ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
तरक्की की कीमत
01-Jan-2018 03:02 PM 1996     

प्रवासी देशों में रहने वाले भारतीयों के हिंदी बोलने के बारे में बात करें तो हमें यह सोचना होगा कि हिंदी को हम कितना जानते हैं। देखा जाए तो हिंदी भाषा तमाम भाषाओं से मिलकर बनी है। इसमें पारसी, फारसी, टर्किश, अरबी, चीनी व पोर्तुगीज आदि भाषाएँ ऐसे घुल मिल गयी हैं जैसे दूध में चीनी या चीनी में दूध। जिस तरह हम मसालेदार चाय पीते हुए और उसका जायका लेते हुए उसमे पड़े मसालों के बारे में नहीं सोचते उसी प्रकार किसी भाषा को बोलते हुए भी हम उसमें इस्तेमाल किये जाने वाले अन्य भाषाओं के शब्दों का विश्लेषण नहीं करते। जिसे अपना लो बस वही अपना हो जाता है। भाषा के बारे में सोचते हुए एक और मजेदार बात है कि जो भाषा जिस देश में बोली जाती है उसे वहाँ के जानवर भी समझते हैं। जिस तरह भारत में कुत्ते-बिल्ली व अन्य पशु-पक्षी हिंदी को समझते हैं उसी तरह चाइनीज कुत्ते-बिल्ली भी चाइनीज समझते हैं और जापानी कुत्ते-बिल्ली जापानी।
हर भाषा अपने एक नाम से ही जानी जाती है। और यही बात हिंदी के संग भी है। इसलिए उसमें मिले-जुले अन्य भाषाओं के शब्दों की गहराई में न जाकर हम अपनी हिंदी के बारे में और भी बातें करते हैं और चलते हैं प्रवासी देशों की तरफ। जहाँ बरसों पहले तमाम भारतीय अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में भारत से आये और फिर वहीं बस गए। देखते हैं कि उन हिन्दी भाषी लोगों के बच्चों पर हिंदी का किस तरह और कितना प्रभाव पड़ रहा है। दुनिया के उन तमाम देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय अंग्रेजी बोलने के साथ उस देश की भाषा को भी कम या अधिक बोलना सीख लेते हैं। लेकिन अपनी मातृभाषा हिंदी के संग उनका क्या रवैया है इस बात पर अक्सर लोगों की जिज्ञासा रहती है।
भारत से आने वाले कुछ अधिक शिक्षित परिवारों ने हिंदी में बोलने की बजाय अपने बच्चों के साथ अंग्रेजी में ही बात करना अपनी शान समझी। और छुट्टियों में भारत जाते समय अपने बच्चों को कुछ हिंदी शब्द सिखा देते थे। ऐसे परिवारों में हिन्दी की शब्दावली कम होती गयी। लेकिन कुछ ऐसे भी अपवाद हैं जहाँ उच्च शिक्षित परिवारों ने अपने पारिवारिक जीवन में हिंदी में ही बातचीत करना अपना गौरव समझा ताकि उनके बच्चे अपनी जड़ों से जुड़े रहें। इसके अलावा ऐसे परिवार भी हैं जिनमें भारत से आये हुए लोग अंग्रेजी बोलने में अधिक निपुण न होने से अपने बच्चों से हिंदी में ही बात करते रहे और अपने भारतीय समुदाय व मित्रों के बीच हिंदी भाषा को ताज पहनाये हुए हैं।
बच्चों से हर समय हिंदी में ही बोलने से उनके बच्चे अंग्रेजी के साथ-साथ अच्छी हिन्दी भी बोलना सीख गए हैं और अपनी संस्कृति से भी जुड़े हैं। इस तरह के बच्चों का हिंदी उच्चारण भी बहुत कमाल का है। वह बच्चे हिंदी के कुछ मुहावरे व हिंदी में हँसी-मजाक की बातें भी करना जानते हैं। यह सब देखकर बड़ा अच्छा लगता है। पर जो बच्चे बचपन से हिंदी नहीं बोलते उनमें से कुछ बड़े होते हुए थोड़ी सी हिंदी जान जाते हैं पर उन्हें लिखना-पढ़ना फिर भी नहीं आता। बड़े होते हुए उनका जीवन इतना व्यस्त होता जाता है कि वह लोग हिंदी भाषा को सीखने का समय ही नहीं निकाल पाते और अपने जीवनयापन में आगे बढ़ते हुए इस तरफ से बेखबर रहते हैं। जिस जीवन को वह जी रहे हैं या जिस देश में वह रह रहे हैं यह उनका दोष नहीं बल्कि उसी के रंग में वह स्वाभाविक रूप में रंग जाते हैं और फिर उसी रंग-ढंग में उन्हें जीने की आदत हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि कच्ची मिट्टी को जिस तरह चाहो उस तरह गढ़ लो लेकिन उसके पकने के बाद उसे कोई और आकार देना मुश्किल हो जाता है। भाषा सीखने के बारे में भी यही कहा जाता है कि जिस भाषा को बचपन से सीखो वह रगों में बहने लगती है और बड़े होकर भी उसका प्रवाह बना रहता है।
