ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मसूरी प्रशिक्षणका आरंभ और मेरा बिहारी अख्खडपन तीसरी किस्त
01-May-2019 04:50 PM 363     

तेरह जुलाईको मसूरी अकादमी पहुंचनेवाले प्रशिक्षणार्थियोंमें मैं और राजी बिलकुल शुरुआती थे। रिसेप्शनपर पहले कमरा बताया गया और कहा गया कि सामान रखवाकर, आरामसे 1 बजेके बाद आना - कई कागजात भरवाने हैं। यहीं मुलाकात होती है अगमचंदसे - अगले वर्ष तकका हमारा पर्सनल अटेण्डण्ट। उसके जिम्मे लेडीज होस्टेलके छः कमरे थे और हरेकमें चार प्रशिक्षणार्थी। लेकिन पूरे वर्षभरमें कभी किसीको एक बार भी शिकायतका मौका उसने नहीं दिया इसीसे उसकी कर्तव्यदक्षता समझी जा सकती है। पहले ही दिन उसने टिप दी - आपके गरम कपड़े और रजाई मसूरीकी ठंडकके लायक नही हैं। मैं तुरंत रजाई बनाने वालेको और कोटके टेलरको बुलाता हूं। दोपहरमें मसूरी मार्केट जाकर दो गरम स्वेटर खरीद लेना। छातेसे काम नहीं चलेगा, यहाँ रेनकोट चाहिये। इत्यादी।
हमारा एक बड़ासा कमरा था जिसमें पार्टीशन डालकर दो हिस्से बनाये थे। इस तरफ मैं और राजी तथा दूसरे हिस्सेमें ललिता और रुक्मिणी। शाम होते होते पूरा लेडीज होस्टेल भर गया था। घूमने निकले तो देखा कि लड़कोंवाले साइडमें भी सारे होस्टेल भरे थे। इस मेन बिÏल्डगमें करीब 400 के रहनेकी व्यवस्था थी। बाकी करीब 800 प्रशिक्षणार्थी बाहरी बिÏल्डगोंमें थे।
उन दिनों सभी सर्विसेस मिलाकर लगभग हजार-बारहसौ प्रशिक्षणार्थी हो जाते थे जो सभी एक साथ मसूरी अकादमीमें फाउंडेशन कोर्सके लिये आते थे। 6 महिने पश्चात् वे अपने-अपने सर्विसके अनुसार देशभरमें अवस्थित ट्रेनिंग अकादमीमें चले जाते औऱ केवल आईएएस प्रशिक्षणार्थी अगले कोर्सके लिये रह जाते। जैसे-जैसे वर्ष बीतते हैं, प्रशिक्षणार्थियोंकी संख्या घटती बढ़ती रहती है।
दोपहर तक हम लोगोंने कई कागजात भरे जिनमें एक ज्वाइनिंग रिपोर्ट भी था। सबको एक टाइप किया कागज पकड़ाया गया जिसमें एक शपथ लिखी हुई थी। अगली सुबह उसे कक्षामें ले जाना था।
अगली सुबह डायरेक्टर श्री राजेश्वर प्रसाद आये। खचाखच भरे हॉलमें सभी चुने हुए अफसरोंको शपथ दिलाई गई कि हम संविधानके प्रति एकनिष्ठ रहते हुए देशकी सेवामें पूरा कौशल लगा देंगे। फिर डायरेक्टरने एक लम्बासा भाषण दिया जिसमें उन्होंने स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्रीके कुछ किस्से सुनाये। वे कभी शास्त्रीजीके सचिवके नाते काम कर चुके थे। शास्त्रीजी मेरे व कईयोंके हीरो थे। इसलिए वे व्यक्तिगत अनुभववाले किस्से मनको छू गये। उसी रौमें उन्होंने सबको बता दिया कि सभीको बारीबारीसे सप्ताहमें दो दिन श्रमदान करना होगा।
