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स्वतंत्रता और अनुशासन
01-Aug-2016 12:00 AM 5361     

संसार के किसी विकसित देश से तुलना की जाये तो एक आम भारतीय कहीं अधिक आज़ाद है। चलती बसों में चढ़ने-उतरने से लेकर कहीं भी कचरा फैलाने, थूकने से लेकर नित्यक्रिया तक के लिये कहीं भी बैठ जाना सामान्य-सी बात है। जिसे कभी दो पैसे का निवेश करना नहीं आया वह रिज़र्व बैंक की नीतियों पर व्याख्यान दे डालता है और जो नागालैंड को इंग्लैंड का प्रांत समझता है वह पांच मिनट में विदेश नीति की किसम किसम की पांच हजार कमियां निकाल सकता है।
भगदड़ में मर जाना मंज़ूर है लेकिन बस हो, रेल हो, मंदिर या मज़ार हो, हमने पंक्ति बनाना नहीं सीखा। और सीखते भी कैसे? हमारे आज़ाद ख्याल अध्यापकों ने सिखाया ही नहीं। वे कैसे सिखाते जब उन्हें यह खुद कभी नहीं आया।
आज़ादी के मायने अलग-अलग लोगों के लिये अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे लोग कम ही हैं जो देश की आज़ादी का अर्थ अपने सह-नागरिकों की आज़ादी का आदर करना मानते हैं। सच्चे अर्थों में आज़ादी वही है जो अपने सह-नागरिक की आज़ादी का अतिक्रमण न करे। क्योंकि यही एक ऐसा मार्ग है जिसमें प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सकती है।
और इस आज़ादी को पाने के लिये नागरिकों के व्यक्तिगत प्रयास के साथ एक अन्य तत्व भी आवश्यक है, और वह है सुदृढ प्रशासन व्यवस्था। सामान्य अपराधियों से लेकर नृशंस आतंकवादियों तक सभी को अपराध की कल्पना करने से पहले ही दण्ड का भय पता हो तो नागरिकों की स्वतंत्रता सुनिश्चित है।
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।।
दंड ही शासन करता है। दंड ही रक्षा करता है। जब सब सोते रहते हैं तो दंड ही जागता है। बुद्धिमानों ने दंड को ही धर्म कहा है।
ईंटों के भट्टे के लिये मिट्टी काटने वाले बच्चे को अंदाज़ भी नहीं है कि राष्ट्र के शिक्षित वर्ग के लिये जिस प्रकार उच्च शिक्षा के संसाधन उपलब्ध हैं। इन संसाधनों के अंशमात्र से राष्ट्र के निर्धन और वंचित वर्ग को मूलभूत शिक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है। देश के दलित-वंचित वर्ग के लिये जेएनयू आज़ादी का प्रतीक नहीं है, उनके लिये आज़ादी का मतलब है बेसिक शिक्षा तक उनकी पहुंच।
भारत की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले अक्सर हमारी पारिवारिक व्यवस्था और बड़ों के सम्मान का उदाहरण ज़रूर देते हैं। अपने से बड़ों के पाँव पड़ना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। अब ये बड़े किसी भी रूप में हो सकते हैं। राजनीतिज्ञों के पाँव पड़नेवालों की कतार देखी जा सकती है। बड़े-बड़े बाबा गुरुपूर्णिमा पर अपने गुरु के पाँव पड़े रहने का पुण्य त्यागकर अपने शिष्यों को अपना चरणामृत उपलब्ध कराने में जुट जाते हैं। बच्चे बचपन से यही देखकर बड़े होते हैं कि बड़े के पाँव पड़ना और छोटे का कान मरोड़ना सहज-स्वीकार्य है। ताकतवर के सामने निर्बल का झुकना सामान्य बात बन जाती है।
विकसित देशों में इस प्रकार की हिरार्की को चुनौती मिलना सामान्य बात है। भारत में मेरे कई अध्यापक मुझे इसलिए नापसंद करते थे क्योंकि मैं वह सवाल पूछ लेता था जिसके लिए वे पहले से तैयार नहीं होते थे। भारत में यह आसान नहीं था। अध्यापक को न पढ़ाने की आज़ादी थी मगर छात्र को प्रश्न पूछने की आज़ादी नहीं थी। पश्चिम में यह स्वतंत्रता हर कक्षा में है और छात्रों की शिक्षा सम्बंधी स्वतन्त्रता यहाँ सहज स्वीकार्य है, ठीक उसी रूप में जिसमें हमारे मनीषियों ने कल्पना की थी। सच पूछिए तो जो प्राचीन गौरवमय भारतीय संस्कृति हमारे यहाँ मुझे सिर्फ किताबों में मिली वह यहाँ हर ओर बिखरी हुई है। पश्चिम में स्वतन्त्रता का अर्थ उच्छृंखलता नहीं होता। आश्चर्य नहीं कि वहाँ के नागरिक आज़ादी का अर्थ समझते हैं और उसे बचाने के लिये प्रतिबद्ध हैं।
हमें भी एक पल ठहरकर यह सोचना पड़ेगा कि आज़ादी के असली मायने क्या हैं। नागरिकों के मूलभूत सुविधाओं के अधिकारों के प्रति संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिबद्धता और दूसरों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आदर के साथ-साथ अपराधियों को त्वरित और यथोचित दण्ड देने वाली प्रशासनिक न्याय व्यवस्था मेरी नज़र में स्वतंत्रता के मूलभूत तीन तत्व हैं

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