ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्विमिंग पूल
01-Oct-2016 12:00 AM 79593     

आज मैं निÏश्चत थी एकदम। उसे मैंने पूल से बाहर निकलते देखा तो एकदम चैन आ गया कि अब आराम से जब भी चाहेगा तो निकल जाऊंगी। वर्ना यही सिर पर भूत की तरह सवार हो जाता कि कहीं ऐसा न हो कि जब मैं बाहर निकलूं तभी वह निकले। और फिर ठीक से नहाना भी न हो सके।
यूं यह भी बड़ी अजीब बात ही थी। उस यूनिवर्सिटी के पूल में स्विमिंग करने हम सिर्फ दो ही हिन्दुस्तानी औरतें आती थी। यूं मुझे तो अच्छा लगता था कि पहले कोई भी नहीं दीखता था। बस अमेरिकी लड़कियां या औरतें ही होतीं। और यहां के तो रिवाज ही निराले हैं। पूल से निकल कर सभी की सभी महिलायें विमैन लॉकर में फव्वारों के नीचे अलफ नंगी खड़ी हो जाती हैं और बेशरमी से आपस में बातें करती रहती हैं, हंसती, खिलखिलाती हैं और साथ ही अपने सारे बदन पर साबुन मलती और यहां तक की गुप्तांगों को भी खुलेआम खोल-खोल के साफ करती हैं। हम तो कभी सोच भी नहीं सकते इस तरह करना।
मुझे याद है मां के साथ अमृतसर के सरोवर में स्नान किया था तो मैं अपनी फ्राक में ही थी, मां ने बाकायदा अपना जम्फर और पेटीकोट पहन रखा था। मैंने कभी मां को नंगा नहीं देखा। यहां तक कि अपनी बहनों को भी आज तक नंगा नहीं देखा। वर्ना बड़ी दीदी की शादी के पहले सालों हमने साथ घर पर बिताये पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि वे हमारे सामने कपड़े बदलें या मां ने कभी हमारे सामने कपड़े बदले हों। यहां तक कि मेरी हमउम्र बहन को भी कभी नंगा नहीं देखा। यूं हम एक ही कमरे में साथ रहते थे पर ऐसा सिखाया गया था कि कभी बदलने भी पड़े कपड़े या तो दूसरा कमरे से बाहर निकल जाये या आप गुसलखाने में जाकर बदलें या फिर दूसरे की ओर से आंख मूंद कर ही कमरे में बदले। इस सिखलायी के हम पक्के कायल थे। हमें मां ने एक कहानी भी सुनायी थी कि एक बार पता नहीं कैसे हुआ कि एक लड़के ने अपनी माँ को नंगा देख लिया तो बस वह अंधा ही हो गया। यानि कि ऐसा डर बिठाया गया था हमारे मन में कि कभी भूल कर भी माँ को नग्न न देख लें। मुझे याद है कि एक बार जब मेरी दो साल बड़ी बहन नहा रही थी और पिताजी ने मेरे छोटे भाई को गुसलखाने की दरार से झांकने की कोशिश करते देखा तो ऐसी डांट लगायी कि घर की सारी दीवारें थर्रा उठीं। तभी मां ने वह अंधे होने वाली कहानी हमको सुनायी थी कि मन में ऐसे कौतूहल पालना भी पाप है। और ऐसा भीतर तक डर बिठाया कि हम में से कोई भी किसी को लेकर ताकझांक तक करने की कोशिश न करे।
शायद यह सिरफ मेरे आर्यसमाजी घर की ही बात नहीं थी क्योंकि मेरी सारी सहेलियों का भी नजरिया ऐसा ही था। हमने कई बार आपस में सहेलियों के घर रातें बितायीं पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई किसी के सामने निर्वस्त्र हुआ हो। सब बारी-बारी से गुसलखाने जाकर कपड़े बदल आते थे। यानि कि देह को लेकर किसी भी तरह की जिज्ञासा को न उठने देना बड़ा सहज, लड़कीवत् व्यवहार था।
