ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दूरदेश में कविता के टेर
02-Jul-2019 10:47 AM 622     

हिंदी काव्य तरंग एक ऐसी काव्य-धारा है जो विश्व के हर सम्भाव्य स्रोत से निकलकर बहती हुई साहित्य निधि में अनुवृद्धि कर रही है। भिन्न स्रोतों से बहती हुई चेतन काव्य-धारा की चुनिंदा काव्य तरंगों को जोड़कर इस संकलन पुस्तक रूप में समाहित करना एक प्रायोगिक प्रस्तुति है। इस संग्रह से जुड़े हुए सभी रचनाकारों का साहित्य और हिंदी भाषा से प्रेम उनकी व्यक्तिगत पसंद है और यही इस पुस्तक की ख़ास बात भी है। इस पुस्तक से जुड़े हुए रचनाकारों का व्यवसाय अध्यापन, चिकित्सा, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, सामरिक सुरक्षा, व्यापार और संचार माध्यम जैसी विविधता लिए हुए है। अनेक कवियों की मातृभाषा भी हिंदी से हट कर है, जैसे डोगरी, पंजाबी, बंगाली, मैथिली, मारवाड़ी, हरियाणवी, उर्दू और पस्तो। अपनी मूल भाषा से अलग हटकर हिंदी में लिखे गए साहित्य में उनकी ज़बान की ख़ुशबू भी बख़ूबी आती है। हर एक का व्यवसाय उन्हें अलबत्ता साहित्य से अलग-थलग कामों व्यस्त रखता रहा है, लेकिन अपने अदब और साहित्य के प्रेम को इन सृजनकारों ने अपने जीवन का एक पुंज बनाकर निरंतर ऊर्जा व ईंधन दिया है। यही वज़ह है कि इस संकलन का हर रचनाकार अपने एक नवीनतम चिंतन को साहित्यिक विधा से जोड़ता हुआ नज़र आता हुआ अपनी भरपूर सक्षमता से हिंदी साहित्य में श्रीवृद्धि कर रहा है।
किसी भी लेखक का सृजन उसके भाषा प्रेम, साहित्य से लगाव व समझ और उसकी धरोहर संस्कृति के लिए अटूट श्रद्धा का भान कराती है। इसके अतिरिक्त जो लेखक शौकिया लेखन के स्तर से ऊपर आ चुके होते हैं, उन्हें सृजन की बारीकियाँ भी बाक़ायदा नज़र आती हैं और वह इन बारीकियों को अपनी रचनाओं में बखूबी उतारते भी हैं। यह हिंदी काव्य संकलन भारत से दूर रह कर अमेरिका व अन्य देशों में भी रचे जा रहे उत्कृष्ट हिंदी साहित्य का सही मायने में अभ्यावेदन भी है। 16 चुने हुए कवियों के इस संकलन में हर कवि को इस पुस्तक में सदृश स्थान दिया गया है। इस संकलन में वर्तमान की समाज-स्थितियों से वार्तालाप करती हुई समकालीनता रचनाएँ है और वर्तमान से सुरुचिपूर्ण पलायन करती हुई भावात्मक अभिव्यक्तियाँ भी हैं। समय की काव्य स्वरूप निरंतर यात्रा के यह सहचर अपनी संवेदना में भाव, गतिविधि, दर्शन, विसंगति, समस्या, प्रकृति, प्राकृतिक परिवेश एवं पर्यावरण से अवगत हैं। उनकी रचनाओं में जीवन के तनाव, दर्द और मूल भावनाओं, मसलन - खीझ, तिलमिलाहट, दर्द, नफरत, मोहब्बत आदि की उत्सुकता और छटपटाहट का बोध उनकी काव्य-यात्रा में शामिल प्रतीत होता है। इस संकलन में कवियों ने मानव के इन मार्मिक भावों की अभिव्यंजना को अलग अलग रूप से अपनी कविता में सार्थकता प्रदान की है। इन अनुभूतियों की सूक्ष्म, लेकिन सुदृढ़ भावनाओं को तीस से लेकर सत्तर के दशक तक के फैले हुए कवियों के अनुभवी विस्तार को एक ही सूत्र में पिरोया गया है। इस काव्य संकलन में कवियों की रचनाएँ उनके पहले नाम के अकारादि क्रम से है।
हिंदी काव्य तरंग की भावनाओं का सम्पूर्ण आनंद उठाने के इस काव्य धारा में डुबकी ही लगानी पड़ेगी। अलबत्ता इसकी कुछ फुहारों का आनंद आप सभी से बाँटने के प्रलोभन को मैं रोक नहीं पा रहा हूँ।
