ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भाषा का अप्रतिम योद्धा
CATEGORY : प्रसंग 01-Sep-2018 08:09 PM 169
भाषा का अप्रतिम योद्धा

सिर्फ पांचवी कक्षा तक स्कूल गए हाल ही में दिवंगत तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे एम. करुणानिधि ने तमिल भाषा, साहित्य के जरिए राजनीति और समाज में वह स्थान हासिल कर लिया जो हिन्दी में कोई नहीं कर पाया। भाषा मनुष्य के जिंदा होने का प्रमाण है और इसीलिए दुनियाभर में जनभाषा-लोकभाषा लोकतंत्र का। अपनी सहजता सरलता, विविधता के चलते हिन्दी तीन चौथाई हिन्दुस्ताम के बावजूद आजादी के बाद निरंतर अपनी जगह खोती जा रही है। जो हिन्दी भाषा स्कूलों से गायब हो रही हो, कॉलिजों, विश्वविद्यालयों में एक दशक पहले गायब हो चुकी हो उसे क्या मॉरीशस, फिजी, लंदन के विश्व हिन्दी सम्मेदल बचा पायेंगे? भारत भूमि पर इससे बड़ा आडंबर नहीं हो सकता।
वर्तमान सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाये हैं। स्वंय प्रधानमंत्री यथासंभव हिन्दी में ही बोलते हैं। देश और विदेश दोनों में ही। हिंदी उनके रग-रग में है। लोकप्रियता और सक्षमता दोनों का प्रमाण है। इसका असर तो यह हुआ कि जिस भारत सरकार के सचिव, संयुक्त सचिव कभी हिन्दी बोलने में शर्म महसूस करते थे, अब प्रधानमंत्री के सामने भी सरल हिन्दी में बात करते हैं। इससे पहले शीर्ष पर ऐसा कभी नहीं हुआ था। कुछ और वक्त मिला तो निजाम नौकरशाही का अंग्रेजी नशा काफूर हो सकता है। कुछ और कदम भी इस दिशा में सराहनीय रहे हैं। जैसे सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में जो अंग्रेजी कांग्रेसी सरकार 2011 में ले आयी थी बीजेपी सरकार ने 2014 में आते ही उसे हटाया और भारतीय भाषाओं की पुर्नप्रतिष्ठा कायम की। नीट परीक्षा-मेडिकल प्रवेश भारतीय भाषाओं में शुरू हो चुकी है तथा इंजीनियरिंग कॉलेजों से भारतीय भाषाओं में पढ़ने-पढ़ाने के लिए आदेश जारी किये गए हैं, लेकिन यह सब उम्मीद से बहुत कम है।
सबसे डरावनी स्थिति है शिक्षा में लगातार अंग्रेजी का बढ़ता दबदबा। 30 जुलाई 2018 के इंडियन एक्सप्रेस में छपे समाचार के अनुसार उत्तरप्रदेश में 5 हजार, उत्तराखंड में 15 हजार, हरियाणा में 418 सरकारी स्कूल हाल ही में अंग्रेजी माध्यम में बदले गए हैं। दिल्ली समेत अन्य राज्य भी बहुत तेजी से अंग्रेजी माध्यम की तरफ दौड़ रहे हैं और यह पिछले बीस वर्ष से जारी है। शिक्षा की गुणवत्ता इसी अनुपात में कम हो रही है।
सरकार में यह विरोधाभास क्यों है? केन्द्र सरकार - उनकी 22 राज्यों में सरकारें हैं - स्कू्ल भी उनके संगठनों के, फिर अंग्रेजी क्यों? किस संस्कृति की बात फिर सरकार करती है? क्या भाषा के बिना कोई संस्कृति बचती है? संस्कृति की तो छोड़ो समाज भी नहीं बचेगा क्योंकि विदेशी भाषा के आतंक ने उसकी तीन-चार पीढ़ियों की रचनात्मकता कुचल डाली है। अंग्रेजी के दबाव में बच्चेे आत्महत्या तक कर रहे हैं।