धीरेसे बात समझाई गई कि यहाँ की रूटीन बहुत ही कड़ी होगी। सुबह पांच बजे या तो घुडसवारी जो आईएएस व आईपीएस के लिये अनिवार्य और बाकी सबके लिये ऐच्छिक थी, या फिर पीटी, या योग, या श्रमदान। फिर नौ बजेसे शाम 5 बजेतक लेक्सर्स। बीचमें टी ब्रेक, लंच ब्रेक भी। परीक्षा भी होगी और पास होना अनिवार्य होगा। इसके अंकोंके कारण आपकी सिनिऑरिटी आगे पीछे हो सकती है। कईयोंको इसका अर्थ समझ नहीं आया और वे बेपरवाह रहे तो कई दूसरे जी जानसे अधिक नंबर लानेके प्रयासमें जुट गये।
पढ़ाईके विषय थे संविधान, पोलिटिकल थियरीज, पब्लिक अॅडमिनिस्ट्रेशन। साथमें क्रिमिनल लॉकी त्रिविध घुट्टी अर्थात् एविडंस अक्ट, क्ष्घ्क् एवं क्द्धघ्क् इसके अलावा क्दृदद्मद्यत्द्यद्यद्वद्यत्दृद दृढ क्ष्दड्डत्ठ्ठ और हिंदी। बीच बीचमें कोई खास खास लेक्चरर्स भी आते तो उनके पाठके स्नॅप टेस्ट इत्यादी।
क्रिमिनल लॉ पढ़ानेवाले श्री गुरुमूर्ति और उनका तरीका मेरे प्रिय बन गये। वे कभी सेशन्स जज रह चुके थे। मेरी आईएएस की परिक्षाके लिये भी मैंने कॉण्ट्रॅक्ट अॅक्ट विषय चुना था और पटना युनिवर्सिटीके कोचिंग क्लासेसमें उसे पढ़ानेवाले रमाकान्तजी भी बड़े धाकड शिक्षक थे। इन दोनोंके कारण मुझे लॉकी अच्छी समझ हुई थी जो पूरी नौकरी भर काम आई।
हिंदीके लिये मुझे व कइयोंको छूट मिल चुकी थी। लेकिन राजी, जलजा, जैसे कुछ प्रशिक्षार्थियोंको हम पढ़ा दिया करते थे। कम्प्युटर्सकी पढ़ाई अतीव प्राथमिक थी - उसका अल्गोरिथम, प्रोग्रामिंग प्रिन्सिपल्स या फिर बेसिक या कोबाल्ट जैसी लग्वेजेस, इतने भरतक कम्प्युटरकी पढ़ाई सीमित थी। इसे पढानेवाले श्री चंद्रशेखर रेलवे इंजिनियरिंग सर्विसेसके अधिकारी थे। रेलवेमें संगणकके प्रयास तब अधिकतासे चल रहे थे, उसके कई किस्से वे सुनाते - कभी कभी सिस्टमकी अदूरदर्शिताकी भी बातें होती थीं।
पब्लिक अॅडमिनिस्ट्रेशन तथा पोलिटिकल थिअरिज - ये दोनों मेरे अप्रिय विषय थे। पब्लिक अॅडमिनिस्ट्रेशनके क्लासमें शुरुआती दिनोंमें ही मेरा विवाद छिड़ गया। श्री चारी महाराष्ट्र काडरके एक वरिष्ठ आईएएस यह विषय पढ़ाते थे। ब्यूरोक्रसीके विषयमें पढ़ाने लगे -- ब्यूरोक्रसी इम्पर्सनल होती है। मैंने टोक दिया - नहीं हो सकती, जो निर्णय लेनेवाला अधिकारी है, उसकी पर्सनल मान्यताएँ उसके निर्णयको अवश्य प्रभावित करेंगी। लम्बा विवाद चला। मैं तब भी स्टूडेण्टकी भूमिकामेंही विचार कर रही हूँगी। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी होते होंगे - पर मुझे यदि गलत प्रतीत होता है तो शंका समाधान होनेतक प्रश्न पूछना और विवाद करना मेरा हक बनता है, यही समझकर मैं बहस करती रही।
