ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्वतंत्रता और प्रेम
01-Aug-2016 12:00 AM 1644     

प्रेम का जितना सघन संबंध प्रेम से है उससे कहीं अधिक विश्वास से है। विश्वास और आत्मीयता के अपरिहार्य आकर्षण से ही प्रेम की नींव पड़ती है। जिसे सौंदर्य और व्यक्तित्व के मानक अपनी तरह से रचते हैं। जिसमें किसी तरह की अविश्वसनीयता और विकर्षण की स्थिति आने पर प्रेम संबंधों में सिर्फ दरारें ही नहीं पड़ती हैं बल्कि स्वतंत्रता की भाव चेतना उन्हें अन्यत्र संबंध जोड़ने के लिये अनायास ही प्रोत्साहित कर देती हैं। इसलिये पाश्चात्य देशों के दाम्पत्य जीवन में प्रेम का स्वतंत्रता से गहरा रिश्ता दिखायी देता है। वे आत्मकेन्द्रित स्वतंत्र विचार-धारा के निष्कर्ष पर ही संबंध बनाते हैं और संतानोपत्ति करते हैं।
पाश्चात्य देशों में बदलाव ही व्यक्ति की संजीवनी शक्ति का मूल स्रोत है, जो जितना आत्मचेता होता है वह उतना ही अधिक स्वाधीन प्रकृति का होता है। बचपन से ही खिलौनों, साइकिल, मोटर साइकिल, कार और अन्य उपकरणों की उपभोग की व्यसनी आदतों ने व्यक्ति को उपभोगी बनाकर रख दिया है। परिणामस्वरूप वस्तुओं का उपभोग करते-करते व्यक्ति अब संबंधों और रिश्तों तक उपभोग करने लग गया है। संबंध और रिश्ते उसके लिये स्वाद की तरह आनन्ददायी कारक हो गये हैं।
पश्चिम की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की विचारधारा ने रिश्तों की ही नहीं बल्कि इस तरह के अस्थिर संबंधों के कारण, जीवन की चूलें हिलाकर रख दी हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मानदंडों का जाप करने वाले इसे बड़ी ही चपल और सजल सज्जनता से अपनी अस्मिता का बाना बनाये हुये हैं। नीदरलैंड और यूरोप के अन्य देश व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नियमावली के शिकंजे से "प्रेम" जैसे भाव की सर्वाधिक बलि चढ़ाये हुये हैं। आधुनिक चतुर सुजान इसे व्यक्तिगत स्वाधीनता का मानवीय अधिकार मानते हुये अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाये हुये भी मासूम बने रहते हैं और मानवीय अधिकारों के संघर्ष के वैश्विक जेहादी बने हुये ही मीडिया में नजर आते हैं।
यहाँ स्वतंत्रता के नाम पर लोग प्रेम संबंधों की श्रृंखलाएं बना लेते हैं, जिसमें घर नहीं बचता है और न ही परिवार। स्वतंत्रता की भावभूमि के कारण व्यक्ति का प्रेम इतना अधिक आत्मकेन्द्रित, उपभोगी और स्वार्थी हो गया है कि जब तक, वह उनका मन, उनकी देह, जिससे प्रेम चाहती है वे उससे संबंध बनाये रखते हैं।
पाश्चात्य जीवन-शैली के प्रेम संबंधों में आत्मकेन्द्रित लालसा, लोभ और व्यक्तिगत स्वार्थ के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखाई देता। स्कूली उम्र में प्रेम होने के बाद युवा बीस-पच्चीस की उम्र के बीच प्राय: बिना विवाह किये हुये ही अपनी संतानों के माँ-पिता बन जाते हैं। लेकिन चालीस से ऊपर होते ही ऐसे माँ-पिता बने हुये स्त्री-पुरुषों के संबंध प्राय: जब दूसरों से जुड़ जाते हैं तो वे उससे रिश्ता और संबंध बनाने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं। चालीस से पचास के बीच औसतन यूरोपीय परिवार और पाश्चात्य देशों के जोड़ों में फेरबदल हो जाता है। ऐसे में बच्चे सप्ताह के कुछ दिन अपनी माँ के साथ रहते हैं और कुछ दिन पिता के साथ। पर वे अपने मन की बात और व्याकुलता न तो अपनी माँ से