ऐसे दौर में हिन्दी अपनी भारतीय भाषाओं के धुरंधरों से सीख सकती है। हाल ही में दिवंगत करुणानिधि इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। एम. करुणानिधि (1924-2018) जैसे तमिल राजनेताओं को उत्तर भारत में हिन्दी विरोधी के रूप में चित्रित किया जाता है। यह सरासर गलत व्याख्या है और राष्ट्रीय एकता के भी खिलाफ। दरअसल वे ऐसे राजनेता थे जो तमिल के पक्ष में कहीं ज्यादा ईमानदारी से जीवन पर्यन्त लड़ते रहे। मुझे व्यक्तिगत अनुभव हुआ लगभग दस वर्ष पहले तमिलनाडु यात्राओं से। तमिलनाडु के ऊ टी नगर में दिसंबर में संसदीय राजभाषा समिति ने रेलवे में राजभाषा हिन्दी की स्थिति को जानने के लिए बैठक रखी थी। हिन्दी नौटंकी से जुड़े किसी भी शख्स को इस बात पर आश्चर्य नहीं होगा कि ऐसी बैठकें ऐसे मनोरम पर्यटन स्थलों पर ही पांच सितारा होटलों में क्यों रखी जाती हैं। सुबह बैठक शुरू होने में अभी देर थी अत: मैं शहर और समाज का जायजा लेने सड़क पर खड़ा था। हर शहर की सड़कों की तरह ही बच्चे अपनी-अपनी बसों के साथ स्कूलों की तरफ दौड़े जा रहे थे। कुछ बच्चों के साथ चलते-चलते बात हुई। ग्यारहवीं बारहवीं के बच्चे विज्ञान के छात्र थे। वनस्पति शास्त्र, रसायन, भौतिकी। लेकिन माध्यम क्या है? यानि पढ़ने पढ़ाने का? तमिल उनका उत्तर था। यही उत्तर था इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र पढ़ने का अधिकांश का। याद दिला दें इनमें कुछ बच्चे कांवेंट स्कूल उर्फ निजी स्कूलों के थे तो कुछ सरकारी स्कूलों के। मैंने रेलवे से जुड़े अधिकारियों से अनुभव साझा किया तो पता चला कि करुणानिधि ने जब 2006 में पांचवी बार मुख्यमंत्री पद संभाला तो तमिल भाषा के पक्ष में लगातार ऐसे कदम उठाये हैं। अपने कार्यकाल में उन्होंने पहले कक्षा दस तक तमिल भाषा साहित्य की पढ़ाई अनिवार्य की और फिर एक सख्त आदेश के तहत यह सुनिश्चित किया कि प्राइमरी शिक्षा का माध्यम केवल तमिल होगा, अंग्रेजी नहीं। विरोध में कुछ सुगबुगाहट जरूर हुई लेकिन यह आज तक लागू है। इसके विपरीत उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली सहित कई राज्यों में अंग्रेजी के पक्ष में बच्चों पर विदेशी भाषा लादी जा रही है।
यह वह दौर था जब केन्द्र में यूपीए की सरकार थी और अंग्रेजी के प्रवक्ताओं साम पेत्रोदा, सिल्दे, थरूर, मनमोहन सिंह का अंग्रेजी के पक्ष में स्वर्णिम काल था। साम पेत्रोदा के ज्ञान आयोग ने अंग्रेजी के पक्ष में ऐसा माहौल बना दिया कि अगले दस वर्ष में सारी दुनिया को अंग्रेजी सिखाने के लिए लाखों शिक्षक भारत ही उपलब्ध करायेगा। इसी राग में राग मिलाते हुए कर्नाटक में कन्नड भाषा पढ़ने-पढ़ाने के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कहा गया कि "बिना अंग्रेजी जाने तो आप चपरासी भी नहीं बन सकते। अत: कन्नण सीखना न सीखना अभिभावकों, बच्चों के ऊपर छोड़ देना चाहिए।" लेकिन अंग्रेजी के पक्ष में चलने वाली ऐसी किसी भी हवा का असर तमिल माध्यम से पढ़ने वाले तमिलनाडु पर नहीं पड़ा। उल्टे उन्हीं 2009-10 के वर्षों में तमिलनाडु अकेला राज्य था जिसने इंजीनियरिंग पढ़ने वाले छात्रों की ॠक्ष्ककक प्रवेश परीक्षा से अपने को अलग कर लिया। आईआईटी की तरह यह परीक्षा भी पूरे देश के इंजीनियरिंग कॉलिजों के लिए थी। यहां भी उनकी पक्षधरता तमिल माध्यम से पढ़ने वाले अपने विद्यार्थियों के साथ थी कि वे तमिलनाडु के कॉलिजों में ही पढ़ेंगे जहां तमिल भाषा में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी के साथ उपलब्ध है। मदुरै, तंजावुर के मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलिज शायद देश के पहले ऐसे प्रतिष्ठान होंगे जहां भारतीय भाषा-तमिल में पूरी शिक्षा उपलब्ध है। तमिलनाडु के दूसरे विश्वविद्यालयों में, स्कूलों में भी अपनी भाषा में पढ़ने का विश्वास अंग्रेजी के आतंक के बावजूद अभी भी कायम है। दो वर्ष पहले मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट भारतीय भाषाओं में कराने के पीछे भी तमिलनाडु सरकार का दबाव रहा है। नतीजा आज उर्दू, मलयालम, तमिल सहित आठ भाषाओं में मेडिकल प्रवेश परीक्षा दे सकते हैं। मौजूदा सरकार द्वारा भोपाल के अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिन्दी में शुरू करने की बात तो हाल में की है। इसमें भी अभी बहुत सफलता नहीं मिली।
अपनी भाषाओं में पढ़ने-पढ़ाने का कहीं ज्यादा श्रेय दक्षिण के राज्यों को जाता है विशेषकर तमिलनाडु को। याद कीजिए वर्ष 2011 में तत्कालीन सरकार ने सिविल सेवा परीक्षा के प्रारंभिक चरण में ही अंग्रेजी जोड़ दी थी। नतीजा सारी भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले बाहर। अंग्रेजीदां यूपीए सरकार यहीं नही रुकी। 2013 में सिविल सेवा परीक्षा की मुख्य परीक्षा में भी भारतीय भाषाओं के खिलाफ ऐसे नियम बनाए कि विरोध में संसद तक ठप्प हो गयी। लेकिन इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले सबसे पहले थे, जयललिता की पार्टी के तमिल और महाराष्ट्र के शिवसेना के संसद सदस्य। हिन्दीं पट्टी उर्फ गोबरपट्टी के रहनुमा तो माध्यम भाषा और पढ़ने-पढ़ाने के अंतर को भी मुश्किल से समझ पाते हैं। संसद से सड़क तक युवाओं के प्रतिरोध ने सरकार के 2013 के निर्णय को तो वापस किया ही, अगस्त 2014 में उस अंग्रेजी को भी सी-सैट परीक्षा से निकाल दिया जो वर्ष 2011 में बिना संसदीय प्रक्रिया, विचार-विमर्श के लाद दी गयी थी।
अपनी भाषा के पक्ष में तमिलनाडु में यह तेवर आज भी कायम है। हिन्दी वालों को इससे सीखना चाहिए। इसका सबसे बड़ा श्रेय करुणानिधि को जाता है। वर्ष 2006 में उनके प्रयासों से तमिल क्लासिक भाषा घोषित हुई। उच्चतम स्तर तक तमिल भाषा को बढ़ाने के लिए अध्ययन पीठ खुले, शब्दकोश निकाले गए और अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं से अनुवाद किए। पिछले कुछ दशक से करुणानिधि का जन्मदिन तमिल भाषा में लिखने वाले साहित्यकारों के लिए एक सौगात के रूप में मनाया जाता रहा है। जब वे अस्सी वर्ष के हुए तो अस्सी साहित्यकारों को पुरस्कार, पेंशन आदि सुविधाएं दी गईं, जब नब्बे वर्ष के हुए तो और नब्बे लोगों को। केवल देश में ही नहीं विदेशों में मलेशिया, फ्रांस आदि जगहों पर अंतर्राष्ट्रीय तमिल संगम आयोजित किए गए। करुणानिधि सत्ता में रहे हों या बाहर तमिल भाषा साहित्य के प्रति उनका अनुराग सदा अनुकरणीय रहा। और इसलिए इस राजनेता ने तमिलवासियों के दिल पर पचास वर्ष से ज्यादा राज किया।