यह अख्खडपन एक नितान्त बिहारी गुण है और मराठी गुण भी। तो मुझमें कुछ अधिकतासे ही आ गया है। पूरे क्लासमें जो जो पहलेसे ही पब्लिक अॅडमिन पढ़कर आये थे वे कह रह थे - क्यों बहस करती है - यह तो बिलकुल प्राथमिक ज्ञानकी बात है। पर कई लोग मेरा सपोर्ट भी कर रह थे। आखिर क्लास रोककर सबको छुट्टी दी गई। जाते हुए उन्होंने इतना अवश्य कहा कि परीक्षामें ऐसा ही उत्तर लिखोगी तो नंबर नहीं मिलनेवाले। तब कुछ शुभचिन्तकोंने समझाया -- तुम्हें महाराष्ट्र काडर मिल गया तो ये तुम्हारे सीनियर होंगे - फिर तुम्हें मजा चखायेंगे।
लेकिन यह समझाना बेकार रहा - उस दिनसे आजतक मेरी मान्यता यही है की ब्यूरोक्रसी इम्पर्सनल नहीं हो सकती और होनी भी नहीं चाहिये। इसमें आनेवाले हर व्यक्तिका अपना व्हॅल्यु सिस्टम होता है - अर्थात् अपना नैतिकताका मापदण्ड। उसके द्वारा किया जाने वाला निर्णय तथा काम वह इसी मापदण्डके आधारसे करता है। नियमोंके दायरेमें रहकर भी वह अपना मापदण्ड लगा सकता है, जब चाहे नियमोंके जंजालसे रास्ता निकाल सकता है और दूसरोंको प्रभावित कर सकता है। इस संबंधमें मेरे कार्यकालके अन्तिम वर्षोमें घटी एक घटना उल्लेखनीय है।
मेरे कार्यालयके दो ऐसे अधिकारी थे जिनकी क्षमता तो थी लेकिन मनोयोगसे काम नहीं करते थे। मैं काम नहीं करता, कौन मेरा क्या उखाड लेगा - वाला रवैया था। मैंने सप्ताहमें एक दिन सभी अधिकारियोंके साथ आधा घंटा चायहेतु रखा था - तब हम फाइलोंकी बात नहीं करते थे। तो एक दिन मैंने सबसे पूछा - यदि कभी आप घरपर परिवार व बच्चोंके साथ ऑफिसकी चर्चा करते हैं तो क्या बताते हैं? या तो आप कह सकते हैं कि देखो मैं कितना स्मार्ट हूँ, सरकारको कितना बुद्धु बनाता हूँ, कि बिना काम किये ही पूरी पगार लेता हूँ। या आप कह सकते हैं कि आज मैंने अपनी फाइलमें ऐसा ऐसा निर्णय लिया जिससे देश एक डगही सही पर आगे बढ़ा है। दोनों ही कारणोंसे आप परिवारको कह सकते हैं कि उन्हें आपपर गर्व होना चाहिये।
प्रायः सभीने ना में सिर हिलाया। "नहीं, पहली बात कहकर हम उन्हें गर्वकी भावना नहीं दे सकते।"
चाय समाप्त हुई - बात आई गई हुई। अगले कुछही दिनोंमें मैंने महसूस किया कि उन दोनों अधिकारियोंके काम करनेका तरीका बदल गया था। अब मैं किसी भी फाइलकी या कामकी जिम्मेदारी उनपर डाल सकती थी। वही आकर मुझसे चर्चा करने लगे कि इस कामको ऐसे ऐसे अधिक प्रभावी किया जा सकता है।
काश की हमें पब्लिक अॅडमिनमें यह पढ़ाया जाय कि अधिकारियोंका पर्फोर्मंस इम्पर्सनल नहीं होता बल्कि उनके व्यक्तिगत नैतिक मापदण्डके आधार पर चलता है। जब यह बात समझमें आयेगी और उसी आधारसे प्रतियोगी परिक्षाओंमें चयन होगा, तब ब्यूरोक्रसीमें अलगसे अॅडमिनिस्ट्रेटिव्ह रिफॉम्र्सकी आवश्यकता नहीं रहेगी।
(क्रमश:)

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