ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चुनौती ये है कि जैसे कोई चुनौती नहीं
01-Sep-2019 06:06 PM 647     

बहुत कम लोगों में गौर से देखने की सामथ्र्य होती है। दिखाई तो सबको देता है पर सब देख पा रहे हैं इस बात पर विश्वास करना कठिन है। पिछले पांच सौ सालों में योरुप ने पूरी पृथ्वी पर बसी दुनिया को इस तरह गढ़ने की कोशिश की है कि पृथ्वी के निवासी चुनौती की पहचान भूल जायें और अगर चुनौती को पहचान भी लें तो उसे किसी भी हालत में चुनौती न दे सकें। पुराने जमाने में आदमी की चुनौतियाँ कुछ अलग थीं। आदमी पत्थर युग में रहता था। एक-दूसरे को पत्थर मार लेता होगा। जब किसी को मार नहीं पाता होगा तो पत्थर में नुकीली नोंक पैदा करके उसके औजार बना लेता होगा। आदमी पुराने जमानों में आदमी को उतना नहीं खदेड़ता रहा है जितना उसने पृथ्वी पर बसे पशुओं को खदेड़-खदेड़ कर मारा है। आकाश में अपनी गुलेल से निशाना लगाकर पक्षियों को, आग खोजकर भूना है और खाया है। आदमी ने ही जंगल उजाड़कर जमीन को समतल किया है, खेती की है, पृथ्वी पर बसा है और एक-दूसरे से अपने अधिकार के लिये लड़ता आया है। उसने अपने अधिकारों की रक्षा के लिये पुराने जमानों में पंचायतें भी बनाईं और अब वह एक ऐसी विश्व पंचायत के सामने विवश होकर खड़ा है जिसे वह कोई चुनौती नहीं दे सकता है।
एक साधारण आदमी आखिर संयुक्त राष्ट्र संघ से क्या कह सकता है। वो अमेरिका के राष्ट्रपति की किसी बेतुकी बात का विरोध कैसे कर सकता है। आदमी की हालत यह हो गई है कि दुनिया के बैंकों में उसका खाता भी अब सुरक्षित नहीं बचा है। उसके बहू-बेटी सुरक्षित नहीं बचे, रसोईघर सुरक्षित नहीं बचे और यहाँ तक कि आदमी के मनोरंजन के साधन अब उसके हाथ में नहीं हैं। वो अब अपना गीत नहीं गाता। उसे कुछ गीत सुनाये जाते हैं, जिन्हें वो रटता है और उन्हीं की बेसुरी धुनों में अपने मन को भटकाता रहता है। भटका हुआ आदमी किसी चुनौती को कैसे स्वीकार कर पायेगा।
दुनिया की सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जो एशिया के लोगों और उनके संसाधनों पर कब्जा करके पूंजी बटोरकर अपने देश ले जाना चाहती हैं, वे इस असहाय आदमी का मात्र संसाधन के रूप में उपयोग कर रही हैं। फिर चाहे यह आदमी डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर हो अथवा कोई मजदूर ही क्यों न हो। वे हर उस देश में जाने से पहले उसकी भाषा सीखती हैं जहाँ वे अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहती हैं और फिर उस देश के मजबूर आदमी को अपनी भाषा सिखाकर उससे अपना काम लेना चाहती हैं। ऐसी हालत में हर देश का आदमी अपनी बोली और उसमें बसी जीवन की आत्मीयता को भूलकर हाय और हलो में उलझा हुआ है।
आधुनिक समय में एक ऐसी दुनिया बन रही है जिसमें कोई किसी का नहीं। हालांकि यह बात दार्शनिक कहते रहे हैं कि - कोई किसी का नहीं, ये झूठे नाते हैं, नातों का क्या... लेकिन बाजार की शक्तियाँ एक ऐसी भाषा गढ़ रही हैं कि हर मजबूर आदमी यह विश्वास करने को मजबूर है कि यह नाते झूठे नहीं हैं। ये नाते तो इतने अच्छे हैं कि एक फोन करने से घर में खाना आ जाता है, आधी रात को टैक्सी बुलाई जा सकती है। दूर अमेरिका में बैठे अपने बच्चों से बात की जा सकती है। मगर ये कैसे नाते हैं कि पड़ौसी को आवाज़ नहीं दी जा सकती और अगर उसे आधी रात को दरवाजा खटखटाकर जगाया जाये तो वह दरवाजा खोलने की जहमत उठाने को अब शायद तैयार नहीं। हाँ वाउंड्रीबाल के भीतर बँधा कुत्ता अगर उसकी मर्जी हो तो भौंक जरूर देता है, लेकिन पड़ौसी नींद टूटने के बाद भी ये सोचकर चुपचाप लेटा रहता है कि कुत्ते हैं वे तो अकारण ही भौंकते रहते हैं।