तब हम लोग गुसलखाने में ही कपड़े बदला करते थे। पर यहां पूल में तो बेपरदा और बेदीवार गुसलखाने हैं। अलबत्ता फ्लश तो दीवार की आड़ के ही अंदर हैं पर नहाना खुला। प्लास्टिक का परदा तक नहीं। बस इतना जरूर है कि औरतों के अलग और मरदों के अलग गुसलखाने हैं।
खैर मुझे अमेरिकी औरतों के आगे तो शरम आती भी थी तो खुद को इस तरह समझाकर अब बेशरम हो चुकी थी कि यहां का तो दस्तूर ही यही है, इनका ध्यान भी इस बात पर नहीं जाता कि कोई नंगा है। इनकी नजर तो बस खुद पर ही रहती है। मैं अपने पेट पर पड़े ऑपरेशन का दाग भी नजरंदाज कर जाती थी कि किसी की नजर पड़ भी जाये तो क्या है। किसी से कुछ लेना-देना तो है नहीं। शायद ठीक ही कहा है किसी ने, शर्म तो अपनों से ही आती है, गैरों से नहीं। यहां गैरों में गोरों को भी जोड़ देती हूं।
किसी हिन्दुस्तानी के सामने कभी नंगा नहाने का मौका नहीं बना था और इस खयाल से भी मुझे खौफ होता था कि किसी हिन्दुस्तानी महिला ने मेरा नंगा जिस्म देख लिया तो खुदा जाने क्या हो जाये! शर्म से शायद धरती में ही समा जाना पड़े! इसी से कभी-कभी जब वह हमउम्र सी दीखने वाली महिला पूल में दीख जाती तो मेरा सारा दिमाग इसी सोच में लग जाता कि इससे कैसे बचा जाये। क्योंकि तैरने के बाद नहाना भी लाजमी था। वर्ना पूल के पानी के क्लोरीन और दूसरे जिस्मों की छुआछूत अपने बदन पर लिये तो मैं घर आ नहीं सकती थी।
यूं मैंने इस बारे में सोचा भी कि एक हिन्दुस्तानी महिला के सामने नंगा नहा लेने में मुझे मुश्किल क्यों आती है जबकि अमेरिकी महिलाओं की उपस्थिति में मैंने इस स्थिति से समझौता कर ही लिया है कि अगर तैरना है तो यह सब भी झेलना ही होगा। जो रस्मोरिवाज है, उसमें ढलना ही पड़ेगा। जैसा देस वैसा भेस।
क्या यह बचपन से दिये गये संस्कार हैं? भारत में तो हम लड़कियां स्विमिंग करती ही नहीं थी सो ऐसा सवाल कभी उठा नहीं। अगर गंगा नदी में नहाने गये तो पूरी की पूरी साड़ी पहने ही पानी में डुबकी लगा लेते थे। यूं भारत में ऐसे लोग भी हैं जो बिना गुलसखाने के खुले पोखरों में नहाते हैं। कृष्ण और गोपियों की तो कहानी भी बहुचर्चित हैं कि गोपियां किनारे पर कपड़े उतार पानी में नहाने गयीं और कृष्ण ने उनके कपड़े चुरा लिये। फिर मध्ययुगीन चित्रकारों को भी हाथों या बालों से अपने उघड़े अंग ढकती हुई गोपियां दर्शाने का बढ़िया मौका मिल गया। जिसे रीतिकालीन या घोर श्रृंगारिक कहकर हमें दुत्कारना ही सिखाया गया था। यूं कोणार्क और खजुराहो की प्रस्तर कलाकृतियों में भी नग्नता तो है पर वह एक तो अर्धनग्नता है दूसरे हमें शुरू से सिखाया यही गया था कि भारतीय कलाओं का यह उत्कर्ष नहीं अपकर्षकाल है। यानि कि ऐसी कलाकृतियों से दूर ही रहना चाहिए। यह तो उम्र के साथ परिपक्वता पाकर ही मैं देख पायी कि वह नग्नता कला का उत्कृष्ट नमूना है। वर्ना उन दिनों कोई उनके बारे में बात भी करता तो शर्म लगती या वह बंदा ही ठरकी और बदमाश किस्म का दीखता।
मेरे भीतर यह उलझन अक्सर उठ जाती थी कि एक तरफ तो हम जिस्मों के सिरफ माटी भर होने की बात करते हैं कि सच तो आत्मा है, शरीर कुछ नहीं। वहां दूसरी ओर जिस्म को इतनी महत्ता कि वह हमारे भीतर को ही उलट-पुलटकर रख दे! कि उसकी रक्षा के लिये जी-जान लगा दे कि हमारा आस्तित्व ही डगमगा जाये।
