह जाता है?
पहली बात यह है कि दान एक संकल्प है, जिसके मायने यह है कि हम एक वस्तु या प्राणी को दान में देकर उस वस्तु पर मोह छोड़ दिया है और उस वस्तु या प्राणी के प्रति हमारा कोई हक़ नहीं है। जैसे की गोदान। गौ माता के दान के उपरांत उस गौ को ब्राह्मण पाले पोषे या किसी को बेचे, कुछ भी करे उस पर दाता का कोई हक़ या पूछने का अधिकार नहीं होता।
दान दी गयी वस्तु या प्राणी (गाय) का दान देने वाले से कोई वास्ता नहीं होता। वह सिर्फ उसके नये मालिक यानी जिसे वह प्राप्त हुआ है उसकी संपत्ति होती है। जिसे वह अपने हिसाब से उपयोग करने का हक़ रखता है।
पुराणकाल में अपनी बच्ची को किसी को सौंप कर यानी दान करके उससे पूरी तरह पीछा छुड़ाया जाता था। अगर उसे कुछ भी हो, शारीरिक मानसिक शोषण या कुछ भी हो जाए तो उसके दाता को पूछने का कोई भी हक़ नहीं होता था।
इस प्रथा के साथ अन्य एक प्रथा जुड़ी हुई थी, जिसकी वजह से बेटी के घर का पानी पीना भी पाप समझा जाता था, क्योंकि इस प्रथा की वसूली की संभावना होती थी। यानी उस घर से अगर पानी भी पिया जाए तो उस पानी के कीमत पर कन्या को बेचने जैसे पाप का भागीदार होने का डर था।
धीरे-धीरे समाज बदला, दुनिया बदली, रीतियाँ-रिवाजें बदले, फिर भी कन्यादान की प्रथा नहीं बदली। स्त्री या कन्या का दान के पश्चात उसका कोई हक नहीं होता था मैके में रहने का, लेकिन कन्याएँ जरूर आतीं हैं और मैके में समय बिताती हैं।
इस कन्यादान की प्रथा के अनुसार कन्या के पितृ परिवार के किसी भी सगी संबंधी से कोई वास्ता नहीं होता था। उसके परिवार का कोई भी सदस्य कन्या के घर का पानी नहीं पी सकता था, लेकिन आजकल कन्याओं के घर में उसकी पितृ परिवार वाले कई दिन शान से रह सकते हैं।
बेटियाँ दोनों परिवार की देखभाल कर सकती है। दोनों परिवार की संपत्ति की हिस्सेदार भी हो सकती हैं। फिर कन्या का दान का मतलब क्या हुआ?
अभी बेटियाँ भी परिवार की उतनी ही हिस्सेदार हैं, वह भी उतना ही हक़ रखतीं हैं जितना कि बेटे, फिर कन्यादान का महत्व क्या रहा?
समय बदला, लेकिन परम्पराएँ ऐसे ही चलती आ रही है। पाणिग्रहण, सप्तपदी, सात फेरे, कुमकुम, मंगलसूत्र यह सब तो अपनी जगह सही है, लेकिन अब कन्यादान का कोई महत्व नहीं।
एक तरफ आप कन्यादान भी करते हैं दूसरे तरफ उसके घर महीनों बिताते हैं, वैसे ही कन्याएँ भी अपनी परिवार पर पूरा हक़ रखतीं है। खुद से पूछिए, समाज से पूछिए, अपनी बेटियों को पूछिए कि क्या वह दान की वस्तु बनकर अपने ससुराल में जाने को तैयार है?
प्रश्न उठता है कि आधुनिक समाज में कन्यादान की परम्परा ने कौन-से समाज में अपनी जगह बनायी हुई है। क्या यह परम्परा दिखावे की परम्परा भर नहीं रह गई है।
पुराने समय में ऐसा माना जाता था कि सभी दान से बड़ा कन्यादान होता है। लेकिन आधुनिक समय में इस प्रश्न से सामना किये बिना गुजारा नहीं हो सकता है कि क्या हम बेटी को दान करने के लिए जन्माते हैं? क्या बेटियाँ कोई वस्तु होतीं है? इस सवाल का जवाब आधुनिक माता-पिता को ढूँढने का समय अब आ गया है।
दान हम क्यों करते हैं? आदिकाल से गोदान और कन्यादान जैसी कई मूढ़ रश्मों रिवाजें बनाई गई हैं। ये रश्मो रिवाज पुरुषों ने और ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व बनाए रखने के लिये बनाए हैं। पूजा पाठ के नाम से घर की चार दीवारों में बाँधना जैसी परमपराओं से क्यों बाँधी गयी? और आखिर पति परमेश्वर क्यों है? वह भी तो इंसान है। अगर देखा जाए तो स्त्री ही जन्म देने और सृष्टि को आगे बढ़ाने का क्षमता रखती है इसलिये स्त्री को परमेश्वरी कहने का हक़ बनता है।
माता-पिता कन्या की शादी करवाकर एक के हाथ से दूसरे हाथ में सौंपते हैं, क्योंकि स्त्री अपनी जिंदगी के नये रंग और उमंग के साथ हम उम्र की साथी पाकर अपनी ज़िंदगी खुशहाल बनाए और जिंदगी भर एक-दूसरे का सम्मान कर दुःख-सुख के भागीदार बन साथ जीवन बिताएँ। इसलिये पाणिग्रहण, सप्तपदी, सात फेरे, कुमकुम, मंगलसूत्र इन सब तो अपने जगह सही है, लेकिन कन्यादान? जबकि कन्या भी एक जीवंत प्राणी है जो सोचने समझने की क्षमता भी रखती है फिर वह दान की पात्र कैसे बनी? आदिकाल से कई अंधविश्वास चल पड़े और उनमें स्त्रियों को इस तरह झोंक दिया गया जैसे कि वह एक सम्पत्ति हैं। बेटी का जन्म होते ही उस पर प्रथम अधिकार पिता-माता का होता है, फिर दूसरा घर उसका पति और ससुराल का। लेकिन उसके जन्म होते ही उसे चूल्हे-चौके में बिठा दिया जाता है जैसे कि वह उसी के लिए ही जन्मी हो। समझने की बात है कि चुल्हे-चौके के बाद किरोसिन स्टोव, गैस और सिलिंडर, इलेक्ट्रिकल कुकर और चूल्हे, यहां तक कि माइक्रोवेव ओवन तक आ गया है, जमाना बदलने लगा है, देश आधुनिक युग में कदम रखा है लेकिन समाज की अधिकांश स्त्रियाँ अब भी उसी चूल्हा-चौका में ही उलझकर रह गयी हैं।
इंसान की बुद्धि अन्य जीव-जंतुओं से उन्हें अलग करती है। कन्या समाज का एक अहम हिस्सा है, उसके बिना समाज पूरा नहीं हो सकता। वह सृष्टि को जन्म देकर माँ का स्थान हासिल करती है। जो पुरुष सौ जन्म लेकर भी नहीं कर सकता। फिर कन्या का अपमान क्यों? क्या कन्या का अपने जीवन पर खुद का कोई हक़ नहीं जो उसे दान की वस्तु समझा जाए? क्या माता-पिता कन्या को दान करने का हक़ रखते हैं? क्या इस रिवाज के लिये आवाज़ उठाना जरूरी नहीं। एक बार अपने मन को टटोलकर सोचिए फिर इस प्रथा को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़िए।

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