दुनिया में अकारण भौंकने की कला विकसित की जा रही है। कोई भी नस्ल के नाम पर भौंकने लगता है, कौम के नाम पर भौंकने लगता है और वह यह समझने को तैयार नहीं कि भौंकने से शोर तो हो सकता है, पर लगातार भौंकने से बातचीत संभव नहीं हो सकती। जो लोग अभी भी पुराने कस्बों में रहते हैं, वहां वे अक्सर देखा करते होंगे कि मोहल्ले के देसी कुत्ते चार-चार छह-छह की टोलियों में अपना-अपना इलाका बाँध लेते हैं और दूर से एक-दूसरे पर भौंकते हैं। उनका भौंकना किसी के काम नहीं आता। वे किसी चोर या डाकू को मोहल्ले से बाहर नहीं निकालते।
भारत में बात चलती है कि संस्कृत मूल भाषा है जिससे भारत की अनेक भाषाओं का विकास हुआ है। संस्कृत का संबंध अरबी, फारसी और लैटिन आदि से भी जोड़ा जाता है। भारत के उपनिवेशिक समय में सर विलियम जोन्स ने संस्कृत के मूल भाषा होने और उसका संसार की अनेक भाषाओं से संबंध होने की जो स्थापनाएँ की हैं, अनेक भाषाशास्त्री उनकी बात मानते हैं। अनेक देशों के देवी-देवताओं के नाम संस्कृत में रखे गये नामों के निकट अनुभव में आते हैं।
अब कोई बाहरी शक्ति किसी देश में अपनी जड़ें जमाकर अपनी दुकान लगाने के लिये कोई उपक्रम करे तो हम यह अनुभव कर सकते हैं कि बाजारवाद के दिनों में सबसे पहले भाषा ही उसके काम आती है। वह भाषा को इस तरह तोड़ती-मरोड़ती है कि न नागरिक के रूप में उस देश के लोगों की भाषा बचे और न उन नागरिकों के पास ऐसी कोई अभिव्यक्ति की शक्ति बचे जिससे वे दुनिया की उन बाजारू शक्तियों से बात कर सकें जो उस नागरिक को अपने चंगुल में धर दबोचना चाहती हैं। अब जरा सोचें कि भाषा की चिंता कोई कैसे करे। बाजारवाद के समय में परिवार, कुटुम्ब, रिश्ते, जमीन, जल, सबसे संबंध टूट रहा है। राजनीति के क्षेत्र में अब कोई तोता-मैना नहीं पालता। किसी समय के महाकाव्यों में तोता-मैना बड़े विद्वान होते थे और राजाओं का संदेश ले जाते थे और कभी-कभी तो उनकी पोल भी खोल देते थे। पर आज शक्तिशाली लोग प्रवक्ता रखते हैं। उनके मुँह में वो जुवान डालते हैं जैसे वो तोते के मुँह में किसी प्राचीनकाल में डाला करते थे। प्रवक्ता अपनी भाषा में सोचकर बोलने की हैसियत खो चुका है। सारी शक्ति उस धनपति के पास है जो आज राजनीति और धर्म और दुनिया के विभिन्न समाजों को मनमाने ढंग से संचालित कर रही है।
अब आप यह गाना कैसे गा सकते हैं आसानी से कि - जो भी प्यार मिला, हम उसी को हो गये। क्योंकि दुनिया में तो ऐसी भाषा गढ़ी जा रही है जो बड़े अक्षरों में तो यह कहती है कि आपको शेयर मार्केट में ये लाभ है, लेकिन बहुत बारीक और छोटे अक्षरों में (जिन्हें आपकी आँखें शायद ही पढ़ सकें) यह लिख देती है कि यह बाजार जोखिम के अधीन है यानि जोखिम आपको ही उठाना है। जो शक्तियां जोखिम उठवाने के लिये आपसे शब्दों का नहीं पैसों का रिश्ता बना रहीं हैं लेकिन अपनी जिम्मेदारी से कतरा रही हैं। आपको अगर घाटा हो जाये तो आप इससे ज्यादा क्या कह सकते हैं कि मैं ठगा गया। लेकिन ठगने वाले को इसका भान ही नहीं है, क्योंकि वह ठगने को व्यापार मानता है।