कह पाते हैं और न पिता से। क्योंकि वे दोनों ही किसी और के हो चुके हैं। ऐसे में बच्चों के पास न अपना घर बचता है न घर का कोई कोना ही और न ही अपना बिस्तर और न ही अलमारी। ऐसे में वे घर के रहते हुये भी अनाथ हो जाते हैं और कई तरह के घुटन के शिकार होते हैं। अपनी मन की बातों को साझा करने के लिये अन्तत: अपने स्कूल-कालेज के सहपाठी और मित्रों से संवाद और संबंध कायम करने को विवश हो जाते हैं। यही मित्रताएं प्रेम और संबंधों में ढल जाती हैं जिनसे ये संतानों के अभिभावक बन जाते हैं। इसमें जब लड़के की गहरी मित्रता और विश्वास किसी लड़के से और वैसे ही किसी कन्या के अपनी हमउम्र लड़की से दोस्ती होती है तो बड़े होने पर वे समलैंगिक संबंधों के कारण बनते हैं।
पाश्चात्य देशों की जीवन-शैली में कड़ी और अनुपेक्षणीय व्यवस्था है। सरकारी कानून-व्यवस्था की निगरानी में पूरा देश संचालित होता है। सड़क पर हैं, ट्रैफिक रूल्स के अंतर्गत हैं। होटल-रेस्तरां के अपने अनुशासन हैं। बस, रेल, वायुयान की यात्रा का अपना अनुशासन है। हर जगह चैकिंग है, कैमरे लगे हुये हैं - फिर घर हो या दुकान या फिर सड़क। जिन देशों में अनुशासन का इतना पैना निकष जन्म लेने से ही प्रारम्भ हो जाता है। जहाँ नियम-कानून के बिना जीवन का एक कदम भी जीना सम्भव न हो। वहाँ के समाज, सरकार और संस्कृति में जीवन साथी चुनने, प्रेम करने और कई प्रेम करने, संबंध बनाने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता क्यों दे रखी है? जबकि इस स्वतंत्रता के कारण घर, परिवार में ही बंधाव और रचाव नहीं होगा। माँ और पिता अपने सुख के लिये बच्चों तक की आवश्यकताओं की तिलांजलि दे देंगे तो परिवार और समाज के मानवीय संस्कार कहाँ से निर्मित होंगे? पाश्चात्य देशों में जहाँ पाबंदी और नियमों का इतना हिंसक प्रभुत्व है। वहाँ व्यक्तिगत स्तर पर इनके अपने जीवन की स्वतंत्रता का अस्तित्व क्यों है? जबकि इस दुष्परिणाम से पाश्चात्य देश वर्षों से जूझ रहे हैं और अकेलेपन के शिकार हैं। प्रेम और स्वतंत्रता के वैश्विक अधिकार के बावजूद वे कुंठित और अकेलेपन के शिकार हैं।
राजनीतिक रूप से किसी देश के स्वाधीन होने पर उस देश का विकास होता है। अपनी आंतरिक शक्तियों के साथ वह स्वयं में संगठित होता है लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता कहीं-न-कहीं व्यक्ति को अपने समाज से, अपने भीतर से अलग करती जाती है। वह कई रिश्ते बनाने के बावजूद अकेला रह जाता है। कई प्रेम जीने के बाद भी तृषित रह जाता है। सुख की सारी शैलियाँ जीने के बावजूद तृष्णाओं में भटकता रहता है। रिटायरमेंट के बाद तो घुटन और कुंठाओं के अतिरिक्त उसके चित्त और चेतना के वश में कुछ नहीं बचता है और वृद्ध होने पर धुंधली आँखों और जर्जर देह को सिर्फ वृद्धालय का एक कक्ष मिलता है क्योंकि प्रेम और स्वतंत्रता के मोह में फंसकर घर तो वह पहले ही छोड़ आया था। यह उसे तब समझ में आता है जब वापस लौटना असंभव है।
देश की स्वतंत्रता में देश की संस्कृति विकसित होती है लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता में घर और परिवार तक की संस्कृति नहीं बच पाती है। देश की स्वतंत्रता वहाँ के नागरिकों को देशभक्त बनाती है पर नागरिकों की व्यक्तिगत जीवन की स्वतंत्रता उन्हें आत्मभक्त और आत्मकेन्द्रित बनाती है।

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