जैसे कि शायर अनिमेष चंद्र "माहताब" की संवेदन-शीलता :
जंग तो जीते थे पर ख़ुशियाँ मनाते कैसे हम,
खून से लिपटे हुए सब जीत के परचम मिलेे
अभिनव शुक्ल, संसार की सबसे बहुमूल्य निधि पर :
जैस मीठे से संतूर पे, राग कोई मधुर सा बजे,
सात रंगों को संग में लिए, आसमां पे धनुष सा सजे,
जैसे महकी सी फुलवारियां,
घर में बेटी की किलकारियां
संवेदनशील कवियत्री अमिता तिवारी, समाज-विशेष की बर्बरता पर :
आज जब सब स्तब्ध हैं
नर पशुओं की दरिंदगी से त्रस्त हैं
हर तरफ उनके लिए मौत की मांग है
ऐसे में मेरी भी एक मांग है
कि एक बार मुझे उनकी माताओं से मिलाया जाए
कवि और शायर अशोक सिंह, जीवन के तज़ुरबे की बात करते हैं :
जब तलक यार न दो चार गँवाये तब तक,
कहते क्या सीखा यूँ ही उम्र निकाली हमने।
कवि अशोक व्यास जीवन चक्र की दुविधा पर :
जीवन का आधार बता दे,
नित्य प्यार का सार बता दे
जिसको विदा नहीं कहना है,
मुझको वो संसार बता दे
युवा कवियत्री आस्था नवल सम्बंधों में सार्थकता पर :
तन नहीं, आत्मा को छू पाओ तो कोई बात बनेे
कवियत्री इला प्रसाद आज की पीढ़ी की लड़कियों को संदेश देते हुए :
मत रहो घर के अन्दर
सिर्फ़ इसलिए
कि सड़क पर खतरे बहुत हैं।
शायर नरेंद्र टंडन उर्दू भाषा की चाशनी टपकाते हुए रूमानी हो कर :
आमदे-ख़्याल तिरा कि ज्यूँ,
दबे पांव माहौले-ख़िज़ा में बहार आए,
ठहर के जाना तू, ऐ नसीमे-सहर,
कि कली-ए-नौशुगुफ़्ता को, शबाब-ओ-क़रार आए।
कवियत्री बबिता श्रीवास्तव प्रेम के रंग से ओत-प्रोत हैं :
कानो में घोल गया मधुर कोई गीत
बज उठा चारों ओर रुन झुन संगीत
शायरा रजनी प्राण की संवेदनशीलता :
कितने पंछी उड़ानों में मर गए होंगे,
चाँदनी रातों में जुगनू बिखर गए होंगे।
गीतकार राकेश खंडेलवाल के श्रृंगार रस की झलकियाँ :
उर्वशी के पगों से महावर लिए
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये
मीठी ज़ुबान की कवियत्री रानी नगिंदर की ख़ुश मिजाज़ी और दार्शनिकता :
पतझड़ ये ज़िंदगी में मेरा मुस्तकिल नहीं
मिलना बहार में कभी फिर आ के दोस्तों।
शायर रामजी सेठी "माहताब" हिंदी ज़ुबान में :
मानस ही कवि, मानस भ्रमर है, मानस प्रेम पुजारी,
प्रेम चिन्ह का नाम है राधा, मानस कृष्ण मुरारी।
कवि वर लक्षमण सिंह प्रेम की परिभाषा के साथ :
नूपुर हीन प्रीति के पग की
क्या झंकार, सुन सकोगे प्रिय?
ग़ज़ल गो स्वदेश राणा सूखे पत्तों पर टहलने की तमन्ना लिए हुए नया आसमान ढूँढ़ती हैं :
ज़मीं से आस्मां के बीच, बस थोड़ी सी दूरी है
सफ़र ही इतना लंबा था, क़दम रुक रुक के चलते है
स्त्री के प्रति समाज की विषमता दर्शाती कहानीकार, कवियत्री सुषम बेदी :
वक़्त की कुछ हवाएँ
निकल गई थी उस पर से
बस, बस और कुछ नहीं
फिर लड़की अदृश्य क्यों है
दिखाई क्यों नहीं देती।
अंत में, हिंदी काव्य तरंग हिंदी कविताओं का एक संकलन ही नहीं है अपितु नवयुग में साहित्यिक वैश्वीकरण को परिभाषित करता हुआ उदाहरण है। मुझे उम्मीद है हिंदी काव्य तरंग साहित्य की दुनिया के दायरे को बढ़ाने में सफल होगा। पाठक भी इस संकलन की किसी न किसी रचना के साथ जुड़ना पसंद करेंगे चाहे वह उनको अपने किसी अनुभव की याद दिलाती हो या मन में ये ख़्वाहिश पैदा करती हो कि काश ये अनुभव मेरा भी होता।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^