वो जमाने बीत गये जब कबीर दास कहते थे - कबिरा आप ठगाईये और न ठगिये कोय, आप ठगे सुख ऊपजे और ठगे दुख होय। लेकिन यह बात तो इस दुनिया में उलट गई है। किसी दूसरे को ठगने से अब दुख किसी को कहाँ होता है। और हर आदमी यह सुरक्षा खोज रहा कि उसको कोई न ठग पाये, फिर भी वह ठगा जा रहा है।
पृथ्वी पर इस समय ठगी का समारोह चल रहा है। जो लोग इस ठगी से सहमत हैं वे उस भाषा में बोल रहे हैं जिसमें इस तरह लुभाया जा सके कि औरों को ठगकर वे ठगों की जमात का हिस्सा बन सकें। भाषा बाजार के द्वारा एक ऐसी झूठी आशा में बदली जा रही है जिसमें शब्दों की जगह नहीं एक ऐसा मानसिक स्वार्थ है जो मन ही मन अपने आपको साधे रहना चाहता है। कोई नहीं कह सकता कि किसी ने आज तक किसी को सच बोलकर ठगा हो। हाँ भारतवर्ष में एक नाटक जरूर हबीब तनवीर ने खेला था- चरणदास चोर। जिसमें छत्तीसगढ़ी बोली में पंडवानी गायन की तर्ज पर एक गीत गाया जाता है - एक चोर ने रंग जमाया जी, सच बोल के, संसार में नाम कमाया जी, सच बोल के। पर आज चोर बहुत हैं पर वे संसार में सच बोल के नाम नहीं कमा रहे हैं। वे एक ऐसी झूठी भाषा में मनुष्य जाति के बीच वार्ता गढ़ रहे हैं जो न तो वाद है, न विवाद है, न संवाद है। वह कुछ हलफनामों पर लिखी गई ऐसी चुप्पी है जिसके माध्यम से लोग अपना स्वार्थ साधने के लिये चुपचाप दस्तखत कर दिया करते हैं।
बहुत से लोग भारतवर्ष में वर्षों से हिंदी के लिये विलाप कर रहे हैं। और दूसरे लोग भी अपनी-अपनी भाषाओं के लिये विलाप करते रहते हैं। इसका कारण यह नहीं कि लोग अपनी भाषाओं की तरक्की चाहते हैं। इसका कारण यह है कि लोग भाषा के नाम पर एक वोट बैंक में तब्दील होकर उन राजनेताओं की भाषा बोलना चाहते हैं जिन्हें बाजार ने पहले से ही अपनी कोचिंग दे रखी है कि अपने देश के लोगों पर आपको कैसे शासन करना है। संसार में कोई भी भाषा शासन करने के लिये नहीं बनी है। वह तो आपसी सरोकार का एक पुल है जिसे लोग आपस में बातचीत करके सदियों से बाँधते आये हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि पूरी दुनिया में अनेक भाषाओं और बोलियों के पुल टूट रहे हैं और उन टूटे हुए पुलों पर अपनी जान बचाते हुए लोग अपनी आवाज तक नहीं दे पा रहे हैं कि हमें बचा लो, क्योंकि उनकी अपनी-अपनी भाषा पीछे छूट गई है।
दुनिया में अनेक बोलियों और भाषाओं के नष्ट होने की खबरों के बीच अपनी-अपनी भाषाएँ और बोलियां बचाने की बहुत बाचतीत होती है। दुनिया की सरकारें बोली बचाने के लिये फंड निर्मित करती हैं पर जरा ध्यान देकर सोचें कि सरकारें वन, पर्वत, नदी, तालाब सबको बचाने के लिये भी फंड निर्मित करती हैं। पर दिखाई देता है कि यह बच नहीं रहे हैं तो जरा सोचों कि फिर भाषा कैसे बचेगी। किसी भी भाषा को उसको बोलने वाला समाज ही बचाता है। जो समाज अपनी भाषा को बोलना भूल जाता है उसी पर बाजार अपनी भाषा को लाद देता है।

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