शरीरों को छुपाना या उससे बाहर जाकर किसी से मिलना हमारे लिये क्यों इतना अहम है? शायद व्यक्ति जिस्म के बाहर कहीं बसता है। नंगा शरीर व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व से निरस्त कर देता है। तब हम शरीर को देखते हैं, व्यक्ति को नहीं। या मात्र शरीर हो जाना हमें जानवर होने के निकट ला देता है, हमारी इंसानियत को हड़प लेता है तभी हम शरीर नहीं होना चाहते। देखा जाये तो हमारा नुमायंदा तो शरीर ही हो सकता है। पर हम जिस्म से कहीं बाहर ही बसना चाहते हैं। यानि कि ये हम किसी जिस्म के भीतर नहीं हुआ मानते।
मुझे याद है कि जब मैंने कॉलेज में दाखला लिया तो बहुत मन था कि मैं वहां तैराकी सीखूं। पर वह क्लासें खतम होने के बाद सिखायी जाती और मुझसे उम्मीद की जाती कि कॉलेज खतम होते ही घर की ओर चल दूं। यूं कॉलेज की स्पेशल बस भी तभी निकलती थी वर्ना बसें बदल कर धक्के खाते जाना होता और देर शाम पहुंचती।
घर के पास एक आर्मी क्लब भी था जहां स्विमिंग पूल था। पर वहां कोई महिला अगर तैरती दीख जाती तो वह फिरंगी ही होती। मेरी एक मित्र की छोटी बहन आठ नौ बरस की थी जो वहां जाती थी। अक्सर मैं भी सहेली के साथ वहां जाती। पर मेरी सहेली जो मेरे साथ कॉलेज जाती थी, कभी भी पानी के अंदर नहीं गयी। बस हम उसकी छोटी बहन तोती को तैरते हुए देखते और किनारे बैठ गपशप किया करते।
और तो और हमें उन दिनों स्विम सूट पहनने में भी शरम आती थी। सिर्फ इसीलिए तैरने की भी शरम थी कि स्विम सूट पहनेंगे तो आधे से ज्यादा जिस्म उघड़ जायेगा, सब देखेंगे। और किसी ने देख लिया तो पता नहीं क्या हो जायेगा! डर! डर! डर!
शायद यह भी सुरक्षा नियमावली का सूत्र था।
शायद यह डर गलत नहीं होगा। आजकल बहुत से लोग यह कहकर बलात्कार को सही साबित कर देते हैं कि लड़कियां इस तरह जिसम उघाड़ेगी तो रेप तो होगा ही। इस तरह के डरों के साथ जीना, अंधेरे से पहले घर पर आ जाना, देर रात बाहर न घूमना- ये सब डर उस एक बड़े हादसे से बचाने के लिये पैदा किये जाते होंगे। अभी भी वही कोशिश की जाती है पर लड़कियों को तो इसके खिलाफ लड़ाई जारी रखनी ही है।
यहां अमेरिका में तो लड़कियां सड़कों पर भी बरायनाम कपड़े बेखटके पहनती हैं और पूल में बिकनी पहनना कोई बात ही नहीं। और फिर लड़कियों की उपस्थिति में नहाने की बात पर तो उनके दिमाग में मेरे जैसा खयाल आना ही असंभव बात होगी। मुझे इतनी परेशानी क्यों है? मैं भी तो इनते सालों से यहां रह रही हूं। यह बदलाव मुझमें सहजता से क्यों नहीं आता? मुझे अपने साथ काम करने वाले एक पाकिस्तानी मित्र की बात याद आयी। कुछ जिम (व्यायामशाला) की बात उठी तो कहने लगा कि मैं तो जिम जाता ही नहीं, साले सारे आदमी नंगे नहाते हैं, मुझसे तो यह देखा नहीं जाता, न ही मैं खुद किसी आदमी के सामने कपड़े उतार सकता हूं। तब मुझे समझ में आया कि यह सिरफ मेरी समस्या ही नहीं थी। हम जो भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े हुए, सबमें इस तरह की ग्रंथियां होती हैं।
पर मैंने इधर यह भी ठान लिया कि मैं अपनी इस हिचक पर जरूर विजय पाऊंगी। आखिर इतनी भी क्या बात है?