यों 1967 में कांग्रेस तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी आंदोलन के तूफान से ऐसी बाहर हुई कि कभी फिर पैर नहीं टिका पायी। एमजी रामचंद्रन, करुणानिधि, अन्नादुराई से लेकर जयललिता की पहली प्राथमिकता तमिल भाषा रही है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। आखिर लोकतंत्र में लोक सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। यानि कि उसकी भाषा, साहित्य तमिल भाषा पर आग्रह करने से तमिलनाडु विकास की गति में पीछे रहा? नहीं। बल्कि लगभग दो दशक तक विदेशी कंपनियों की पहली प्राथमिकता तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्य रहे हैं। कानून व्यवस्था, सड़क, सफाई, विकास दर, लिंग अनुपात, स्त्री शिक्षा, कल्याणकारी योजनाएं सभी में तमिलनाडु बेहतर स्थिति में। सामाजिक न्याय के पक्ष और धर्म निरपेक्षता के मानदंडों पर भी।
और हां अंग्रेजी भी तमिलभाषी हिन्दी प्रदेशों से बेहतर जानते, समझते, लिखते हैं। क्योंकि अपनी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने से जो समझ पैदा होती है उसके बाद किसी भी विदेशी भाषा को पढ़ना, समझना ज्यादा आसान होता है।
भाषा साहित्य की इसी विद्वता के नाते उन्हें तमिल जनता प्यार से कलाकार नाम से पुकारती थी। दरअसल एक अत्यंत पिछडे समाज में पैदा हुए करुणानिधि की शिक्षा तो केवल पांचवी तक ही हो पायी लेकिन अपने अध्ययन के बूते वे साहित्य की सीढियां लगातार चढ़ते गए। पत्रकारिता की, फिल्मों के लिए पटकथाएं लिखीं, कविता, कहानी सब कुछ। और हाल में नब्बे वर्ष की उम्र तक। जीवन के शुरुआत में ही पराशक्ति फिल्म, जिसने शिवाजी गणेशन को रातों रात स्टार बना दिया, उसकी पटकथा करुणानिधि ने ही लिखी थी। तमिल साहित्य, भाषा के रास्ते फिल्मी दुनिया से राजनीति के सर्वोच्च शिखर तक जो मुकाम हासिल किया उसे बेमिसाल ही कहा जाएगा। इन सभी पटकथाओं में समाज सुधार की चेतना है- जाति व्यावस्था, ब्राह्मणवाद, मूर्ति पूजा, अस्पृश्यता का तीखा विरोध। वे सरेआम अपने को नास्तिक कहते थे। लेकिन फिल्मों में उन्होंने धार्मिक मिथकों, कहानियों का भरपूर उपयोग किया या कहें सामाजिक सुधार, बरावरी की भावना के लिए। साहित्य, भाषा की इससे बड़ी उपलब्धि, कामयाबी क्या हो सकती है।
गांधी इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। वे गुजराती थे। पढ़े भी विदेश में थे और फिर 20 वर्ष भारतभूमि से दूर दक्षिण अफ्रीका में गुजारे। लेकिन 1914 में भारत में पैर रखते ही उन्हें एहसास हो गया कि लोक की समस्याएं समझने के लिए किस भाषा की जरूरत है। अपनी अपनी भाषाओं के साथ पूरे देश के लिए उन्होंने हिन्दुस्तानी की वकालत की और सभी ने मानी भी। मौजूदा प्रधानमंत्री की सफलता का सबसे बड़ा कदम भी जनता की भाषा में बात करना है। यहां हिन्दी के बुद्धिजीवी, लेखकों ने भी धोखा दिया है। वे ऐसी भाषा में ऐसे जीवन की कथा-कविता लिख रहे और तिकडमों से वाहवाही और पुरस्कार लूट रहे हैं जो जनता को मंजूर नहीं है। नतीजा हिन्दी पाठक हिन्दी से और दूर हो रहा है। क्या यह अचानक है कि हाल ही में दिवंगत कवि नीरज की स्वीकार्यता केदारनाथ सिंह, कुंअर नारायण जैसे पुरस्कृत कवियों से कई गुना ज्यादा है। हिन्दी लेखकों को यह समझना होगा। करुणानिधि का तमिल प्रेम भी इसी का उदाहरण है और हिंदी को सबक भी। अपनी भाषाओं से सभी को लगाव होता है और होना भी चाहिए। अंग्रेजी से मुकाबला इसी सोच और रणनीति से संभव है। अंग्रेजी के पीछे भागते हिन्दी पट्टी के राजनेताओं, लेखकों, बुद्धि-जीवियों को करुणानिधि से सीखने की जरूरत है।

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