यहाँ लंदन की हवा में रहने वाले कुछ युवा पीढ़ी के लोगों को, जो हिंदी भाषा भी जानते हैं, सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। साहित्यिक गोष्ठियों में उन्हें ससम्मान आमंत्रित किया जाता है ताकि उनमें हिंदी के प्रति सम्मान व जागरूकता बनी रहे और उनसे उम्मीद की जाती है कि उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भी उनसे प्रभावित होकर हिन्दी सीखेंगी व बोलेंगी। यहाँ के कुछ स्कूलों में भी हिंदी व संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है। और भारतीय बच्चों के साथ कुछ अंग्रेज बच्चे भी हिंदी सीखने लगे हैं। अंग्रेज बच्चों की हिंदी में दिलचस्पी का कारण शायद वालीवुड के गाने व फिल्में हैं। जो भी कारण हो यह एक हर्ष की बात है कि इस तरह धीरे-धीरे अंग्रेजी में भी हिंदी की बिंदी लग रही है।
इस बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि पुरानी पीढ़ी के अलावा नई पीढ़ी के जो लोग भारत से आकर रह रहे हैं वह हिंदी को लेकर अपने बच्चों के लिए अधिक चिंतित व सतर्क हैं। और चाहते हैं कि उनके बच्चे अपनी मातृभाषा व संस्कृति के संपर्क में रहें। इसलिए वह अपने बच्चों से घर में निरंतर हिंदी में बातें करते हैं। बाहर जाने पर सुपरमार्केट, ट्रेन, बस स्टॉप या पार्क जैसी जगहों में जब भी ऐसे बच्चों को हिंदी में बात करते हुए देखती हूँ तो मैं उनसे बहुत प्रभावित होती हूँ और अपनी भाषा को लेकर दिल में एक तरह का सुकून सा मिलता है। भारत में जहाँ तमाम युवा अंग्रेजी भाषा व पश्चिमी सभ्यता में रंग रहे हैं वहीं ऐसे भी लोग हैं जो अपना देश छोड़ने के बाद हिंदी का महत्त्व महसूस कर रहे हैं। कई बार वह इंग्लिश और हिंदी को मिलाकर भी बोलते हैं जिसे हम हिंगलिश कहते हैं। हाँ, यह बात भी सही है कि मन में कभी कभार एक भय सा उत्पन्न होने लगता है कि विदेश में रहने से और विदेशी भाषा को प्राथमिकता मिलने से कहीं अपनी हिन्दी भाषा इन प्रवासियों के बीच किसी दिन विलीन न हो जाए। किन्तु दूसरी तरफ नई पीढ़ी के सकारात्मक दृष्टिकोण को देखते हुए लगता है कि प्रवासी भारतीयों के बीच हिन्दी का विकास पहले से अधिक हो रहा है और इसकी मशाल विदेशों में भी हमेशा जलती रहेगी।
हिंदी पर एक कविता :
हिंगलिश - चले गये अंग्रेज कभी के / छोड़ के हिन्दुस्तान / पर अंग्रेजी भाषा को / मिलता पूरा सम्मान / अक्सर ही लोगों का / बढ़ जाता है कन्फ्यूजन / जब हिंदी भाषा की बजाय / अंग्रेजी का होता पूजन। / मिक्स हो रही भाषा / खोकर अपनी सूझ / हिंदी अपने देश में / चार्म कर रही लूज। / हिंदी की चिंदी उड़े / अंग्रेजी की हुई जुबान / सबके सर यह चढ़ी हुई / न इससे हम अनजान। / हिंगलिश हिंदुस्तान में / चिंगलिश बोले चीन / अंग्रेजी के दिखते हैं / दुनिया भर में सीन। / जब कोई बोले अंग्रेजी / तो नकल करे है दूजा / खरबूजे को देख कर / रंग बदल रहा खरबूजा।

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