अगली बार ज्यों ही वह भारतीय महिला तैराकी खतम करके पानी से बाहर निकली मैं भी उसके पीछे-पीछे निकल आयी। आज सामना होना था और मैंने खुद को तैयार भी कर लिया था। जबकि वह तैयार थी या नहीं इसका अंदाज मुझे नहीं था। हो सकता है उसके भीतर वैसी गांठें न हो जैसी मुझमें है या कि मुझमें ज्यादा ही हों, क्या पता।
वह काफी देर तक स्विम सूट पहने-पहने ही फव्वारे के नीचे खड़ी रही। दो और अमेरिकी महिलायें भी हमारे साथ ही नहा रही थीं और उन्होंने स्विम सूट उतार दिये थे।
मैं भी स्विम सूट उतारे बिना ही पानी के नीचे खड़ी रही। फिर सहसा अपने मन की हिचक को परे करके मैंने भी अपना सूट उतार दिया। पर अब मेरी पीठ ही उस भारतीय महिला की तरफ थी, मेरा सामने का हिस्सा दीवार की ओर। वह सिर्फ मेरा पीछा ही देख सकती थी। मैंने उसी तरह खड़े हुए शरीर में साबुन लगाया, फिर बाल धोने लगी। बालों के लिये शैम्पू उठाने के लिये मुझे सामने होना जरूरी था। पर ज्यों ही मुड़ी तो देखा गेहुएं रंग के कमर के नीचे के उभार और खूब मजबूत धूप में सिंकी टांगे। यानि कि वह भी मेरी ओर पीठ करके नहा रही थी और उसने मुझे तब नहीं देखा जबकि मेरी आंखें उसका मुआयना कर रही थीं। यानि कि वह भी इस बात के प्रति सचेत थी कि किसी तरह हमारा एक-दूसरे से सामना न हो।
शैम्पू लगा कर मैं देर तक इसी तरह नहाती रही उसकी ओर पीठ किये कि शायद वह इस बीच नहाना खतम करके बाहर निकल जाये। यूं बाहर निकलते ही हम सबके लाकर थे जहां से कपड़े निकाल कर पहनने होते थे। यहां भी नंगे दीख जाने का खासा रिस्क था। पर बात हिम्मत की ही है तो सब कुछ करना ही था मुझे।
ज्यों ही फव्वारा बंद करके मैं बाहर निकलने लगी तभी वह भी मुड़ी। पल भर में हम एकदम एक-दूसरे के सामने थे। अलफ नंगे। हम दोनों ही भौंचक सी एक-दूसरे को देखने लगीं। उसका कुछ गोल-मटोल सा जिस्म पर कसा हुआ था। पेट थोड़ा बाहर को निकला हुआ, छातियां बड़े-बड़े रसभरे पके आमों सी, निचले तिकोन पर खिचड़ी छितरे बाल। दूसरे ही पल वह झट से गुसलखाने के बाहर टंगे तौलियों में से अपना तौलिया लेकर न दिखाये जाने वाले अंगों को ढंकने लगी। मैं भी उसके पीछे-पीछे तौलिया लपेट अपने लॉकर के पास आ गयी।
जिसका डर था वह हो चुका था। जब कुछ अनचाहा घट ही जाता है तो या तो हम वहां से भाग खड़े होते हैं या फिर सामना करते हैं। भागने वाले डरपोक और सामना करने वाले वीर, हिम्मती। शायद हम दोनों को ही भगोड़ा कहलाना अखरता।
यहां की सभ्यता का तकाजा था कि हम एक-दूसरे से आंख न चुराकर एक भले इंसान की तरह मुस्कुराकर मिलें। यूं चुरा भी जाते तो बात हम दोनों के बीच की ही थी। पर मन में अस्वस्थता महसूस हो रही थी। शायद उसके भी।
कपड़े पहनते-पहनते हमारी आंख फिर मिली। इस बार मुझे देखते ही वह मुस्कुरायी, मैं भी सिर हिलाकर अभिवादन सा करती मुस्कुरा दी।
वह बोल पड़ी- आपको यहां काफी बार देखा है मैंने। क्या रोज आती हैं?
वह ऐसे बोल रही थी जैसे कि हमारे बीच कोई बड़ी बात न हुई हो। मैं भी अचानक एकदम सहज सी हो गयी- रोज तो नहीं पर हफ्ते में दो या तीन बार तो आ ही जाती हूं।
वह बोली- मैं मंगलवार को जरूर आती हूं। अगर आप भी आती हों तो तैराकी के बाद हम लोग लंच साथ ले सकते हैं।
अचानक इतनी बेतकल्लुफी! वह इस तरह दोस्ताना ढंग से मुझसे बात कर रही थी जैसे हम बरसों से एक-दूसरे को जानते हों।
मुझे भी कुछ ऐसा महसूस हुआ कि जैसे वह अरसे मे मेरी तैराकी की साथिन हो।
ठीक है। तो अगले मंगलवार को पक्की बात रही।
कुछ देर पहले की वह अनजान, अनचाही अजनबी पता नहीं कहां गायब हो गयी थी।
मैं उससे विदा लेकर घर की ओर आ रही थी तो बहुत हल्का-हल्का महसूस हो रहा था जैसे आज के दिन अनजाने ही कुछ अच्छा घट गया था!
ऐसा महसूस हुआ कि आज हम एक-दूसरे के व्यक्ति से परिचित हो रहे थे, जिस्म कहीं हम होते हैं पर वह हम से अलग होता है अलग हस्ती रखता है। वह हमारा होता है पर हम वह जिस्म नहीं होते। अगर हम नंगे होते हैं तो हमें लगता है जैसे कि वे हम नहीं, कि वह पूरे हम नहीं होते।
यह जो कुछ भी था जिस्मों से बाहर था, यह हम दो इंसानों का जुड़ना था।

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